भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः ३७ यह अर्थ करने पर शङ्कर की स्वातन्त्र्य शक्ति को संकेतित करके यह द्योतित किया गया है कि मात्र शङ्कर ही ऐसे हैं जो कि अपने वैभव में 'स्वतन्त्र' है। अन्य प्राणी स्वतन्त्र नहीं प्रत्युत परतन्त्र हैं। 'स्वातन्त्र्य' परमात्मा की एक शक्ति है जिसका अर्थ है— परमुखापेक्षिता से स्वतन्त्र ॥ जिसका जागरण या जिसकी अभिव्यक्ति महाप्रकाश के आन्तरिक उद्घाटन (Un- foldment) पर आश्रित है वह है—'शक्तिचक्रविभव।' कारिका का यह भी अर्थ किया गया है— जो भक्तों के स्वस्वभाव (वास्तविक प्रकृति) को प्रकट करता है, जो कि परमशक्ति की अभिव्यक्ति का कारण है (या परा चेतना की अभिव्यक्ति का आधार है) जो अपने स्वस्वरूप को अभिव्यक्त करने या तिरोहित रखने पर भी आनन्दरूप है और जो कि विश्व की सृष्टि एवं संहार का कारण है—हम उन शङ्कर का स्तवन करते हैं। इस कारिका का यह भी अर्थ किया गया है— हम उन शङ्कर का स्तवन करते हैं जो कि जागृतादि अवस्थाओं से अभिन्न रूप वाली चेतना की शक्ति की महानता के मूल कारण हैं, जिनके जागरण या बाह्यमुखी क्रियाओं से विश्व की सृष्टि एवं जिनके सोने या अन्तर्मुखी होने से विश्व का प्रलय हो जाता है। सारांश यह कि—बहिर्मुखता प्रसार रूप 'उन्मेष' से जगत् का 'उदय' (सृष्टि) होता है और अन्तर्मुखता रूप 'निमेष' से 'प्रलय' हो जाता है। विश्वसर्गादिकार्यरूप उन्मेष के स्वरूप वाली संविद्देवी के माहात्म्य के कारण भगवान् शिव हैं। हम उनकी स्तुति करते हैं। १ स्वसम्बद्ध ध्वनियों से प्रादुर्भूत होने वाली मान्त्री शक्तियों के समूह को भी 'शक्ति- चक्र' माना जा सकता है। 'शक्तिचक्रस्य' = करणेश्वरी चक्र का। करणशक्ति वर्ग का ॥ 'यो विभवो' = जो विचित्र सृष्टि संहारादिकारित्व । 'तस्य प्रभवं' = उसका क्रमार्थावभासनकारित्व कृत- मक्रम महाप्रकाशमय । कहा भी गया है—'सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहतीः ॥ लभते ... (१।६) यहाँ 'चक्र' का अर्थ है—आन्तर चक्र। अन्तःकरण त्रय का करण वर्ग में परिगणिन भी किया गया है। करणवर्ग की प्रवृत्ति धर्मा है। करणेश्वरी चक्र सृष्टि आदि कार्यों में प्रवृत्त रहती है। 'शक्तिचक्र' = मन्त्रगण में मुद्रासमूह। तस्य 'विभव' = त्रिविध सिद्धि साधन समर्थत्व । तस्य 'प्रभवम्' = प्रभवोपलक्षित उत्पत्तिविश्रान्तिस्थान । कहा भी गया है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः ... । (२।१) ... निरञ्जनाः (२।१) त्रिविध = 'पर'—'अपर'— 'परापर' ॥ त्रिधा सिद्धि ॥२ १. स्पन्दनिर्णय। २. स्पन्दसन्दोह।