भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

५६ स्पन्दकारिका बात यह है कि बोध की स्वयं की स्वतन्त्र सत्ता तो होती नहीं । अवबोधस्वरूप आत्मा दोनों अवस्थाओं में अनावृत है । प्राचीन आचार्य का वचन है—'स्वर्णाभूषणों में विचित्रता स्वर्ण से पृथक् नहीं हुआ करती । नित्यस्वरूप की विश्वरूपता भी ऐसी ही है । आभूषण-रहित स्वर्ण पिण्डात्मक है । वेद्यरहित आत्मा चिदात्मक है ॥— 'यथा हेम्नो रूपकेषु वैचित्र्यं स्वान्न रिच्यते । अथ नित्यस्वरूपस्य तथा ते विश्वरूपता ॥ यथा गलितरूपस्य हेम्नः पिण्डात्मना स्थितिः । तथा गलितवेद्यस्य तव शुद्धचिदात्मता ॥' 'ज्ञान सम्बोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है— १ कि—विश्व का आश्रय आकाश है, आकाश का आश्रय विश्व नहीं है । ज्ञान आकाश के समान अनन्त है और 'ज्ञेय' विश्व के समान अल्प है—यह किंचित् न्यूनसत्ताक है । यथा आकाश में किसी के द्वारा परिच्छेद या प्रतिबन्ध नहीं है क्योंकि वह व्यापक है उसी प्रकार यह ज्ञानस्वरूप भी प्रतिबन्ध-शून्य है— विश्वस्याश्रय आकाशं न विश्वं नभसो भवेत् । ज्ञानं नभ इवानन्तं ज्ञेयं विश्ववदल्पकम् ॥ आकाशस्येव वाऽन्येन प्रतिबन्धो न केनचित् । व्यापित्वात् तद्वदस्यापि ज्ञानस्याऽप्रतिबन्धता ॥२ 'यस्माच्च निर्गतम्' = जिसके भीतर से बाहर निकला है । यदि प्रथम कला (पूर्णा-हन्ता) में उसके सामरस्य में विश्व अवस्थित न होता तो किस प्रकार अविद्यमान जगत् की सृष्टि हो पाती ? अतः सृष्टिप्राक् स्वरूपाभिन्न विश्व की सत्ता अभ्युपेया है— 'यदा प्रथमायाः शिवात्मनः सामरस्यभूमेः पूर्णाहन्तात्मसामरस्यावस्थितं विश्वं यदि न भवति अविद्यमानं कथं सृजेत् ?'३ जिस प्रकार न्यग्रोध के बीज में विशाल न्यग्रोध वृक्ष शक्त्यात्मना अवस्थित रहता है किन्तु बाहर से उसमें अवस्थित नहीं दिखाई देता ठीक उसी प्रकार शक्ति के गर्भ में यह विश्व बीजात्मना स्थित रहता है भले ही प्रलयकाल में वह कहीं भी बाहर स्थित दिखाई न दे— 'यथा न्यग्रोधबीजस्य शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥४ यह निःशेष षट्त्रिंशादात्मक जगत् मुकुरनगरवत् शक्ति की स्वात्मभित्ति में स्वात्म- स्वरूपवत् अवस्थित है— सर्वं स्वात्मस्वरूपं मुकुरनगरवत्स्वस्वरूपात्स्वतन्त्र स्वच्छस्वात्मस्वभित्तौ फलयति धरणीतः शिवान्तं सदा या । दृग्देवी मन्त्रवीर्यं सतत समुदिता शब्दराश्यात्मपूर्णा, हन्तानन्तस्फुरत्ता जयति जगति सा शांकरी स्पन्दशक्ति ॥५ १. ज्ञान सम्बोध । २. स्पन्दप्रदीपिका में उद्धृत । ३. स्पन्दसन्दोह । ४. प० त्री० २४ । ५. आचार्य क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः ५७ इसीलिए कहा गया है कि यह समस्त जगत् मात्र विश्वगर्भा एवं जगज्जननी 'शक्ति' है— 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।।' चिदात्मा देव ही अन्तःस्थित एवं बहिःस्थित है— चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।१. महाचिति अपने ऐश्वर्य से स्वरूपात्मक आत्मभित्ति में विश्वाकार को प्रतिबिम्बित करती है— अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह, यद्वद्विचित्ररचना मुकुरान्तराले । बोधः पुनर्निजविमर्शनसारवृत्त्या, विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ।। 'तस्य'—इस वक्ष्यमाण तत्त्व का² 'न क्वचित्' = किसी भी देश, काल, आकार या अवस्था विशेष में ।³ 'निरोधः' = अवच्छेद । इदन्ता-इयत्ता व्यपदेश हेतु वेद्यवस्तुधर्म ।। 'अस्ति' = विद्यमान है । किस कारण से? 'अनावृतरूपत्वात्' = जात्याद्यभि- मानरूप मल द्वारा 'अनावृत' अनाच्छादित रूप होने के कारण ।⁴ उसके अनावृतत्त्वो- पपत्ति प्रतिपादन के लिए निम्न विशेषणों को प्रस्तुत करते हुए कारिकाकार कहते हैं— 'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं, यस्माच्च निर्गतम् ।'⁵ 'इदम्' = वेद्यतयावस्थित । 'सर्वम्' = 'यत्र यत्र दर्शने यथा-यथा परिकल्पितं'—ऐसे समस्त परिकल्पित कर्तृधीन कार्य ।⁶ 'यत्र' = जिसमें । वेदकत्व एवं कर्तृत्व के रूप में अवस्थित आधेय समस्त पदार्थ सार्थ सामान्या- धारभूत एक तत्त्व में । 'स्थितं' = उन-उन पृथिव्यादिघटपटगवादि रूप से लब्धप्रतिष्ठ । जिसके भीतर समस्त वस्तुओं का प्रकाशमान होने के कारण स्वरूपसत्तासादन ।⁷ सूर्यादि प्रकाशान्तर्गत जो घट परादिद्रव्य स्थित हैं वे अपने उन-उन रूपों में प्रकाशमान होने के कारण ही अपनी सत्ता में आसीन हैं । इसी प्रकार समस्त 'कार्य' भी स्थित है ।⁸ 'यस्माच्च' = प्रधानाविकारणान्तर परिहार के⁹ कारण; एककर्तृभूत एक कारण से ।। 'निर्गतम्' = उद्भूत ।।१० शङ्कर के यथार्थ स्वरूप के लिए कोई भी व्यवधान नहीं है—अर्थात् किसी भी देशकाल या आकार में उसके लिए कोई निरोध नहीं है—प्रसर-व्याघात नहीं है क्योंकि वह अनावृतरूप है और अस्थगितस्वभाव है ।११ चेतना के प्रकाश के निरोधक कौन हैं? इसके निरोधक निम्न हैं—(१) प्राण, (२) पुर्यष्टक, (३) सुख, नीलादिक । जो कुछ भी प्रकाशित है—वह प्रकाशाभिन्न शङ्कर के स्वरूप का है ।१२ आचार्य क्षेमराज शंका उपस्थित करते हैं कि यदि 'उत्पन्नस्य १. ई०प्र० (१।५।७) । २. अभिनवगुप्तपादाचार्य : (तं०सा०) । ३-१०. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति । ११-१२. स्पन्दनिर्णय ।

