स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
DevanagariHindipublished519 पृष्ठ
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प्रथमः निष्यन्दः ५५ स्पन्द तत्त्व का स्वरूप यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् । तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥ २ ॥ जिस स्पन्द तत्त्व में यह सम्पूर्ण कार्य जगत् (ज्ञानरूप से शक्त्यात्मक होकर) अवस्थित है, उसके (निमेष दशा में भी ज्ञानरूप होने के फलस्वरूप) अनाच्छादित रहने के कारण, (उसका कभी, किसी भी प्रकार) कहीं भी निरोध नहीं है ॥ २ ॥ "To him in whom this whole objective would take, the stand and from whom it comes out, an obstruction is nowhere possible because of his unenshrouded nature."
- सरोजिनी * प्रश्न यह है कि जिस शक्ति-चक्र-विभव-प्रभव शङ्कर के उन्मेष से जगत् का उदय एवं निमेष से जगत् का प्रलय हो जाता है उस शङ्कर स्वरूप विराट् एवं सर्वशक्तिमान आत्म संवित् का वैभव सांसारिक अवस्था में आच्छादित क्यों हो जाता है? 'ननु संसारावस्थायां कथं तस्करताऽऽत्मनि?'१ इसी शंका का निवारण करने के लिए कारिकाकार ने द्वितीय कारिका कही है: 'इत्याशंकोत्यदुर्दोषपरिहाराय तूच्यते ॥'२ 'यत्र' = जहाँ । जिस स्पन्दतत्त्व में ।३ जिस चिद्रूप स्वात्मा में ।४ 'स्थितं' = अवस्थित । 'इदं सर्वं' = मातृमेयमानात्मक समस्त इस (जगत्) को ॥५ इस समस्त जगत् को ।६ 'कार्यं'—(कारण रूप परमात्मा से समुत्पन्न) कार्यरूप जगत् को ॥ 'स्थितं' = निमेषावस्था में ज्ञान रूप से एवं शक्त्यात्मक स्वरूप में अवस्थित ॥७ 'यस्माच्चनिर्गतम्' = जिसके अन्तर्गर्भ से यह समस्त अंतर्लीन विश्व प्रकट होता है । निर्गतम् = अन्दर से बाहर निकलता है । (उद्भूत होता है ।) 'अनावृत' = अनाच्छादित (Unconcealed, unveiled) अनावृत क्यों हैं? क्योंकि शिव आनन्दघन एवं प्रकाशस्वरूप है इसीलिए उनका नाम ही है 'प्रकाश' । 'तस्य' = उन प्रकाशघन, आनन्दकन्द, महाप्रकाश का (जिसके प्रकाश से समस्त विश्व प्रकाशित होता है और स्थिति-लाभ करता है—'यत्प्रकाशेन प्रकाशमानं सत्स्थितिं लभते'८—वही है महाप्रकाशस्वरूप शिव ।) 'अनावृतरूपत्वात्' = (उसका) स्वरूप अना- च्छादित होने के कारण । बोधरूप होने से अनाच्छादित स्वस्वरूप होने के फलस्वरूप । 'न निरोधोऽस्ति' = निरोध (Obstruction) व्यवधान, विघ्नव्युत्सर्ग' (निः- शेषेण रोधः निरोधः = अवरोधः) ॥ १-३. स्पन्दप्रदीपिका—उत्पलाचार्य । ४-५. स्पन्दनिर्णय । ६-७. स्पन्दप्रदीपिका । ८. स्पन्दनिर्णय ।