स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० स्पन्दकारिका
स्फुरित हो रहा है । शक्तिमान आत्मा महेश्वर है और शक्तियाँ जगत् है । जिस प्रकार श्रेष्ठ सुन्दरी के अंग प्रत्यंग से राशि-राशि लावण्य छलकता है वैसे ही परमात्मा की चिन्मात्रता ही जगत् के रूप में छलक रही है । शक्तियों के बल से ही आत्मा की संज्ञा 'प्रभु' पड़ी है । प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । तत्तत् प्रसिद्धावयवातिरिक्तमाभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥ तेनैतदेव शक्तीनां यतोऽन्तः प्रसरोदयौ । तद्बलालम्भनात्तासां प्रभुत्वं प्राप्यतेऽचिरात् ॥ ‘उन्मेष-निमेष’ के सम्बन्ध में स्पन्दप्रदीपिकाकार की दृष्टि— (१) उन्मेष (उन्मुखता) से विश्व का उदय होता है और परम्परा चलती रहती है । निमेष से (विश्राम से) प्रलय हो जाता है । मूल वही ‘शङ्कर’ है । उन्मेष-निमेष उसी प्रकार हैं यथा जाग्रत काल में दृश्य का उदय एवं सुषुप्ति काल में दृश्य का प्रलय । आत्म संवित् के उन्मेष एवं निमेष से अतिरिक्त उत्पत्ति-प्रलय नामक कोई अन्य वस्तु नहीं है । यह अत्मरूप ईश्वर की शक्ति का प्रसार एवं विराममात्र है । विमल संवित् के ये दोनों ही आकार हैं । ‘तत्त्वविचार’ में ठीक ही कहा गया है कि—जगत् का उदय और विलय शक्ति के प्रसार एवं संकोच के साथ बँधे हुए हैं । ‘कक्ष्यास्तोत्र’ में भी कहा गया है कि—तुम्हारे आशय के उन्मेष-निमेष मात्र को ही सृष्टि और प्रलय कहते हैं । ‘उन्मेष’ में ज्ञान-क्रिया आदि से गर्भित इच्छा शक्ति का निवास है और वह फैलती है । इच्छा से ज्ञान प्रवृत्त होता है और क्रिया-करण के संयोग से पदार्थ की उत्पत्ति होती है । इसका विराम ही प्रलय है ।१ (२) ‘उन्मेष’ में भुक्ति है और ‘निमेष’ में मुक्ति है । सृष्टि और संहार भी इसी भुक्ति-मुक्ति के अपर पर्याय हैं—‘आभ्यां जगत्सृष्टिसंहारयोः कारणभावः प्रोक्ते भुक्तिमुक्तौ च । तत्रोन्मेषाद् भोगो नानाविधः । निमेषान्मोक्षो निस्तरंगरूपता ।।'२ जिस निमेष को ‘मोक्ष’ कहा गया है वह ‘मोक्ष’ क्या है ? उत्पलदेव कहते हैं— ‘इह कि जीवन्मुक्ततैव मोक्षः ।' ‘स्पन्दकारिका’ में भी यही कहा गया है— ‘इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३ ‘शक्तिचक्र विभवं’ वाक्य में ‘शक्तिचक्र’ का क्या अर्थ है?—इसका सुनिश्चित अर्थ न बताकर स्पन्दप्रदीपिकाकार ने कहा है कि ‘शक्तिचक्र’ निम्न सभी चतुष्कों का अर्थ-बोधन करता है— १. खेचरी २. गोचरी ३. दिक्चरी ४. भूचरी शक्ति । १. इच्छा २. ज्ञान ३. क्रिया ४. चित् शक्ति । १-२. स्पन्दप्रदीपिका । ३. स्पन्दकारिका ।