स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ३१ १. परा २. पश्यन्ती ३. मध्यमा ४. वैखरी वाक् । अघोरा } 'स विसर्गो महादेवि यत्र विश्रान्तिमुच्छति । वामा } गुरुवक्त्रं तदेवोक्तं शक्तिचक्रं तदुच्यते ॥' (परा०वि० अभिनवगुप्त) १. ब्राह्मी २. वैष्णवी ३. माहेश्वरी ४. कौमारी : ये वैष्णव, शैव, सौर एवं बौद्ध दर्शनों में वर्णित शक्तियाँ हैं । शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥१ इस कारिका में उल्लिखित अकाराद्यक्षररूपा वर्णात्मक शक्तियाँ । करण—इन्द्रिय-ग्राम । [शक्तयश्च खेचर्याद्या वेच्छाद्या वा पराद्या वा अघोराद्या वा वामाद्या वा ब्राह्म्याद्या वा अन्या वैष्णव शैव-सौर-बौद्धाद्युक्ता वा । अथवा— 'शब्दराशिसमुत्थस्य' (स्पन्द प्रदी० श्लोक सं० ४५) इत्यादिना वक्ष्यमाण । अकाराद्यक्षररूपा करणरूपा वा भवन्तु ।'] २ उत्पलाचार्य का कथन है कि इन शक्तियों का उल्लेख केवल इस प्रयोजन से किया गया है कि यह बताया जा सके कि इन समस्त विश्वव्यापी महान् शक्तियों की भी उत्पत्ति स्पन्द रूप भगवान् से ही होती है । 'माया वामन संहिता' में कहा भी गया है कि—विष्णु, शिव, सूर्य, बुद्धादि के रूप में अपनी-अपनी शक्तियों के परिवार से युक्त एवं इन शक्तियों के आदि कारण भगवान् मात्र एक हैं, केवल ध्यान-भेद से ही भिन्न- भिन्न रूप से उपास्य स्वीकार किये गये हैं । 'कुलयुक्ति' में कहा भी गया है— वेदान्ते वैष्णवे शैवे सौरे बौद्धेऽन्यतोऽपि च । एक एव परः स्वात्मा ज्ञाता ज्ञेयं महेश्वरि ॥ 'शक्ति'—शब्द का प्रयोग करके कारिकाकार ने सृष्टि की समस्त सत्ताओं एवं निःशेष जगत् का भी उल्लेख कर दिया है क्योंकि समस्त विश्व में मात्र दो ही सत्तायें हैं—१. शक्ति और २. शक्तिमान् । शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते । शक्तयश्च जगत् सर्वं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥३ शक्तिसमूह ही अनन्तरूप में स्फुरित हो रहा है । 'शक्तिमान्' आत्मा है और शक्तियाँ जगत् हैं । इन्हीं शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । ये सब शक्तियाँ 'विज्ञानदेह' हैं । शक्तियों के बल से ही आत्मा 'प्रभु' कही जाती है । 'स्पन्दसंदोह' में 'शक्तिचक्र' की यह भी व्याख्या की गई है—'शक्तिचक्रेण' । शक्तिचक्र द्वारा । 'विभव'—समापत्ति आदि के द्वारा प्राप्त (दीक्षानुग्रहजन्य) देव-तादात्म्यरूप सम्पत्ति । इसी तथ्य की ओर कारिकाकार का० (२।६) (२।७) में इस प्रकार कहते हैं— १. स्पन्दकारिका (४५) । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।