स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ स्पन्दकारिका अनेकविध वैचित्र्यों के साथ संयुक्त एवं वियुक्त करते हुए विश्व के उदय एवं हेतु का कारण बनता है ।१ श्री भट्टकल्लट ने कहा भी है— 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्ति- चक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वम्' 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नम्' ऐसा कहकर एवं— 'न सावस्था न यः शिवः' कहकर अगम ने शिव को जगदात्मा कहा है । 'विभव' = माहात्म्य ।। 'प्रभव' = 'तत्र प्रभवतीति प्रभवं' शक्ति चक्र का विभव क्या है? 'स्वतन्त्र्य' ('पशु' जीव स्वतन्त्र नहीं परतन्त्र हैं) । 'शक्तिचक्र' = रश्मिपुञ्ज । 'विभव' = अन्तर्मुख विकास । 'प्रभवः' = विभव से होने वाला उदय या अभिव्यक्ति । (रश्मिपुञ्ज के अन्तर्मुख विकास से होने वाले उदय या अभिव्यक्ति वाले ।) अन्तर्मुखतत्स्वरूपनिभालन से परमेश्वर के स्वरूप का प्रत्यभिज्ञान अनायास होता है ।२ चिदानन्दघन आत्मा के उन्मेष-निमेषों से अर्थात् स्वरूपोन्मीलन एवं निमीलनों से ('यदन्तस्तद्बहिः' की युक्ति के अनुसार) जगत् रूप शरीर के एवं बाह्य विश्व के भी प्रलय एवं उदय (मज्जनोन्मज्जन) में उत्पन्न होने वाले शक्तिचक्र के मूल कारण । 'शक्तिचक्रविभव' = पर संवित् का स्फार ॥ आचार्य क्षेमराज प्रथम कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं— 'यस्य स्वात्मनः संबंधिनो बहिर्मुखता प्रसररूपादुन्मेषाज्जगत् उदयोऽन्तर्मुखतारूपाच्च, निमेषात्प्रलयः तं विश्वसर्गादि कार्युन्मेषादिस्वरूप संविद्देवी महात्म्यस्य हेतुं शङ्करं स्तुमः ॥'३ 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ'— इस श्लोक द्वारा कारिकाकार ने शङ्कर-स्तुति के बहाने 'समावेश' को भी संकेतित किया है— 'अत्र च शङ्करस्तुतिः समावेशरूपा' ।४ 'शक्तिचक्र के विभव से प्रभव है जिसका' (बहुव्रीहि समास) शक्ति चक्र विकास ही उस 'समावेश' का उपाय है । 'शक्तिचक्रविभवस्य'—परसंविद्देवता के स्फार के । ऐसे भक्तों के 'प्रभव' (प्रकाशक) । (तत्पुरुष स०) 'ततश्चक्रेश्वरो भवेत्, (३।१९) सूत्र इसी समावेश का संकेतक है । यहाँ 'उपायोपेयभाव' दोनों का सामरस्य है ।५ बहुव्रीहि समास करने पर 'शक्तिचक्रविभवप्रभव' का अर्थ निम्नानुसार होगा— 'जिस शङ्कर की अभिव्यक्ति शक्ति-समूह के 'विभव' (महात्म्य । यश) द्वारा होती है।' ये इन आन्तरिक शक्तियों का विकास करने से ही शांकर समावेश रूप जीवन्मुक्ति प्राप्त हो पाती है । प्रथम कारिका में शांकर-स्तवन, शांकर समावेश का प्रतीक है और यही स्पन्दशास्त्र का अंतिम लक्ष्य भी है । इस परमलक्ष्य को कारिकाकार ने अपनी प्रथम कारिका में ही प्रस्तुत कर दिया है । 'शक्तिचक्र के वैभव को उत्पन्न करने वाला है'— १-५. स्पन्दनिर्णय ।