स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १९ १. सांख्यदर्शन का मत है कि 'पुरुष के दर्शन एवं प्रधान के कैवल्य के लिए पंगु एवं अंधे (पुरुष-प्रकृति) का संयोग होने से जो क्रिया होती है उसी का नाम सृष्टि है।'—अर्थात् पंग्वंध-सम्बन्ध-जन्य व्यापार ही सृष्टि है । 'पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पंग्वंधवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥'१ २. 'अजातिवाद'—आचार्य गौड़पाद तो यह मानते हैं कि—'कोई जीव उत्पन्न ही नहीं होता । उसके जन्म की संभावना ही नहीं है । उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें किसी वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं होती । 'न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते । एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥'२ आचार्य शङ्कर भी कहते हैं कि—'व्यवहारतः तो जीवों का जन्ममरण तो है किन्तु वह स्वप्नवत है किन्तु परमार्थतः किसी भी जीव की उत्पत्ति नहीं होती—'व्यवहार- सत्यविषये जीवानां जन्ममरणादि स्वप्नादिजीववदित्युक्तम् । उत्तमं तु परमार्थसत्यं न कश्चिज्जायते जीव इति ।'३ ३. न्यायशास्त्र का मत है कि परमेश्वर की सिसृक्षा के अनुसार लब्धवृत्तिक अदृष्टवाली आत्मा के संयोग से परमाणुओं में क्रिया होने पर दो परमाणुओं में परस्पर- संयोग से 'द्वयणुक' उत्पन्न होता है, तीन द्वयाणुकों से 'त्र्यणुक', चार त्र्यणुकों से 'चतुर- णुक', पाँच चतुरणुकों के संयोग से 'पञ्चाणुक' छः पञ्चाणुकों के संयोग से 'षडणुक' उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार अवयवों के संयोग से अवयावियों का उत्पाद होते-होते पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदि पञ्चभूत एवं पञ्चभूतों से समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है ।४ ४ 'सृष्टि' = 'सृष्टि' भगवान् की विभूति है—विभूतिं प्रसवं मन्दे । ५. 'सृष्टि' = सृष्टि स्वप्न या माया है— स्वप्नमायास्रूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिताः॥ ६. 'सृष्टि' 'सृष्टि' परमात्मा की इच्छामात्र है । 'इच्छामात्रं प्रभोःसृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ॥' ७. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' काल की प्रसूति है । 'कालात्प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते काल चिन्तकाः ॥' ८. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' भोग है क्योंकि 'भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये' । ९. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' क्रीड़ा है—'क्रीडार्थमिति चापरे' ॥ १०. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' आप्तकाम देव का 'स्वभाव' है ।५ १. सांख्यकारिका । २. माण्डूक्योपनिषद् (अलातशान्तिप्रकरण)। ३. माण्डूक्योपनिषद् (माण्डूक्यकारिका शां० भाष्य का० ७१)। ४. तर्कभाषा । ५. आगमप्रकरण (माण्डूक्यकारिका) : गौड़पादाचार्य ।