५८ स्पन्दकारिका स्थित्या आत्मा प्रकाशो भवति'—यह प्रमाणसिद्ध है तो इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई ? इसी के उत्तरस्वरूप क्षेमराज कहते हैं कि 'यस्माच्च'—पदावली इसी का उत्तर है । योगियों की स्मृति, स्वप्न, विचारणा-शक्ति (Ideation) रहस्यात्मक सृष्टि की शक्ति को ध्यान में रखते हुए संसार एवं चेतना में आकस्मिक सम्बन्ध का प्रत्याख्यान अनुचित है क्योंकि यह सम्बन्ध तो स्वात्मानुभूतिजन्य है । शिव या शक्ति को छोड़कर संसार, पदार्थ या परमाणु आदि को सृष्टि-विधायक मानना अनुचित है 'चितः स्वानुभव- सिद्धं जगत्कारणत्वं उज्झित्वा अप्रमाणकं अनुपपन्नं च प्रधान परमाणुवादीनां (कारणत्वं) न तत्कल्पयितुं युज्यते ॥' १ अतः (१) जगत् कर्तृत्व आत्मा का कार्य है । (२) जगत्कर्तृत्व परमाणु एवं प्रधान का कार्य नहीं है 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है—'अवस्था युगलं २ चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम् ॥' (१।१।४) 'सर्व' = 'सर्व' शब्द यहाँ पर उपादानादि निरपेक्ष्य समन्वित कर्तृत्व को संकेतित करता है । ३ क्षेमराज प्रश्न उठाते हैं कि 'निर्गत' शब्द की सार्थकता क्या है? इसकी सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब कि सृष्टि के पूर्व जगत् कहीं स्थित हो और वह अन्दर से बाहर निकले । क्या सृष्टि के पूर्व जगत् कहीं स्थित था ? इसका उत्तर देते हुए क्षेमराज कहते हैं कि—जगत् सृष्टि के पूर्व कहीं अन्यत्र स्थित नहीं था अपितु चिदात्मा में ही स्थित था क्योंकि यदि जगत् चिदात्मा में अहं प्रकाश से अभिन्न न होता तो उपादान निरपेक्षता संभव नहीं थी । किन्तु शक्ति उपादाननिरपेक्ष रहकर जगत् को प्रकट करती है— यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (प०त्री० २४) 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य' (ई०प्र० १।५।१०) यदि यह जगत् अहन्ता से अभिन्न चेतना के रूप में स्थित नहीं था तो यह उस चेतना से कैसे निर्गत हुआ ? यह बिना किसी उपादान की अपेक्षा के कैसे उत्पन्न हुआ? इसी का उत्तर—'यथा न्यग्रोध... चराचरम्' श्लोक द्वारा दिया गया है । यथा विशाल वट वृक्ष शक्त्यात्मना अपने बीज में स्थित पाया जाता है उसी प्रकार यह समस्त संसार शक्ति में बीजात्मना स्थित है और उससे अभिन्न है । यह चिदात्मा अपनी शक्ति के भौतिक रूपान्तर (Materialisation) के द्वारा जगत् को विकसित करता है । ४ यदि जगत् सृष्टि के पूर्व कहीं किसी में स्थित था तो किसमें स्थित था और किससे आविर्भूत, हुआ? ५ यदि यह स्वीकार कर लिया जाय कि यह 'चिदात्मा' एवं 'प्रकाशवपु' से, हिमालय से निर्गत गंगा की भाँति, बाहर निकलता है—स्वात्मा से निकलकर उससे पृथक् हो गया है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है । झोले से निकले अखरोट की भाँति यह जगत् चिदात्मा से नहीं निकला है । यह (जगत्) शक्ति के स्वात्मभित्ति से एवं उससे अभिन्नरूप में बाहर निकलता है । यह दर्पणनगरवत् स्थित है— 'स एव भगवान् स्व १-५. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः ५९

स्वातन्त्र्याद् अनतिरिक्ताम् अपि अतिरिक्तां इव जगद्रूपां स्वभित्तौ दर्पणनगरवत् प्रकाशयन् स्थितः ।' प्रमाता चिति प्रमेय जगत् से पृथक् नहीं हैं । उत्पन्न विश्व प्रलयावस्था में भी परमात्मा से अभिन्न रहता है । तात्पर्य यह है कि— स्थान, समय, आकार आदि के स्वरूप को कोई भी वस्तु परमात्मा का अवरोधक नहीं है । यह विश्व उसका कार्य है और उसके प्रकाश के द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता है, स्थित रहता है और उससे अभिन्न रहता है । यहाँ तक कि प्रलय की दशा में भी परमात्मा का प्रकाश ही सभी पर प्रभावशील है । यह व्यापक तत्त्व है । यह विश्व परमात्मा में स्थित है और उससे अभिन्न है 'एतद् विश्व अभेदेन स्फुरत्स्थितं ततोऽयं चिदात्मा भगवान्निज रसाश्यानता रूपं जगदुन्मज्जयतीति युज्यते ।।' यह विश्व प्रकाशात्म शिव के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है । यह जगत् 'प्रकाश' से निर्गत है, यह प्रकाशस्वरूप है और 'प्रकाश' में ही स्थित है । इस अद्वैत तत्त्व का 'निरोध' संभव नहीं है क्योंकि यह आत्मानुभव-सिद्ध है । अतः जो तत्त्व सृष्टि, पालन एवं संहार तथा एकत्व को अभिव्यक्ति प्रदान करता है उसका कोई निरोधक नहीं है । वह अघटन घटनापटीयसी शक्ति है ।१ आचार्य क्षेमराज कारिका के मूल उद्देश्य पर पुनः ध्यानाकर्षण करते हुए कहते हैं कि योगी को सदैव अपने यथार्थ स्वरूप में समावेश-प्राप्त्यर्थ प्रयत्नशील रहना चाहिए चाहे यह कार्य—'यत्र स्थितं' (At the stage of ingoing) के स्तर पर हो और चाहे 'यस्माच्च निर्गतम्' (At the stage of outgoing) के स्तर पर हो क्योंकि उसका स्वरूप निरोधातीत (निरोध का अवरोध से अप्रभावित) है । संक्षोभ का ध्वंस होते ही परम पद की प्राप्ति हो ही जायेगी । परमात्मा अपने यथार्थ स्वरूप में निरोध या निषेध का विषय नहीं है क्योंकि अनात्मवादी सौगत भी यह मानता है कि 'वह तत्त्व' महा- प्रकाशस्वरूप एवं नित्य है ।२ जो अनात्मवादी निषेधदृष्टि रखते हैं और परमात्मा की सत्ता का प्रतिषेध करते हैं उनकी या तो सत्ता (Existence) होगी या असत्ता (Non- existence) । यदि उसकी असत्ता हुई तो यह निषेध की तस्वीर निषेधकर्ता के बिना तो आधारहीन हो जायेगी । यदि अन्यथा हुआ तो उसकी या इसकी सत्ता परमात्मा की सत्ता को सिद्ध ही कर देगा जो कि उससे अपृथक् है ।३ कारिकाकार कहते हैं कि शङ्कर तत्त्व यथार्थ स्वरूप से अपृथक् है और वह जगत् से अतीत है, विश्वरूप है एवं विश्व का सृजन, पालन एवं लय कर रहा है । उनके अनुसार समस्त ईश्वरवादी संप्रदायों में ध्यान का अंतिम विषय स्पन्द तत्त्व से भिन्न नहीं है । ध्यान में भिन्नता का आना स्पन्द तत्त्व के निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य४ मात्र के कारण है । यह समस्त विश्व इस 'स्पन्द तत्त्व' की क्रियाशक्ति का सार (Essance) है । यह बात भी 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबल- शालिनः' के द्वारा समर्थित है । अर्थ यह है कि—उस यथार्थ तत्त्व पर विश्वास करने पर मन्त्र सर्वज्ञत्वादि शक्ति से उपहित हो जाते हैं ।' अतः पूर्वोक्त आक्षेपों के लिए कोई स्थान ही नहीं हैं ।५ १-५. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।

