भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

५६ स्पन्दकारिका बात यह है कि बोध की स्वयं की स्वतन्त्र सत्ता तो होती नहीं । अवबोधस्वरूप आत्मा दोनों अवस्थाओं में अनावृत है । प्राचीन आचार्य का वचन है—'स्वर्णाभूषणों में विचित्रता स्वर्ण से पृथक् नहीं हुआ करती । नित्यस्वरूप की विश्वरूपता भी ऐसी ही है । आभूषण-रहित स्वर्ण पिण्डात्मक है । वेद्यरहित आत्मा चिदात्मक है ॥— 'यथा हेम्नो रूपकेषु वैचित्र्यं स्वान्न रिच्यते । अथ नित्यस्वरूपस्य तथा ते विश्वरूपता ॥ यथा गलितरूपस्य हेम्नः पिण्डात्मना स्थितिः । तथा गलितवेद्यस्य तव शुद्धचिदात्मता ॥' 'ज्ञान सम्बोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है— १ कि—विश्व का आश्रय आकाश है, आकाश का आश्रय विश्व नहीं है । ज्ञान आकाश के समान अनन्त है और 'ज्ञेय' विश्व के समान अल्प है—यह किंचित् न्यूनसत्ताक है । यथा आकाश में किसी के द्वारा परिच्छेद या प्रतिबन्ध नहीं है क्योंकि वह व्यापक है उसी प्रकार यह ज्ञानस्वरूप भी प्रतिबन्ध-शून्य है— विश्वस्याश्रय आकाशं न विश्वं नभसो भवेत् । ज्ञानं नभ इवानन्तं ज्ञेयं विश्ववदल्पकम् ॥ आकाशस्येव वाऽन्येन प्रतिबन्धो न केनचित् । व्यापित्वात् तद्वदस्यापि ज्ञानस्याऽप्रतिबन्धता ॥२ 'यस्माच्च निर्गतम्' = जिसके भीतर से बाहर निकला है । यदि प्रथम कला (पूर्णा-हन्ता) में उसके सामरस्य में विश्व अवस्थित न होता तो किस प्रकार अविद्यमान जगत् की सृष्टि हो पाती ? अतः सृष्टिप्राक् स्वरूपाभिन्न विश्व की सत्ता अभ्युपेया है— 'यदा प्रथमायाः शिवात्मनः सामरस्यभूमेः पूर्णाहन्तात्मसामरस्यावस्थितं विश्वं यदि न भवति अविद्यमानं कथं सृजेत् ?'३ जिस प्रकार न्यग्रोध के बीज में विशाल न्यग्रोध वृक्ष शक्त्यात्मना अवस्थित रहता है किन्तु बाहर से उसमें अवस्थित नहीं दिखाई देता ठीक उसी प्रकार शक्ति के गर्भ में यह विश्व बीजात्मना स्थित रहता है भले ही प्रलयकाल में वह कहीं भी बाहर स्थित दिखाई न दे— 'यथा न्यग्रोधबीजस्य शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥४ यह निःशेष षट्त्रिंशादात्मक जगत् मुकुरनगरवत् शक्ति की स्वात्मभित्ति में स्वात्म- स्वरूपवत् अवस्थित है— सर्वं स्वात्मस्वरूपं मुकुरनगरवत्स्वस्वरूपात्स्वतन्त्र स्वच्छस्वात्मस्वभित्तौ फलयति धरणीतः शिवान्तं सदा या । दृग्देवी मन्त्रवीर्यं सतत समुदिता शब्दराश्यात्मपूर्णा, हन्तानन्तस्फुरत्ता जयति जगति सा शांकरी स्पन्दशक्ति ॥५ १. ज्ञान सम्बोध । २. स्पन्दप्रदीपिका में उद्धृत । ३. स्पन्दसन्दोह । ४. प० त्री० २४ । ५. आचार्य क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।