स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ५९
स्वातन्त्र्याद् अनतिरिक्ताम् अपि अतिरिक्तां इव जगद्रूपां स्वभित्तौ दर्पणनगरवत् प्रकाशयन् स्थितः ।' प्रमाता चिति प्रमेय जगत् से पृथक् नहीं हैं । उत्पन्न विश्व प्रलयावस्था में भी परमात्मा से अभिन्न रहता है । तात्पर्य यह है कि— स्थान, समय, आकार आदि के स्वरूप को कोई भी वस्तु परमात्मा का अवरोधक नहीं है । यह विश्व उसका कार्य है और उसके प्रकाश के द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता है, स्थित रहता है और उससे अभिन्न रहता है । यहाँ तक कि प्रलय की दशा में भी परमात्मा का प्रकाश ही सभी पर प्रभावशील है । यह व्यापक तत्त्व है । यह विश्व परमात्मा में स्थित है और उससे अभिन्न है 'एतद् विश्व अभेदेन स्फुरत्स्थितं ततोऽयं चिदात्मा भगवान्निज रसाश्यानता रूपं जगदुन्मज्जयतीति युज्यते ।।' यह विश्व प्रकाशात्म शिव के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है । यह जगत् 'प्रकाश' से निर्गत है, यह प्रकाशस्वरूप है और 'प्रकाश' में ही स्थित है । इस अद्वैत तत्त्व का 'निरोध' संभव नहीं है क्योंकि यह आत्मानुभव-सिद्ध है । अतः जो तत्त्व सृष्टि, पालन एवं संहार तथा एकत्व को अभिव्यक्ति प्रदान करता है उसका कोई निरोधक नहीं है । वह अघटन घटनापटीयसी शक्ति है ।१ आचार्य क्षेमराज कारिका के मूल उद्देश्य पर पुनः ध्यानाकर्षण करते हुए कहते हैं कि योगी को सदैव अपने यथार्थ स्वरूप में समावेश-प्राप्त्यर्थ प्रयत्नशील रहना चाहिए चाहे यह कार्य—'यत्र स्थितं' (At the stage of ingoing) के स्तर पर हो और चाहे 'यस्माच्च निर्गतम्' (At the stage of outgoing) के स्तर पर हो क्योंकि उसका स्वरूप निरोधातीत (निरोध का अवरोध से अप्रभावित) है । संक्षोभ का ध्वंस होते ही परम पद की प्राप्ति हो ही जायेगी । परमात्मा अपने यथार्थ स्वरूप में निरोध या निषेध का विषय नहीं है क्योंकि अनात्मवादी सौगत भी यह मानता है कि 'वह तत्त्व' महा- प्रकाशस्वरूप एवं नित्य है ।२ जो अनात्मवादी निषेधदृष्टि रखते हैं और परमात्मा की सत्ता का प्रतिषेध करते हैं उनकी या तो सत्ता (Existence) होगी या असत्ता (Non- existence) । यदि उसकी असत्ता हुई तो यह निषेध की तस्वीर निषेधकर्ता के बिना तो आधारहीन हो जायेगी । यदि अन्यथा हुआ तो उसकी या इसकी सत्ता परमात्मा की सत्ता को सिद्ध ही कर देगा जो कि उससे अपृथक् है ।३ कारिकाकार कहते हैं कि शङ्कर तत्त्व यथार्थ स्वरूप से अपृथक् है और वह जगत् से अतीत है, विश्वरूप है एवं विश्व का सृजन, पालन एवं लय कर रहा है । उनके अनुसार समस्त ईश्वरवादी संप्रदायों में ध्यान का अंतिम विषय स्पन्द तत्त्व से भिन्न नहीं है । ध्यान में भिन्नता का आना स्पन्द तत्त्व के निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य४ मात्र के कारण है । यह समस्त विश्व इस 'स्पन्द तत्त्व' की क्रियाशक्ति का सार (Essance) है । यह बात भी 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबल- शालिनः' के द्वारा समर्थित है । अर्थ यह है कि—उस यथार्थ तत्त्व पर विश्वास करने पर मन्त्र सर्वज्ञत्वादि शक्ति से उपहित हो जाते हैं ।' अतः पूर्वोक्त आक्षेपों के लिए कोई स्थान ही नहीं हैं ।५ १-५. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।