२. द्वितीय निःष्यन्द: सहज-विद्या समुदय (नाड़ी-संहार एवं बिन्दु-नाद रहस्य)

६० स्पन्दकारिका आचार्य क्षेमराज अन्त में कहते हैं कि मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि बुद्धिमान एवं पक्षपातहीन पाठक स्वयं स्पन्द सूत्रों पर लिखी गई अन्य टीकाकारों की टीकाओं में से मेरी टीका एवं उनकी टीकाओं का, जो कि अभ्यर्थित रत्न के समान मूल्यवान् हैं— अन्तर समझें एवं विभिन्नताओं की प्रशंसा करें। मैं शब्द प्रतिशब्द उन विभिन्नताओं को इसलिए सुस्पष्ट नहीं करना चाहता क्योंकि अन्यथा ग्रन्थ का कलेवर अधिक बढ़ जाएगा। १ भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार करते हैं—'कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः ? इति यद्युच्यते, तत् तत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्यावस्थायामपि अनाच्छादितस्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः अतः शिवत्वमुच्यते।' २ अभेदस्तर पर यह समस्त विश्व अहgroup/अहंरूप से एकात्मक होकर ही स्थित है। ३ आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं कि भगवती महाचिति या भगवती 'स्वतन्त्रा' बाह्योपादान की अपेक्षा किये बिना ही सृष्टि- काल में स्वस्वरूपाभिन्न अन्तस्थ जगत् को प्रकट करने एवं प्रलयकाल में उसे आत्म- संहृत कर लेने के व्यापारद्वय द्वारा वस्तुतः अपने को ही अपने से पृथक् रूप में प्रस्तुत: करते हुए समस्त विश्वसत्ता का मूल कारण हैं— (१) 'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ॥' ४ (१) (२) 'प्रकाशने स्थित्यात्मनि, परप्रमातृविश्रान्त्यात्मनि च संहारे पराशक्तिरूपा 'चितिः' एव भगवती 'स्वतन्त्रा' अनुत्तर विमर्शमयी शिवभट्टारिकाभिन्ना हेतुः कारणम् ॥' ५ क्योंकि— (३) ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित् । चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति । यतश्च इयमेव प्रमातृप्रमाणप्रमेयमयस्य विश्वस्य सिद्धौ प्रकाशने हेतुः । ६ (४) स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ २ ॥ स्वेच्छया न तु ब्रह्मादिवदन्येच्छया, तयैव च, न तु उपादानाद्यपेक्षया—'स्वभित्तौ' न तु अन्यत्र क्वापि, प्राक् निर्णीतं 'विश्वं' दर्पणे नगरवत् अभिन्नमपि भिन्नमिव 'उन्मील- यति' । ७ यह 'उन्मीलन' है क्या ? (५) उन्मीलनं च अवस्थितस्यैव प्रकटीकरम् । (६) इत्यनेन जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् उक्तम् । ८ इसीलिए कहा गया है कि भगवान् 'विश्वशरीर' है— १. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय । २-३. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति । ४-८. क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।

प्रथमः निष्यन्दः ६१ 'एवं भगवान् विश्वशरीरः ।।'१ 'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं ।।' 'न सावस्थानयः शिवः ।।२ कारणकार्यवाद (Cause and Effect Theory) के सिद्धान्तों में दार्शनिकों ने निम्न दृष्टियाँ प्रस्तुत कीं— (१) असत् से सत् उत्पन्न हुआ—'असतः सज्जायत्' (२) सत् से असत् उत्पन्न हुआ—'सतः असज्जायत् ।।' (३) सत् से सत् उत्पन्न हुआ—'सतः सज्जायत्' (४) सत् से अनिर्वचनीय कार्य उत्पन्न हुआ । सांख्यदर्शन 'सत्कार्यवाद' का प्रतिपादक है— १. असदकरणात् २. उपादानग्रहणात् ३. सर्वसंभवाभावात् ४. शक्तस्य शक्य- करणात् ५. कारणभावात्—सत्कार्यवाद प्रस्थापित होता है—अर्थात् विश्वरूप कार्य मूलप्रकृतिरूप कारण में अव्यक्तावस्था में विद्यमान रहता है । त्रिक दर्शन भी सत्कार्यवाद का पोषक है तथापि त्रिक दर्शन का अपना स्वतन्त्र कारणकार्यवाद का सिद्धान्त है । यह 'स्वातन्त्र्यवाद' का प्रतिपादन करता है । 'यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे' की ही भाँति 'यदन्तः तद्बहिः' भी एक शाश्वत नियम है । जिस प्रकार एक वट बीज में जड़, अंकुर, तना, शाखा, पत्ते, पुष्प एवं फल इत्यादि अवस्थित माने जाते हैं उसी प्रकार अनेकात्मक विश्व एकीभाव में स्पन्दात्मिका विमर्शभूमिका में अवस्थित है । समस्त प्रमेय पदार्थ विमर्श के रूप में अवस्थित है । आन्तर तत्त्व ही बाह्य रूप में अवभासित होता है । अन्तर्जगत का बाह्यावभासन जगत् है । संवित् तत्त्व प्रसारस्वभाव है । बाहर वही स्थित है जो अन्दर स्थित है । दोनों में पूर्णैक्य है । प्रत्येक प्राणी का जो आभ्यन्तरिक विमर्शन होता है उसमें प्रमेय पदार्थ उस विमर्श के रूप में ही अवस्थित रहते हैं 'घट' 'पट' कुंभकार एवं वयनजीवी के आन्त- र्विमर्श के बाह्यावभास के अतिरिक्त और क्या हैं? कुंभकार कुंभ की रचना के पूर्व कुंभ के आकार, गोलाई, आकृति रंग आदि का आन्तर विमर्शन करता है और उसका यह अन्तर्विमर्श ही बाह्य घट के रूप में आविर्भूत होता है । कुंभकार के अन्तर्विमर्श में निःशेष वाच्य पदार्थ उसके अहं—विमर्श से अभिन्न रूप में ही तो रहते हैं जिन्हें कि वह घट, शराव, सुराही आदि के रूप में आविर्भूत करता है । भट्टकल्लट प्रश्न करते हैं ? जब स्वस्वभाव शङ्कर ही संसारी बनकर जगत् के संसरणचक्र में आबद्ध हो जाते हैं तो उन्हें उस संसारी (पशु०) रूप में 'शिव' कैसे कहा जा सकता है?—इसी प्रश्न का उत्तर देने हेतु कारिकाकार का कथन है कि अद्वैतात्मक भूमिका में जहाँ कि भेद ही नहीं है— यह समस्त जगत् 'अहं' रूप में स्थित है और जिसके द्वारा इसका आविर्भाव अहरूपत्व का त्याग करके 'इंदरूप' में अवभासित होता है उस अहंविमर्शनरूपात्मक स्वभाव के स्तर पर सांसारिक दशा में भी उस चिद्रूप संवित् तत्त्व पर कोई आवरण नहीं है अतः उसकी १-२. क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।

