स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निःष्यन्दः २९ या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी । इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥ सैकाऽपि सत्यनेकत्वं यथा गच्छति तच्छृणु । एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् ॥ ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते । एवं भवत्विदं सर्वमिति कार्योन्मुखी यदा ॥ जाता तदैव सा तद्वत् कुर्वन्त्यपि क्रियोच्यते । एवमेषा द्विरूपाऽपि पुनर्भेदैरनेकताम् ॥ अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी । तत्र मातृत्वमापन्ना पञ्चाशद्वर्णमालिनी ॥१ 'शक्तीनां चक्रं शक्तिचक्रं'—मातृवर्ग ॥२ इसके मुख्यतः ४ प्रकार हैं— खेचरी गोचरी चाथ दिक्त्वरीभूचरीभिदा । परादिभारतीसंस्थं शक्तिचक्रं चतुर्विधम् ॥ 'शक्तिचक्र' = मातृवर्ग खेचरी गोचरी दिक्त्वरी भूचरी शक्तिचक्र परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी शक्तिचक्र आनन्दशक्ति इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति 'आनन्देच्छाः ज्ञक्रियाख्यं खेचर्याद्यं चतुष्टयम्' 'विभव'—'विभूतिर्विस्तारः' । 'प्रभवम्' = प्रभवति अस्मादिति प्रभवः उत्पत्ति- स्थानम् ।'३ खेचरी, गोचरी, दिक्त्वरी, भूचरी = परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी इन्हीं में आनन्द, इच्छा, ज्ञान, एवं क्रिया निवास करती है । ये सभी शक्तियाँ आत्मसंवित् से अभिन्न हैं । पाँचभौतिक शरीर से रहित केवल चिदात्मा में परमानन्दोल्लास है वही 'परा वैष्णवी' शक्ति है । इन्हीं शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । हितकारिणी इन्हीं शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । हितकारिणी होने से इन्हीं शक्तियों को 'माता' कहा जाता है । ये शक्तियाँ विज्ञानदेह हैं । भिन्न-भिन्न मतों में—खेचरी, इच्छा, परा, अघोरा, वामा, ब्राह्मी, वैष्णवी, शैवी, सौरी, बौद्धी आदि अनेक शक्तियाँ हैं । इन सभी शक्तियों के मूल कारण 'स्पन्द' रूप भगवान् ही है । शक्तिसमूह ही अनन्तरूप में १. मालिनीविजय । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।