स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ स्पन्दकारिका स्थित्या आत्मा प्रकाशो भवति'—यह प्रमाणसिद्ध है तो इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई ? इसी के उत्तरस्वरूप क्षेमराज कहते हैं कि 'यस्माच्च'—पदावली इसी का उत्तर है । योगियों की स्मृति, स्वप्न, विचारणा-शक्ति (Ideation) रहस्यात्मक सृष्टि की शक्ति को ध्यान में रखते हुए संसार एवं चेतना में आकस्मिक सम्बन्ध का प्रत्याख्यान अनुचित है क्योंकि यह सम्बन्ध तो स्वात्मानुभूतिजन्य है । शिव या शक्ति को छोड़कर संसार, पदार्थ या परमाणु आदि को सृष्टि-विधायक मानना अनुचित है 'चितः स्वानुभव- सिद्धं जगत्कारणत्वं उज्झित्वा अप्रमाणकं अनुपपन्नं च प्रधान परमाणुवादीनां (कारणत्वं) न तत्कल्पयितुं युज्यते ॥' १ अतः (१) जगत् कर्तृत्व आत्मा का कार्य है । (२) जगत्कर्तृत्व परमाणु एवं प्रधान का कार्य नहीं है 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है—'अवस्था युगलं २ चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम् ॥' (१।१।४) 'सर्व' = 'सर्व' शब्द यहाँ पर उपादानादि निरपेक्ष्य समन्वित कर्तृत्व को संकेतित करता है । ३ क्षेमराज प्रश्न उठाते हैं कि 'निर्गत' शब्द की सार्थकता क्या है? इसकी सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब कि सृष्टि के पूर्व जगत् कहीं स्थित हो और वह अन्दर से बाहर निकले । क्या सृष्टि के पूर्व जगत् कहीं स्थित था ? इसका उत्तर देते हुए क्षेमराज कहते हैं कि—जगत् सृष्टि के पूर्व कहीं अन्यत्र स्थित नहीं था अपितु चिदात्मा में ही स्थित था क्योंकि यदि जगत् चिदात्मा में अहं प्रकाश से अभिन्न न होता तो उपादान निरपेक्षता संभव नहीं थी । किन्तु शक्ति उपादाननिरपेक्ष रहकर जगत् को प्रकट करती है— यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (प०त्री० २४) 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य' (ई०प्र० १।५।१०) यदि यह जगत् अहन्ता से अभिन्न चेतना के रूप में स्थित नहीं था तो यह उस चेतना से कैसे निर्गत हुआ ? यह बिना किसी उपादान की अपेक्षा के कैसे उत्पन्न हुआ? इसी का उत्तर—'यथा न्यग्रोध... चराचरम्' श्लोक द्वारा दिया गया है । यथा विशाल वट वृक्ष शक्त्यात्मना अपने बीज में स्थित पाया जाता है उसी प्रकार यह समस्त संसार शक्ति में बीजात्मना स्थित है और उससे अभिन्न है । यह चिदात्मा अपनी शक्ति के भौतिक रूपान्तर (Materialisation) के द्वारा जगत् को विकसित करता है । ४ यदि जगत् सृष्टि के पूर्व कहीं किसी में स्थित था तो किसमें स्थित था और किससे आविर्भूत, हुआ? ५ यदि यह स्वीकार कर लिया जाय कि यह 'चिदात्मा' एवं 'प्रकाशवपु' से, हिमालय से निर्गत गंगा की भाँति, बाहर निकलता है—स्वात्मा से निकलकर उससे पृथक् हो गया है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है । झोले से निकले अखरोट की भाँति यह जगत् चिदात्मा से नहीं निकला है । यह (जगत्) शक्ति के स्वात्मभित्ति से एवं उससे अभिन्नरूप में बाहर निकलता है । यह दर्पणनगरवत् स्थित है— 'स एव भगवान् स्व १-५. स्पन्दनिर्णय ।