६२ स्पन्दकारिका स्वतन्त्रता के मार्ग में कोई-कोई प्रतिबन्धक भी नहीं है। इसी कारण उस परतत्त्व को 'शिव' नाम से पुकारा जाता है। 'कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसरिणः शिवत्वेन निर्देशः—इति यद्युच्यते' तत् यत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्यवस्थायामपि अनाच्छादितस्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः अतः शिवत्वमुच्यते ॥' विमर्श में यह स्वातन्त्र्य है कि अपने आन्तरविमर्शस्वरूप वाच्यों को आकार दे कर इन्हें स्थूल रूप में प्रस्तुत कर दे। संवित् तत्त्व (सामान्य स्पन्द भूमिका) ही प्रमेयात्मक जगत् के प्रत्येक ४ पदार्थ के रूप में अवस्थित है। प्रत्येक पदार्थ में उसीका प्रवाह है। यह शंका उठने पर कि शरीर, इन्द्रिय, विषय, घट, पट आदि रूपों में जो स्वभावगत वैभिन्य है—भेदात्मकता है—अनेकत्व है उसे शिव रूप एकत्व की संज्ञा कैसे दी जाय? इसका उत्तर यह है कि प्रमेयगत अनेकत्व में भी अहं विमर्शगत एकाकारता तो निहित है ही जो कोई भी पदार्थ या सत्ता 'विमर्श' में विद्यमान है उसी का तो बाह्यावभासन होता है। एक ही तो अनेक में अवभासित हो रहा है— १. 'तदैक्षत प्रजायेय । एकोऽहं बहुस्याम्' २. 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' । ३. 'अहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् । शून्यं चाशून्यं च । ... अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधामि । अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि— श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् ॥' ४. एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति । इन दृष्टियों से 'कारण' एवं 'कार्य' में, सूक्ष्म एवं स्थूल में, 'अहं' और 'इदं' में कोई मौलिक पार्थक्य नहीं है। 'परात्रिंशिका' में कहा गया है— 'यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥' जिस प्रकार कि छोटे से बीज से बड़ का विशाल वृक्ष निहित रहता है उसी प्रकार हृदय बीज में यह समस्त चराचर जगत् निहित है। अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं— 'यथा वटबीजे तत्समुचितेनैव वपुषा अंकुर-विटप-पत्र-फलानि तिष्ठन्ति एवं विश्वमिदं हृदयान्तः ॥' अभिनव गुप्त—'परात्रिंशिका विवृति' । आन्तर कल्पना ही बाह्य पदार्थ के रूप में रूपान्तरित होती है। यदि कुंभकार के आन्तर विमर्श में घट का विमर्शन हो ही नहीं तो घट बाह्य सत्ता की वस्तु कभी नहीं बन सकता । 'घट' कुंभकार के आन्तरविमर्श के बाह्य अवभास के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' में इसी तथ्य को इस प्रकार कहा गया है— 'तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद् बहिः ॥'

प्रथमः निष्यन्दः ६३ सारांश यह कि प्रमाता के आन्तर विमर्श में ही सारे वाच्य पदार्थ आन्तर्विमर्श के ही रूप में—अहं से अभिन्न रूप में ही—अवस्थित रहते हैं और अन्तःचेतना में विमर्श- स्वरूप प्रमेय (वाच्य पदार्थ) ही बाह्य पदार्थ के रूप मे (अभिव्यक्त होकर) अव- भासित होते हैं । प्रमेयों की अनेकाकारता में भी प्रमाता के अहं परामर्श की एकाकारता विद्यमान है । उन्मेष निमेषात्मक स्पन्द (स्वातन्त्र्यशक्ति = आनन्द शक्ति) का स्वभाव एवं कार्य यह है कि वह— (१) आन्तरविमर्शस्वरूप भाववर्ग को नानात्मक बाह्य प्रमेयों के रूप में अवभासित करता है और (२) अनेकात्मक रूपों में बाह्यावभासित भाववर्ग को पुनः विमर्शात्मक एकाकारता में लय कर देता है । 'इदं' रूप में भासमान (अवभासित) निःशेष प्रमेय वर्ग संविद्रूप 'अहं' का ही बाह्यावभासन है । वर्तमानावभासानां भावानामवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ॥ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा) अंतस्थ भाव ही तो बाह्य भावजात है— 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् ॥ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा) 'ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य' प्रत्येक जड़ या चेतन पदार्थ का स्वभाव है और वह आवरण शून्य है— चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । तस्यानावृतरूपत्वात् शिवत्वं केन वार्यते ॥ (शि०सू०वा०) यथा दर्पण में प्रतिबिम्बित नगरादिक का प्रतिबिम्ब दर्पणातिरिक्त न होते हुए भी पृथक्वत् दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार चित् शक्ति के दर्पण में प्रतिबिम्बित जगद्रूप प्रतिबिम्ब चिद्रूप ही है उससे अतिरिक्त नहीं— 'दर्पणबिम्बे यद्वन्नगरग्रामादि चित्रमविभाति । भाति विभागनैव च परस्परं दर्पणादपि च ॥ विमलतम परम भैरवबोधात् तद्वद् विभागशून्यमपि । अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ॥ (प०सा०) 'स्पन्दनिर्णय' में भी इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है— 'स एव भगवान् स्वस्वातन्त्र्यादनतिरिक्तामत्यतिरिक्ताभिव । जगद्रूपतो स्वभित्तौ दर्पणनगरवत्प्रकाशयन् स्थितः ॥' साधारण मुकुर में तो १. बिम्ब २. प्रतिबिम्ब ३. मुकुर तीनों पृथक् हैं किन्तु चिद्रूप मुकुर (चिद्दर्पण) में बिम्ब, प्रतिबिम्ब एवं चिद्दर्पण तीनों अभिन्न एवं एक ही है । बाह्य जगत् ही विश्वशरीरी का अपना ही शरीर है—

६४ स्पन्दकारिका १. 'एवं भगवान् विश्वशरीरः तथा 'चितिसंकोचात्मा' संकुचिद्रूपः'१ २. 'चेतनो' ग्राहकोऽपि वटधानिकावत् संकुचिताशेषविश्वरूपः ॥'२ ३. 'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं'३ ४. 'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित्'४ ५. 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् ।'५ ६. 'एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिताः सर्वा इमा भूमिकाः स्वातन्त्र्य-प्रच्छादनोन्मीलनतारतम्यभेदिताः ॥'६ ७. 'चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेदव्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिम् अवलम्बते । ... अयं मलावृतः संसारी भवति ।'७ ८. चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृतः संसारी ॥ ९ ॥८ कारिका का सारांश—जिस स्पन्दरूपात्मिका विमर्शभूमिका में यह निखिल प्रमेय रूप प्रपञ्च अभेदात्मना अवस्थित है और जिसके माध्यम से इसका बहिर्मुख निर्गमन होता है उस परा एवं शाश्वतिक सत्ता को कोई भी आवरण ढक नहीं सकता अतः उसके अनावृतस्वरूप होने के कारण उसके अपने स्वतन्त्र प्रसार (विकास या विस्तार) में कोई भी प्रतिबन्धक नहीं है। आचार्य भट्टकल्लट कारिकावृत्ति में प्रश्न उठाते हैं कि जब स्वस्वभाव शङ्कर ही संसारी बनकर आवागमन (संसरण) के चक्र में फँस जाता है तब उसे इस रूप में 'शिव' कैसे कहा जा सकता है? इसी पूर्वपक्ष का उत्तर देते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि— १. अनादि काल से ही यह समस्त जगत् अभेदस्तर पर अहंकरूप में अवस्थित है तथा जिस परा सत्ता के द्वारा इस जगत् का आविर्भाव अहंरूपता से पृथक् होकर इदं-रूपता के स्वरूप में अवभासित होता है उस सत्ता के 'स्वभाव' (अहंविमर्शात्मक एक-रूपता, एकाकारता) के ऊपर संसारी अवस्था में कोई प्रतिबन्धक आवरण नहीं पड़ा है अतः उसके पूर्ण स्वतन्त्र प्रसरण की दिशा में कहीं कोई भी निरोध (या प्रतिबन्ध या रुकावट) संभव नहीं है। इसी कारण इस परा सत्ता को 'शिव' कहा जाता है। अनाच्छादितस्वभाव होने के कारण शिव के प्रसार में कहीं कोई गतिरोध नहीं है और इसी अनावृतता, निर्बंधकता, निरपेक्ष एवं स्वतन्त्र प्रसार के कारण इसे 'शिव' कहा जाता है। इस कारिका में 'कर्तृत्व' एवं 'कार्यत्व' का स्फुट विवेचन है—'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं, यस्माच्च निर्गतम्।' (कार्य + कारण) कारणकार्यभाव १. कार्य-जगत् २. कारण-शिव। शिवत्व क्या है? निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य—'अतः शिवत्वमुच्यते।' वह अनियंत्रित शक्तिधर, अनियंत्रित ईश्वर, अनियंत्रित अनुग्रहात्मा, अनियंत्रित स्रष्टा एवं अनियंत्रित संहर्ता है— १-८. क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।

