भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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१४ स्पन्दकारिका १) 'परस्य शाक्तस्य तत्त्वस्य उपचरित—सामान्यविशेषात्मकतया द्विप्रकारत्वेन' (रामकण्ठाचार्यः स्पन्द का० २।३) । २) 'सुखाद्युपाध्युपरागजनितान्योन्यभिन्नरूपेभ्यो विशेषस्पन्देभ्यो' स्पन्दों के 'निष्यन्द'—स्पन्दात्मक प्रत्यय संधान हैं— 'गुणमयाः स्पन्दनिष्यन्दाः प्रत्ययसंधानाः प्रसरन्ति।' (२।५) स्पन्द निष्यन्दा नानार्थोन्मुख्येन प्रसृत प्रवाह रूप भिन्नात्मक प्रत्यय हैं— निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसूताः प्रवाहाः भिन्नाः प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥ (राम- कण्ठाचार्यः स्पन्दका०वि० २।५) । स्पन्दनात्मक होने के कारण ही इस शक्ति को 'स्पन्द' संज्ञा प्राप्त हुई 'स्पन्दनात् स्पन्दः ॥१' 'स्पन्दन' है क्या ? निस्तरंग परमात्मा की जो युगपद (एक साथ) निर्विकल्पात्मक सार्वत्रिक औन्मुख्यवृत्तिता है उसे ही 'स्पन्द' कहा जाता है—'स्पन्दनं च निस्तरंगस्यास्य तावत् परमात्मनः युगपन्निर्विकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्यवृत्तिता' ।२ 'शान्तषाड्गुण्यस्वरूप' 'आत्मबलशक्तीश' की जो चिद्रूप प्रतिभा का उदय है वही स्फुरणात्मिका 'स्पन्द शक्ति' है । शान्तषाड्गुण्यरूपस्य यत् स्फुरन् प्रतिभोदयः । स चाऽत्मबलशक्तीशश्चिद्रूपः स्पन्दसंज्ञकः ॥३ आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं कि—स्पन्द शक्ति के निम्न लक्षण हैं— १) जो नानात्मक दशाओं एवं दिक्काल आदि से अकलित 'चिदालोक वपु' शिव के हृदय में तद्रूप स्वात्मानुभव के रूप में विस्फुरित होती है । २) जो शंभु का स्वधर्म है (स्वाभाविक स्वरूप है) । ३) जो अनुपम चमत्कार से रसान्वित है । ४) जो परं शाक्त तत्त्व है—वह 'स्पन्द' है— दशादिक्कालाद्यैरकलितचिदालोकवपुषः, सदा तादृक्स्वात्मानुभवितृतया विस्फुरति यः । निजो धर्मः शंभोरनुपम चमत्कारसरसः परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ॥ [१] काश्मीरीय शैवाद्वैत एवं स्पन्द मत कश्मीर की अद्वैतवादी शैव परम्परा में शैव दर्शन की दो शाखायें मिलती हैं— १. 'प्रत्यभिज्ञा', २. 'स्पन्द' ॥ इसी स्पन्द शाखा का आद्य दार्शनिक ग्रंथ है— १-३ स्पन्दप्रदीपिका ।