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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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१६ स्पन्दकारिका हृदय (शिव की आत्मभूता शक्ति) स्पन्दात्मिका है— ‘तस्योपायं परं ब्रूते हृदयं स्पन्दनात्मकम् । (द्वि०का० १८) ‘स्पन्द’ का मुख्य स्वरूप ‘सामान्यस्पन्द’ है जिसके विषय में ‘मालिनीवार्तिक’ (२०) में अभिनवगुप्त कहते हैं— भावग्राह्याद्यचरमदशाद्रयोल्लासिनिर्वृतिसुपूर्णः । जगदानन्दमयोऽसौ ‘सामान्यस्पन्द’ इत्युक्तः ॥ (मा० वा० २०) इसके अतिरिक्त ‘विशेषस्पन्द’ भी हैं— ‘चित्त्तत्त्वस्य विशेषस्पन्ददशाशालिनश्चिदानन्दः ॥ (६३) एक ही स्पन्दन के ३ भेद हैं—एकस्य स्पन्दनस्येयं त्रिधा भेदव्यवस्थिति ॥ (६५) (मा०वा०) । काश्मीर शैव दर्शन के अनुसार परमेश्वर अपनी ‘स्पन्दरूपा शक्ति’ से सदैव अवियुक्त रहता है । स्पन्दरूपा शक्ति ही उसका नित्यस्वभाव है । इसीलिए ‘स्पन्द निर्णय वृत्ति’ में क्षेमराज ने इस दर्शन को ‘स्पन्दशास्त्र’ कहा है—‘यथोक्तं स्पन्दशास्त्रे’ (स्पन्दनिर्णय) । [२] स्पन्दसूत्र एवं स्पन्द आचार्य उत्पलदेव ने ‘स्पन्द’ शब्द का व्यापक अर्थ न लेकर केवल ‘स्पन्द- कारिकाओं के लिए ही ‘स्पन्दशास्त्र’ का प्रयोग किया है । काश्मीर शैव दर्शन का साहित्य इन तीन भागों में विभक्त है—(१) ‘आगमशास्त्र’, (२) ‘स्पन्दशास्त्र’, (३) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र’ । काश्मीर शैव दर्शन का साधना-पक्ष ‘स्पन्दशास्त्र’ है । ‘स्पन्दशास्त्र’ में आगमों की भाँति सिद्धान्त-निरूपण मात्र ही नहीं है परपक्ष खण्डन एवं स्वपक्ष मण्डन वाली दार्शनिक शैली की प्रधानता भी आत्मीकृत नहीं हुई है । खण्डन-मण्डन सामान्य रूप से प्रस्तुत यदि है—सम्प्रदायों का नाम लेकर नहीं । स्पन्द शब्द की सोद्देश्यता— काश्मीरीय शैव दर्शन की एक शाखा ‘प्रत्यभिज्ञाशास्त्र’ के नाम से इसलिए प्रसिद्ध हुई क्योंकि इस दर्शन का चरम लक्ष्य ‘प्रत्यभिज्ञा’ (‘नूनं स एव ईश्वरोहमिति’) प्राप्त करना है । किन्तु इसी दर्शन की दूसरी शाखा का नाम ‘स्पन्द’ क्यों पड़ा ? दोनों के दार्शनिक सिद्धान्त दोनों की साधना-पद्धति एवं चिन्तन तो समान हैं तथा दोनों के आचार्य भी एक ही हैं फिर दूसरी शाखा को ‘स्पन्द’ क्यों कहा गया ? आचार्य वसुगुप्त के दार्शनिक चिन्तन की दो धारायें थीं—१) ‘शिवसूत्र’ और २) ‘स्पन्दकारिका’ । अद्वैतवादी काश्मीरी शैव दर्शन को दार्शनिक, तार्किक एवं खण्डनमण्डनात्मक दृष्टि देने का कार्य तो सोमानन्दपाद ने अपने ग्रन्थ ‘शिवदृष्टि’ के माध्यम से किया किन्तु ‘शिवदृष्टि’ भी शिवसूत्रों की ही व्याख्या है । सोमानन्द की ‘शिवदृष्टि’ को