प्रथमः निष्यन्दः ६५ 'नित्यं विसर्गपरमः स्वशक्तौ परमेश्वरः । अनुग्रहात्मा, स्रष्टा च संहर्ता चानियंत्रितः ।।' (त्रिकहृदय) सोमानन्दपाद कहते हैं—'ईश्वरस्य स्वतन्त्रस्य केनेच्छा वा विकल्प्यते ?' 'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम्' १. सभी पदार्थ सामरस्य में अवस्थित रहते हैं—(सोमानन्द) 'तस्मात्सर्वपदार्थानां सामरस्यमवस्थितम्' (शि०दृ०) २. सभी पदार्थ भगवान् की इच्छा-सामग्री से ही प्रकट होते हैं (सोमा०) योगिनामिच्छया यद्वन्नानारूपोपपत्तिता । न चास्ति साधनं किंचिन्मृदादीच्छां विना प्रभोः । तथा भगवदिच्छेव तथात्वेन प्रजायते ।।' (शिवदृष्टि) एवं सर्वेषु भावेषु यथा सा शिवरूपता । (सोमानन्द) ३. सभी पदार्थों, एवं भावों में शिवरूपता ही व्यक्त हो रही है (सोमानन्द) 'भगवदिच्छामात्रमेव विश्वरूपत्वं संपद्यते ।। (शि० दृ०) 'एवं सर्वपदार्थानां समैव शिवता स्थिता (शि० दृ०) यहाँ तक कि भेदप्रभेद भी शिवमय ही है—'भेदा अपि तदात्मकाः ।। (शि०दृ० वृत्ति) ।। 'तथा नाना शरीराणि भुवनानि तथाविसृज्य रूपं गृह्णाति प्रोत्कृष्टाधममध्यमम् ।। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शिव ही जगत् रूप कार्य भी है और उसका कारण भी है—यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च । मकड़ी और उसके जाले में क्या अन्तर है? कर्ता भी वही कार्य भी वही ।। अतः 'न सावस्था न यः शिवः ।। (स्पन्दकारिका) ।। विमर्श और सृष्टि-उन्मेषवाद उन्मेषवाद और 'विमर्श'—इस दर्शन में सृष्टिक्रम को पाँच कलाओं के क्रमा- नुसार उन्मेष संज्ञा दी गई है । 'उन्मेष' का अर्थ चक्षु-उन्मीलन ग्रहण करना यहाँ पर उपपन्न नहीं है प्रत्युत उन्मेष का अर्थ है—ज्ञान-प्रस्फुरण ।। 'दृश्य जगत' धाता के संकल्प का उन्मेष है—'सोऽकामयत्' 'बहुस्यां प्रजायेय' में इच्छासृष्टिवाद का प्रतिपादन किया गया है । 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' १. 'यथा धाता पूर्वमकल्पयत् ।।' २. कामस्तदग्रे समवर्तताधि ।।' ३. 'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ।' प्रपञ्च है धाता के संकल्प या समवर्तन का परिणाम ।। सृष्टि के रूप में विशेष रूप से या समरूप से वर्तमान होना ही 'विवर्तन' है । 'परमशिव' ज्ञानरूप चिन्मात्र 'ज्ञः' है । उसमें उन्मेषाविर्भाव होने पर दो विमर्शों का उदय स्पं० ५

६६ स्पन्दकारिका होता है—१. ‘अहम्’ २. ‘इदम्’ ‘इदम्’ के साथ-कला, काल, नियति, विद्या, राग एवं माया रूप कंचुकों का योग होने से जीवों का इदमात्मक विमर्श भेदात्मक, बन्धनात्मक एवं मितप्रमातृत्व का होता है । परमशिव का अहमात्मक विमर्श अभेद, अद्वैत, सामरस्यात्मक एवं मुक्तिस्वरूप होता है । विमर्शों के भेद के कारण ही विमर्श भी शुद्ध एवं अशुद्ध होते हैं । स्वप्न के अस्त होने पर स्वप्न का समस्त जगत् (ज्ञः का सारा विमर्श) ज्ञः में विलीन हो जाता है । विमर्श एवं विमर्शक में भेद नहीं है अतः अभेदस्तर पर विश्वप्रमाता एवं प्रमेय विश्व में कोई भेद नहीं रहता । दोनों अहं में विश्रान्त रहते हैं । १. ‘यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यम्’ २. ‘यस्माच्च निर्गतम्’—इन वाक्यों पर ध्यान दें तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि— क) सृष्टि के अभेद, भेदाभेद एवं भेद किसी भी स्तर पर किसी नव्य पदार्थ या सत्ता की उत्पत्ति एवं उसका संहार नहीं होता । तिल में तेल की भाँति, अभेद के स्तर पर जो विश्व अभी कारण में अस्फुट था वही अब कारण से पृथक् होकर उत्पन्न कहलाने लगा किन्तु कोई नयी सृष्टि नहीं हुई । ख) ‘आविर्भाव’ उत्पत्ति नहीं प्रत्युत् प्रकटीकरण (‘निर्गतम्’) है । सांख्य का सत्कार्यवाद तथा उपनिषद का ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इस सिद्धान्त के निकट हैं । भेद यह है कि सांख्य का सत्कार्यवाद भेदाश्रित है जब कि स्पन्दशास्त्र का अभेदाश्रित । शिव का ‘स्वभाव’ अहंविमर्शरूप एकाकारता ही तो है । ‘यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे’ ‘यदन्तस्तद्बहिः’ का सिद्धान्त ही स्पन्द को मान्य है । ‘अहमस्मि’ ‘अहमिदम्’ ‘इदमहम्’ ‘अहञ्चेदञ्च पृथक्-पृथक्’—ये सभी विमर्शों के रूप ही तो हैं और तद्वत उनकी पृथक्-पृथक् सृष्टियाँ भी हैं । शिव का ‘स्वातन्त्र्य’, ‘स्वभाव’ ‘उन्मेषनिमेषात्मक स्पन्द-क्रीड़ा’ क्या है? आन्तर विमर्श में अहमाकार रूप में अवस्थित एकाकार विश्ववैचित्र्य को अनेक नामरूपात्मक स्वरूपों में अपने में अव- भासित करना एवं पुनः इस नानात्मक जगत् को अपने अहं में एकाकारित करके उसे उपसंहृत रखने की क्रीड़ा ही तो शिव का स्वभाव, शिव की क्रीड़ा, आन्तर स्पन्द आदि कहलाता है । ‘स्पन्द’ की सृष्टि ‘स्वातन्त्र्यवाद’ एवं ‘अवभासवाद’ के सिद्धान्तों पर समाश्रित है न कि—‘विवर्तवाद’ ‘परिणामवाद’ या ‘असत्कार्यवाद’ पर ।। ‘इदम्’ रूप में स्फुटतः भासमान समस्त प्रमेय पदार्थ शिव के ‘स्वांग’ हैं । मायाशक्ति के द्वारा उनका भिन्नतया-वभासन वैसा ही है यथा एक ही मिट्टी में अनेक घड़ों का मिट्टी से पृथक् सत्ता के रूप में अवभासन । एकता में अनेकात्मकता एवं अनेकात्मकता में एकात्मकता का अवभासन निरन्तर करते रहना ही तो शिव का ‘स्वधर्म’, ‘स्वस्वभाव ‘स्वातन्त्र्य’ एवं ‘विमर्श’ है । ‘विमर्श’ उनकी शक्ति है अतः जगत् भी शिव की शक्ति का एक रूप है । कुंभकार के आन्तर विमर्श में घड़े के आकार-प्रकार आदि में सदा रहता है । कुंभकार का घटाकार विमर्श ही घट है और शिव का अपने अहं में विश्वाकार भेदात्मक विमर्श ही विश्व है । ‘उत्पत्ति’ नहीं होती अवभासन होता है—किन्तु अवभासन

