स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ३५ 'नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ।' (१।१२) और आगे इसी की पुष्टि में पुनः कहा है—'न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥' (१।१३) न तो 'विश्वातीत' ही परम तत्त्व है और न तो 'विश्वमय' ही—(१) 'नापि सिद्धान्तदृष्टिवत् विश्वोत्तीर्णमेव परं तत्त्वम् इत्येवं रूपं— 'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदा व्यभिचारिणी (१।१७)' इस वाक्य के द्वारा, विरुद्धत्वापत्ति के कारण, 'विश्वातीत' को 'परमपद' नहीं कह सकते । (२) 'नापि अप्रकटिताकुलस्वरूपकुलप्रक्रियाशास्त्रवत् विश्वमयमेव पूर्णरूपम् इत्येवं स्वभावम्—'। 'यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात्परमं पदम् । (१।९) इस कारिका के द्वारा 'विश्वमय' स्वरूप को भी 'परमपद' नहीं कह सकते अतः परमपद वह है जो-विश्वातीत एवं विश्वमय दोनों हैं ।¹ 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ' वाक्य की अर्थ विशेषता—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कारिकाकार ने समस्त शास्त्रार्थ को केवल एक वाक्य द्वारा पर्या- लोचति करके सर्वदा एवं सभी दशाओं में कारिकाकार ने 'अख्यातिवाद' का भी (इस कारिका द्वारा) खण्डन किया है क्योंकि—'न तु सा दशास्ति यत्र शिवता न स्फुरति इति उपदिष्टं भवति' अर्थात् ऐसी कोई दशा ही नहीं है जहाँ शिवत्व स्फुरित न होता हो । स्वच्छशास्त्र भी कहता है— यत्र यत्र निलीयेत् मनस्तत्रैव भावयेत् । चलित्वा यास्यति कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥² कारिकाकार स्वयं कहते हैं—'न साऽवस्था न यः शिवः ।' (२।४) (२९) ॥ शिव-सूत्रकार भी इस सिद्धान्त का संसार का जागरण (Waking of the universe) जो कि शिव में पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों से निर्मित है, शिव की शक्तियों के कारण होता है । देवियाँ श्रीमन्मन्थानभैरव चक्रेश्वर का आलिंगन करके संसार की सृष्टि आदि क्रीड़ाओं का निष्पादन करती हैं फिर 'परमात्मा से ही सृष्टि-संहार निष्पादित होते हैं'—ऐसा क्यों कहा गया? इसी का उत्तर देने के लिए कारिकाकार ने 'शक्तिचक्रविभव प्रभवं शङ्कर स्तुमः' कहा । परमेश्वर के भीतर परमेश्वर के साथ अभिन्नतया स्थित शक्तियों का चक्र है । इसीलिए परमात्मा को अनन्त शक्तिमान कहा गया है ।³ भाव यह है सृष्टि की विधात्री इन शक्तियों का भी विधाता परमेश्वर है । इसे दिखाने के लिए ही कारिकाकार ने परमात्मा को 'शक्तिविभवप्रभव' कहा ॥ 'शक्तिचक्र'—आभासपरमार्थ विश्व । 'विभव'—परस्परसंयोजनावियोजना-वैचित्य के अनन्त प्रकार 'प्रभव' = कारण । वही भगवान् विज्ञान देहात्मक एवं स्वात्मैकात्म्यपूर्वक स्थित विश्वरूप आभासों को १-२. स्पन्दसन्दोह—क्षेमराज । ३. स्पन्दनिर्णय ।