भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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परिचय एवं पृष्ठभूमि १५ 'स्पन्दशास्त्र' या 'स्पन्दसूत्र' या 'स्पन्दकारिका' । यह एक अनुभूति परक ग्रन्थ है । इसके रचनाकार के संबंध में संदेह उत्पन्न होने का कारण यह है कि किसी-किसी संस्करण में अंतिम श्लोक के रूप में यह श्लोक पाया गया है— वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः । रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्री भट्टकल्लटः ॥ ५३ ॥ अर्थात् श्री भट्टकल्लट ने अपने तत्त्वार्थदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य भलीभाँति प्राप्त करके इसे श्लोकबद्ध किया । स्पष्ट है कि विचार एवं दार्शनिक सिद्धान्त तो वसुगुप्ताचार्य के हैं किन्तु इन्हें पुस्तकाकार में प्रस्तुत करने का कार्य भट्टकल्लट ने किया । तो क्या 'स्पन्दकारिकावृत्ति' के साथ ही 'स्पन्दकारिका' के भी रचयिता भट्टकल्लट हैं?—यह विवादास्पद विषय है । निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की योग्यता है वही किंचित् चलन है किन्तु इसके द्वारा उसकी निर्विकल्पता भंग नहीं होती । प्राचीन काल में परमात्मा का एक नाम 'स्पन्द' भी था । शुद्धात्मा, शंकर, शिव, भाव, स्वभाव, ज्ञाता, सामान्य, शक्ति आदि सभी स्पन्द वाच्य हैं । 'स्पन्द' पूर्ण अहं विमर्श है । यह अहं विमर्श वह मौलिक स्फुरण है जिसके द्वारा वह एक रहते हुए भी विश्व के अनन्त रूपों एवं आकारों में स्फुरित हो रहा है यह शाश्वत स्फुरणशील (या स्पन्दायमान) होने के कारण ही स्पन्द नाम से पुकारा जाता है । 'स्पन्द किंचित् चलन तो है किन्तु किसका किंचित् चलन ? किस स्वरूप का किंचित् चलन? सूक्ष्म अहं विमर्श की स्फुरण ही किंचित् चलन है और वही 'स्पन्द' है । यह शक्ति के प्रसार ही किंचित् चलन है और वही 'स्पन्द' है । यह शक्ति के प्रसार की संकल्पोत्मक उन्मुखता है । 'स्पन्द' अहं प्रत्यवमर्शात्मक गति है । यह एक उच्छ-लन है । यह संवित् समुद्र की तरंग है स्वतन्त्र रूप में स्फुरण ही किंचित् चलन है और चूँकि स्पन्द का यही स्वभाव है इसलिए इसे 'स्पन्द' कहा गया है । यह परमात्मा की स्वातंत्र्य शक्ति है । इसी के दर्पण में परमात्मा अपना मुख देख पाते हैं इसीलिए कहा गया है— 'शैवीमुखंगिहोच्यते' अर्थात् पत्नी शिव की मुख है । आचार्य अभिनवगुप्त 'मालिनीवार्तिक' में प्रश्न उठाकर फिर कहते हैं— 'किं यादृग्लोकसंसिद्धकर्तृत्वं कर्मयोगतः ? स्पन्दात्म तद्विभौ स्पन्दहीने समुपपद्यते । ननु ज्ञानं चिकीर्षा च यत्नश्चेति गुणत्रयम् ॥ (३२४) समवैति यदत्रास्य तत्कर्मत्वमुदाहृतम् । कर्तृमित्येव यद्रूपं ज्ञानादीनां विशेषणम् ॥ (३२५) करोतेस्तत्र कोऽर्थ स्याद्यदि सस्पन्दता किल । (३३०) तदसौ स्पन्दितुं वेत्ति प्रेप्सतीति भवेद्रुचः । तच्च स्वात्मगतं नास्य स्पन्दितं वैभवोद्भवात् । (३३१) अन्यदस्पन्दितं ज्ञानं सर्वस्यापि च संभवेत् ॥ (३३२)