प्रथमः निष्यन्दः ६७ 'परिणाम' एवं 'विवर्त' नहीं है। आन्तर विमर्श में निखिल वाच्य (प्रमेय) पदार्थ विमर्श के रूप में ही 'अहं' से अभिन्न रूप में अवस्थित रहते हैं किन्तु विमर्श अपने में स्थित इन अभिन्नाकार प्रमेयों को भिन्नाकार देकर विश्व के रूप में अवभासित कर देती है। इसी तथ्य को 'परात्रिंशिका' (२४) में इस प्रकार कहा गया है— यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदय बीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (२४) एवं यो वेत्ति तत्त्वेन तंस्य निर्वाणगामिनी । दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (२५) 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' (१।१.६.७) में कहा गया है— 'तदेवं व्यवहारोऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद् बहिः ॥' आन्तर विमर्श ऐन्द्रजालिक का झोला नहीं—है कि उसमें अखरोट पिस्ता एवं बादाम के रूप में विभिन्न पदार्थ भरे हैं और सृष्टि के समय निकल पड़ते हों—'एतदुक्तं भवति न प्रसवेकादिवाक्षोटादि तत् तस्मात् निर्गतम्' (क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय') शाङ्कर भूमिका में विश्वस्पन्द में यह निखिल इदम् रूप जगत् एवं मितप्रमाता, प्रमेय एवं प्रमाणों से संपूरित कार्यजगत् अहं रूप में एकाकारावस्थित रहता है और यथासमय अहं परामर्श के द्वार से (स्वातन्त्र्य शक्ति द्वारा) इदन्ता का परामर्श उल्लसित हो उठने पर वही आन्तर प्रमेय बाह्य प्रमेय के रूप में विकसित हो उठता है— १. वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ॥ (ई०प्र० १.५.१) २. चिदात्मैव हि देवोन्तःस्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ (ई०प्र० १.५.७) ३. 'स्तवचिन्तामणि' में यह भी कहा गया है— 'निरुपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाघ्याय शूलिने ॥' परमात्मा इच्छा मात्र से आन्तरविमर्शगत पदार्थों को बाह्याकारों में रूपान्तरित करके अवभासित कर देता है जैसे बिना बाह्य उपादानों के योगीगण । यथा मुकुर-प्रतिबिम्बित नगरादिक का प्रतिबिम्ब मुकुर से पृथक् न होते हुए भी पृथकवत् दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार चिद्दर्पण में प्रतिबिम्बित विश्वात्मक प्रतिबिम्ब दर्पण से भिन्न न होकर भी भिन्नवत अवभासित होता है— स एव भगवान् स्वस्वातन्त्र्यादनतिरिक्तामप्यतिरिक्तामिव जगद्रूपतां स्वभित्तौ दर्पण- नगरवत्प्रकाशयन् स्थितः । (स्पन्द नि०) दर्पणबिम्बे यद्वन्नगरग्रामादिचित्रमविभागि । भाति विभागेनैव च परस्परं दर्पणादपि च ॥

६८ स्पन्दकारिका विमलतम परमभैरव बोधात् तद्वद् विभागशून्यमपि । अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ॥ —(प०सा०श्लोक १२,१३) जिस 'स्पन्दतत्त्व' की व्याख्या हेतु स्पन्दसूत्रों की रचना की गई है उसी में निखिल विश्व प्रतिष्ठित है । 'तन्त्रालोक' एवं 'विवेक' में कहा गया है—१. शून्य, स्पन्द एवं प्राण में समस्त विश्व, सारा विस्तार अवस्थित है । सृष्टि एवं संहार भी एक प्रकार के स्पन्द ही हैं । 'स्पन्द' अनन्त है अतः सृष्टि एवं संहार भी अनन्त हैं— यह सब बाह्यसृष्टि है । सृष्टि बहिःस्पन्दमान है और अनन्त है । बाहर जो भी 'स्पन्द' है वह सब संवित् तत्त्व का ही उल्लास है । बाह्यस्पन्द के रूप में तो अपने शरीर का विकार भी व्यक्त होता है । अतः संवित्प्रतिष्ठानौ यतो विश्वलयोदयौ । शक्त्यन्तेऽध्वनि तत्स्पन्दासंख्याता वास्तवौ ततः ॥ (आ०७।६३) 'सृष्टिसंहाराद्यात्मनां स्पन्दानां' 'यो हि नाम बहिः कश्चन परिस्पन्दः स संवित्सतत्त्व एव' । १. चित्, स्पन्द एवं प्राण की कारणता से कार्य की ओर उन्मुखता की अन्तिम स्थूलता 'सुषि' कही जाती है— 'चित्स्पन्दप्राणवृत्तीनामन्त्या या स्थूलता सुषिः ॥ (तं०) शांकर वेदान्त का मत और स्पन्द दृष्टि— (क) स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा की सृष्टि सम्बन्धिनी दृष्टि—इन दोनों शैव शासनों की सृष्टि-दृष्टि के मुख्य निम्न सिद्धान्त हैं—१. परप्रमाता की दृष्टि से—'स्वातन्त्र्यवाद'— एवं २. प्रमेय की दृष्टि से—'आभासवाद' या प्रतिबिम्बवाद । 'स्वातन्त्र्य' क्या है? (क्षेमराजः शि०सू०वि०)—'सर्वज्ञानक्रिया संबन्धमयं परिपूर्ण स्वातन्त्र्यम् उच्यते' । (ख) जीव-विषयक विभिन्न दृष्टियाँ—अद्वैतवेदान्त में आचार्य शङ्कर के पश्चात् जीव के विषय में दो प्रकार के सिद्धान्तों को प्रतिष्ठित किया गया जो निम्नांकित हैं— १. 'अवच्छेदवाद' २. 'आभासवाद' । १. 'अवच्छेदवाद'—इस मत के अनुसार अन्तःकरण आदि से विशिष्ट चेतन ही प्रमाता है । समस्त कार्यकलापों का निर्विशेष द्रष्टा रूप 'साक्षी' अन्तःकरण आदि उपाधियों से उपहित है । एक ही अन्तःकरण प्रमाता का विशेषण एवं साक्षी की उपाधि है । २. 'आभासवाद'—आभासयुक्त अन्तःकरण जीव का विशेषण है और आभास युक्त अन्तःकरण साक्षी की उपाधि है । आचार्य शङ्कर ने तो किसी भी वाद का समर्थन नहीं किया किन्तु स्वामी विद्यारण्य ने आभासवाद की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है ।

