भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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६० स्पन्दकारिका आचार्य क्षेमराज अन्त में कहते हैं कि मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि बुद्धिमान एवं पक्षपातहीन पाठक स्वयं स्पन्द सूत्रों पर लिखी गई अन्य टीकाकारों की टीकाओं में से मेरी टीका एवं उनकी टीकाओं का, जो कि अभ्यर्थित रत्न के समान मूल्यवान् हैं— अन्तर समझें एवं विभिन्नताओं की प्रशंसा करें। मैं शब्द प्रतिशब्द उन विभिन्नताओं को इसलिए सुस्पष्ट नहीं करना चाहता क्योंकि अन्यथा ग्रन्थ का कलेवर अधिक बढ़ जाएगा। १ भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार करते हैं—'कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः ? इति यद्युच्यते, तत् तत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्यावस्थायामपि अनाच्छादितस्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः अतः शिवत्वमुच्यते।' २ अभेदस्तर पर यह समस्त विश्व अहgroup/अहंरूप से एकात्मक होकर ही स्थित है। ३ आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं कि भगवती महाचिति या भगवती 'स्वतन्त्रा' बाह्योपादान की अपेक्षा किये बिना ही सृष्टि- काल में स्वस्वरूपाभिन्न अन्तस्थ जगत् को प्रकट करने एवं प्रलयकाल में उसे आत्म- संहृत कर लेने के व्यापारद्वय द्वारा वस्तुतः अपने को ही अपने से पृथक् रूप में प्रस्तुत: करते हुए समस्त विश्वसत्ता का मूल कारण हैं— (१) 'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ॥' ४ (१) (२) 'प्रकाशने स्थित्यात्मनि, परप्रमातृविश्रान्त्यात्मनि च संहारे पराशक्तिरूपा 'चितिः' एव भगवती 'स्वतन्त्रा' अनुत्तर विमर्शमयी शिवभट्टारिकाभिन्ना हेतुः कारणम् ॥' ५ क्योंकि— (३) ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित् । चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति । यतश्च इयमेव प्रमातृप्रमाणप्रमेयमयस्य विश्वस्य सिद्धौ प्रकाशने हेतुः । ६ (४) स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ २ ॥ स्वेच्छया न तु ब्रह्मादिवदन्येच्छया, तयैव च, न तु उपादानाद्यपेक्षया—'स्वभित्तौ' न तु अन्यत्र क्वापि, प्राक् निर्णीतं 'विश्वं' दर्पणे नगरवत् अभिन्नमपि भिन्नमिव 'उन्मील- यति' । ७ यह 'उन्मीलन' है क्या ? (५) उन्मीलनं च अवस्थितस्यैव प्रकटीकरम् । (६) इत्यनेन जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् उक्तम् । ८ इसीलिए कहा गया है कि भगवान् 'विश्वशरीर' है— १. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय । २-३. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति । ४-८. क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।