स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० स्पन्दकारिका ११. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' ब्रह्म का परिणाम है । (रामानुजाचार्य)१ १२. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' ब्रह्म का 'विवर्त' है (आचार्य शङ्कर)२ १३. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' शक्ति एवं शक्तिमान का 'आभास' है ।३ १४. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' परमात्मा का 'प्रतिबिम्ब' है ।४ (क) संकुचित रूप से प्रकाशन ही 'आभास' है—'आभासनं—आ ईषत् संकोचेन भासनं प्रकाशना' ।५ (ख) प्रतिबिम्ब ही आभास है—'भासनसारतैव हि प्रतिबिम्बता'६ विमर्शात्मक प्रकाशरूपी दर्पण में अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्त के समान जड़चेतन समग्र जगत् का प्रतिबिम्बन 'आभास' है । विमर्शात्मक प्रकाशपुरुष का अपूर्ण आत्मप्रकाशन ही आभास है । १५. 'सृष्टि' = सृष्टि 'स्वातन्त्र्य' का विजृंभण है । परमात्मा की इच्छा का अनभिहत प्रसार ही उसका 'स्वातन्त्र्य' है—'स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छाप्रसरस्य अविघातः ।।'७ १६. 'सृष्टि' = सृष्टि भगवती चिति शक्ति का रूपान्तर है, स्फार है, क्योंकि वह उनसे किंचिन्मात्र भिन्न नहीं है—'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित' क्योंकि भगवती चित् शक्ति ही जगत् के रूप में स्फुरित होती है—'चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्त जगदात्मना स्फुरति ।'८ १७. 'सृष्टि' = शिवादि धरण्यन्त यह निःशेष सृष्टि शिव से अभिन्न है और शिव इसी अनन्त एवं विराट् विश्व के रूप में ही स्फुरित हुआ करते हैं—'श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि धरण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव स्फुरति न तु वस्तुतः अन्यत् किंचित ग्राह्यं ग्राहकं वा ।।९ इसीलिए भगवान् को 'विश्वशरीर' कहा गया है—'एवं भगवान् विश्व शरीरः', 'विश्वशरीरः शिव- भट्टारक एव' क्योंकि विश्व एवं शिव में—एकात्म्य है—तादात्म्य है दोनों में स्वात्मैक्य है—'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थित विश्व (प्र०हृ०)। १८. 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' 'जगतः प्रलयोदयौ'— (क) 'उन्मेष' = उदय । 'निमेष' = प्रलय । (ख) उन्मेष = सृष्टि (ख) 'निमेष' = प्रलय । (क) 'उन्मेष' = उन्मीलन (ख) 'निमेष' = निमीलन ।। प्रश्न उठता है कि कारिकाकार ने 'सृष्टि' एवं 'प्रलय' शब्द का प्रयोग न करके उन्मेष-निमेष, उदय- प्रलय का प्रयोग क्यों किया ? १. रामानुजाचार्य—'श्रीभाष्य' । २. शंकराचार्य—'शारीरकभाष्य' । ३. त्रिकदर्शन । ४. वेदान्ती एवं अद्वैतवादी शैव-शाक्त । ५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी । ६. अभिनवगुप्तपादाचार्य । ७. ई०प्र०वि० । ८. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, (क्षेमराजाचार्य) । ९. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।