प्रथमः निष्यन्दः ६९ जगत् का कारण तत्त्व— १. आचार्य शङ्कर—ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है । २. संक्षेपशारीरककार—शुद्धब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है । ३. विवरणकार—माया शबलित सगुण ब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है । ४. तत्त्वनिर्णयकार—ब्रह्म और माया दोनों जगत् का उपादान कारण है । ५. सिद्धान्तमुक्तावलीकार—मायाशक्ति जगत् का उपादान कारण है । ६. पञ्चदशीकार—माया तो शुद्ध सत्त्वमयी है किन्तु अविद्या रजोगुण एवं तमोगुण प्रधान है । संक्षेपशारीरककार—यथा मृतिका की चिकनाहट घट के उत्पादन के प्रति द्वारकारण होती है उसी प्रकार शुद्धब्रह्म के उपादान होने में माया द्वारकारण है । वाचस्पतिमिश्र—जीवाश्रित माया से विषयीकृत ब्रह्म प्रपञ्चरूप से परिणत होता है अतः ब्रह्म ही उपादानकारण है । माया तो सहकारी कारण है । 'स्वशक्त्या वटवद ब्रह्मकारणं शङ्करोऽबवीत् । जीवभ्रान्तिर्निमित्तं तद् बभाषे भामतीपतिः ॥ अज्ञातं नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् । जीवाज्ञानं जगद्बीजं जगौ वाचस्पतिस्तथा ॥ —अमलानन्द, 'कल्पतरु' । ब्रह्माद्वैत एवं ईश्वराद्वयवाद— त्रिकदर्शन का 'ईश्वराद्वयवाद'—त्रिक शासन पूर्णतः अद्वैतवादी है । इसके मत में एक परमेश्वर मात्र ही 'तत्त्व' है । 'अज्ञान' या 'माया' या 'जगत्' आत्मा का स्वातन्त्र्य-शक्ति की क्रीड़ा या स्वेच्छापरिगृहीत अपर रूप है । परमेश्वर एक नट के समान स्वेच्छावश नानात्मक भूमिकायें ग्रहण करके विश्व के रूप में प्रकट होते हैं । जगत् और उसकी उत्पत्ति 'स्वातन्त्र्य शक्ति' का विजृंभणमात्र है । अद्वैतवादी 'ब्रह्मवाद' में विश्वोत्तीर्ण, सत्य, निर्मल, निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मकर्तृत्वहीन है किन्तु त्रिक नय के अद्वैतवादी ईश्वराद्वयवाद में परमेश्वर में स्वातन्त्र्य- शक्ति की नित्य विद्यमानता परमेश्वर में नित्य कर्तृत्वपरता का सूचक है । आत्मास्वरूप शिव सृष्टि, स्थिति, संहार, अनुग्रह एवं विलय इन सभी पञ्चकृत्यों का संपादक है । शाङ्कर मत का ब्रह्म निष्क्रिय होने के कारण इन व्यापारों का निष्पादक नहीं है । दोनों अद्वैतवादी दृष्टियों में यह एक प्रधान भेद है । परमेश्वर एवं विश्व के मध्य सम्बन्ध की दृष्टि से भी दोनों दृष्टियों में भेद है । अभिनवगुप्त इस सम्बन्ध को 'दर्पणबिम्बवत्' मानते हैं और यही त्रिक दृष्टि है किन्तु शाङ्कर अद्वैत में जगन्मिथ्यात्व स्वीकार किया गया है । अभिनवगुप्त कहते हैं यथा स्वच्छ दर्पण में ग्राम, नगर, वृक्षादिक पदार्थ प्रति-

७० स्पन्दकारिका बिम्बित होने पर उससे अभिन्न होने पर भी दर्पण में तथा परस्पर भी भिन्न प्रतीत होते हैं उसी प्रकार पूर्ण संविद्रूप परमेश्वर में प्रतिबिम्बित यह जगदाभास अभिन्न होने पर भी घट पटादि रूप से अवभासित होता है । लोक में प्रतिबिम्बित पदार्थ की सत्ता बिम्बाश्रित होती है किन्तु त्रिकनय में ('स्वातन्त्र्यशक्ति' के चमत्कार द्वारा) बिना बिम्ब के ही जगद्रूप प्रतिबिम्ब स्वतः आविर्भूत होता जाता है । द्वैतभावना कल्पित है अद्वैतभावना ही यथार्थ है । इसी आभास या प्रतिबिम्ब सिद्धान्त के मानने के कारण त्रिकदर्शन की दार्शनिक दृष्टि—'आभासवाद' मानी जाती है—'आभासरूपा एवं जडचेतन पदार्थाः ।। (प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ३।२।१) अभिनव विवृतिविमर्शिनी में कहते हैं— अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह, यद्वद् विचित्ररचना मुकुरान्तराले । बोधःपुनर्निजविमर्शनसारयुक्त्या, विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ॥ 'स्वातन्त्र्यवाद'—त्रिकनय में 'स्वातन्त्र्यवाद' भी स्वीकृत है और यही त्रिकनय का प्रधान सिद्धान्त है । विश्व चिन्मयी शक्ति का स्फुरण है—अतः इसे 'परिणाम' एवं 'विवर्त' दोनों न मानकर सत्य ही माना जाना चाहिए । 'परिणामवाद' में वस्तु का अपना स्वरूप तिरोहित होकर दूसरे आकार को ग्रहण कर लेना माना जाता है यथा दूध का पर स्वरूप दही । दही पुनः दूध नहीं बन सकता । प्रकाशवपु शिव के प्रकाश के तिरोधान होने पर तो विश्व अंधा हो जाएगा । परिणामतः 'विवर्तवाद' एवं 'परिणामवाद' दोनों स्वीकार्य नहीं है । स्वीकार्य है तो अघटन घटनापटीयसी, कर्तुं—अकर्तुं—अन्यथाकर्तुं की शांभवी स्वातन्त्रशक्ति का सिद्धान्त 'स्वातन्त्र्यवाद' इसका स्वरूप क्या है? अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं— 'अविद्या अनिर्वाच्या वैचित्र्यं चाधत्ते इति व्याहतम् । परमेश्वरी शक्तिरेव इयमिति हृदयावर्जकः क्रमः । तस्मात् अनपह्नवनीयः प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवः भगवान् स्वातन्त्र्यादेव प्रकाशते इत्ययं स्वातन्त्र्यवादः प्रोन्मीलितः ।। (अभिनवगुप्त— प्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी) यही शक्ति 'विमर्श' भी है जिसका स्वरूप इस प्रकार है-'विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन विश्वसंहारेण च अकृत्रिमाहमिति स्फुरणम्' ('परा प्रावेशिका') ।। यदि यह कहा जाय कि परमात्मा नहीं उसकी शक्ति में कर्तृत्व है अतः त्रिक को ईश्वर (परमशिव) एवं वेदान्त के निष्क्रिय ब्रह्म में क्या भेद है?—तो इसका उत्तर यह है कि— १. ब्रह्म की शक्ति 'माया' (कर्तृत्वशक्ति) ब्रह्म में न समवेत है । न चित् है और सत्यासत्य या नित्य है प्रत्युत् अनिर्वचनीय है इसीलिए वेदान्त 'अनिर्वचनीयतावाद' सिद्धान्त का पोषक है । २. परमशिव की शक्ति 'स्वातन्त्र्यशक्ति' (माया)—परमशिव में समवेत, उसमें अभिन्नतयावस्थित, नित्य एवं सर्वकर्तृत्वशालिनी परा चित् शक्ति है और—

