भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः ५७ इसीलिए कहा गया है कि यह समस्त जगत् मात्र विश्वगर्भा एवं जगज्जननी 'शक्ति' है— 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।।' चिदात्मा देव ही अन्तःस्थित एवं बहिःस्थित है— चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।१. महाचिति अपने ऐश्वर्य से स्वरूपात्मक आत्मभित्ति में विश्वाकार को प्रतिबिम्बित करती है— अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह, यद्वद्विचित्ररचना मुकुरान्तराले । बोधः पुनर्निजविमर्शनसारवृत्त्या, विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ।। 'तस्य'—इस वक्ष्यमाण तत्त्व का² 'न क्वचित्' = किसी भी देश, काल, आकार या अवस्था विशेष में ।³ 'निरोधः' = अवच्छेद । इदन्ता-इयत्ता व्यपदेश हेतु वेद्यवस्तुधर्म ।। 'अस्ति' = विद्यमान है । किस कारण से? 'अनावृतरूपत्वात्' = जात्याद्यभि- मानरूप मल द्वारा 'अनावृत' अनाच्छादित रूप होने के कारण ।⁴ उसके अनावृतत्त्वो- पपत्ति प्रतिपादन के लिए निम्न विशेषणों को प्रस्तुत करते हुए कारिकाकार कहते हैं— 'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं, यस्माच्च निर्गतम् ।'⁵ 'इदम्' = वेद्यतयावस्थित । 'सर्वम्' = 'यत्र यत्र दर्शने यथा-यथा परिकल्पितं'—ऐसे समस्त परिकल्पित कर्तृधीन कार्य ।⁶ 'यत्र' = जिसमें । वेदकत्व एवं कर्तृत्व के रूप में अवस्थित आधेय समस्त पदार्थ सार्थ सामान्या- धारभूत एक तत्त्व में । 'स्थितं' = उन-उन पृथिव्यादिघटपटगवादि रूप से लब्धप्रतिष्ठ । जिसके भीतर समस्त वस्तुओं का प्रकाशमान होने के कारण स्वरूपसत्तासादन ।⁷ सूर्यादि प्रकाशान्तर्गत जो घट परादिद्रव्य स्थित हैं वे अपने उन-उन रूपों में प्रकाशमान होने के कारण ही अपनी सत्ता में आसीन हैं । इसी प्रकार समस्त 'कार्य' भी स्थित है ।⁸ 'यस्माच्च' = प्रधानाविकारणान्तर परिहार के⁹ कारण; एककर्तृभूत एक कारण से ।। 'निर्गतम्' = उद्भूत ।।१० शङ्कर के यथार्थ स्वरूप के लिए कोई भी व्यवधान नहीं है—अर्थात् किसी भी देशकाल या आकार में उसके लिए कोई निरोध नहीं है—प्रसर-व्याघात नहीं है क्योंकि वह अनावृतरूप है और अस्थगितस्वभाव है ।११ चेतना के प्रकाश के निरोधक कौन हैं? इसके निरोधक निम्न हैं—(१) प्राण, (२) पुर्यष्टक, (३) सुख, नीलादिक । जो कुछ भी प्रकाशित है—वह प्रकाशाभिन्न शङ्कर के स्वरूप का है ।१२ आचार्य क्षेमराज शंका उपस्थित करते हैं कि यदि 'उत्पन्नस्य १. ई०प्र० (१।५।७) । २. अभिनवगुप्तपादाचार्य : (तं०सा०) । ३-१०. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति । ११-१२. स्पन्दनिर्णय ।