प्रथमः निष्यन्दः ७१ १. न शिवेन विना देवी न देव्या च विना शिवः । नानयोरन्तरं किंचित् चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ २. न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । शिवः शक्तस्तथाभावात् इच्छया कर्तुमीहते । शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ॥—‘शिवदृष्टि’—सोमानन्द ३।२।३ ३. शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं । न चेदेवं न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥—‘सौन्दर्यलहरी’ ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’—परमशिव की आत्मा है । उसकी पराशक्ति है । इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियाँ उसी के विजृंभणमात्र हैं । यह शिव की स्वाभिन्न समवायिनी नित्य शक्ति है । इसका अपराभिधान ‘आनन्द’ है ‘स्वातन्त्र्य’ शिव का निरपेक्ष, निर्बंध, नित्य, स्वभावगत, स्वधर्म रूप इच्छा का अनभिहत प्रसार है— स्वातन्त्र्यवाद— ‘स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तयेच्छाप्रसरस्य अविघातः’१ यह परमात्मा का ऐश्वर्य रूप स्वातन्त्र्य ही नित्योदितपरावाक् है— इसके नामान्तर निम्नानुसार है— चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता । स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥ सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ (४४।४५)२ इसी ‘स्वातन्त्र्य’ की हानि ‘आणवमल’ का मूल है और द्विरूपात्मक तथा बन्धनात्मक है— स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य, स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥३ (१५) चिद्वपुः एवं स्वतन्त्र विश्वात्मा की चिकीर्षा ही जगत् का कारण है एवं यह कर्तृतारूपता ही क्रियाशक्ति है । चिद्रूप परमात्मा की चिकीर्षा क्रिया (स्वातन्त्र्यशक्ति) ही उसकी मुख्य शक्ति है— इत्थं तथा घटपटाद्याभासजगदात्मना । तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ॥ ५३ ॥४ अर्थात्—‘चिद्वपुषः स्वतन्त्रस्य विश्वात्मना कर्तुमिच्छैव जगत्प्रतिकारणता कर्तृता- रूपा सैव क्रियाशक्तिः । एवं चिद्रूपस्यैकस्य कर्तुरिव चिकीर्षाख्या क्रिया मुख्या ॥’ इस चिद्वपु को स्वातन्त्र्यशक्त्यात्मा, स्वपरामर्शविग्रहा कहा गया है— १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञावि०वि० (१।१) । २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (४४, ४५) । ३. प्र० का० (१५) । ४. प्र०का०वृत्ति ।

७२ स्पन्दकारिका 'सेयं स्वातन्त्र्यशक्त्यात्मा स्वपरामर्शविग्रहा' । १ 'मालिनीवार्तिक' में अभिनवगुप्त कहते हैं कि परमात्मा की मुख्य शक्ति तो मात्र 'स्वातन्त्र्यशक्ति' है—'स्वतन्त्र इति तस्येच्छाशक्तिः स्वातन्त्र्यसंज्ञिता । स्वतन्त्र परमात्मा की इच्छा ही 'स्वातन्त्र्य' है। वह परमेश्वर में विश्रान्त है। उसकी 'स्वातन्त्र्यमहिमा' शिव के स्वस्वरूप से अपृथक् रूप में स्थित है—'स्वातन्त्र्यमहिमा वास्य स्वरूपादपृथक्स्थितिः' उसका 'स्वातन्त्र्य' है क्या? परमेश्वर का अपने में ही 'प्रोच्छलत्स्थिति' ही उसका स्वातन्त्र्य हैं— 'तत्स्वातन्त्र्यात्स्वतन्त्रं तत्स्वात्मनि प्रोच्छलत्स्थितम्' । २ यह शक्ति विश्वरूपिणी है— 'देशकालक्रियाकारकल्पनापथवर्जितः । देवदेवस्तथैवास्य शक्तिः सा विश्वरूपिणी ॥' ३ यह स्वतन्त्र महेश्वर ही 'विश्वात्मा' है— एवं महेश्वरो देवो विश्वात्मत्वेन संस्थितः ॥ (२।१) ४ 'स्वातन्त्र्यशक्ति' द्वारा जो 'स्वात्मप्रच्छादन क्रीड़ा' निष्पादित की जाती है वह 'मल' के नाम से प्रसिद्ध है— स्वात्मप्रच्छादनक्रीडामात्रमेव 'मलं' विदुः ॥५ किन्तु इस स्वातन्त्र्यशक्ति से दीक्षा एवं भुक्ति भी निष्पादित होती है। संविदश्च स्वस्वातन्त्र्यायास्तथारूपावभासनम् । दीक्षेति किल मन्तव्यं मुच्यन्ते जन्तवो यया ॥६ इसी शक्ति में विश्रान्त साधक ही मुक्त कहा जाता है— 'तत्र विश्रान्तिमापन्नो मुक्त इत्यभिधीयते ॥' ७ जीव एवं परमात्मा की स्वरूप-कल्पना—(केवलाद्वैतवाद के सिद्धान्त) सिद्धान्त—१. 'प्रतिबिम्बवाद', २. 'अवच्छेदवाद', ३. 'जीवैक्यवाद', ४. 'आभासवाद'। १. प्रतिबिम्बवाद— अज्ञान में प्रतिबिम्बित चैतन्य को 'ईश्वर' एवं 'बुद्धि' में प्रतिबिम्बित चैतन्य को 'जीव' कहते हैं किन्तु अज्ञान की उपाधि से रहित बिम्ब शुद्ध चैतन्य है। (संक्षेपशारीरक) स्वातन्त्र्यादि गुणों से विशिष्ट होने के कारण ईश्वर 'बिम्ब' स्थानापन्न है एवं परमात्मा के कारण अविद्या में चिदाभास जीव है (विवरणकार) ॥ अर्थात् ईश्वर बिम्बरूप है एवं जीव प्रतिबिम्बरूप है यही है—'प्रतिबिम्बवाद' । इस सिद्धान्त में अनेक वेदान्तियों को अरुचि है । समस्त प्रतिबिम्ब स्थलों में प्रायः रूपवान् पदार्थ का रूपवान् आधार में ही प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है यथा— १. परात्रिंशिकातात्पर्यदीपिका । २-७. मालिनीवार्तिक ।

प्रथमः निष्यन्दः ७३ रूपवान् चन्द्र का प्रतिबिम्ब रूपवान् जल में ही पड़ता है किन्तु ब्रह्म के रूपहीन होने से न तो उसका प्रतिबिम्ब संभव है और न रूपहीन अन्तःकरण में प्रतिबिम्ब उत्पादन की शक्ति ही है । २. 'अवच्छेदवाद'—वाचस्पतिमिश्र— वाचस्पतिमिश्र अवच्छेद को ही युक्तियुक्त मानते हैं । इस पक्ष में एक ही चैतन्य अज्ञान के आश्रय एवं विषय के भेद से दो प्रकार का है । अज्ञान का विषयीभूत चैतन्य ईश्वर है । अज्ञान का आश्रयभूत चैतन्य ही 'जीव' है या अन्तःकरण से अवच्छिन्न चैतन्य जीव और अविद्यावच्छन्न चैतन्य 'ईश्वर' है । अज्ञान के नानात्मक होने से इस मत में जीव भी नानात्मक हैं । इस पक्ष में स्वाज्ञान से उपहित होने से जीव जगत् का उपादान कारण है । ईश्वर उपचारमात्र से कारण माना जाता है । ('सिद्धान्तबिन्दु' पृ० ८०)। ३. एकजीववाद— वेदान्त का यही मुख्य सिद्धान्त है । इस मत में अज्ञानरूपी उपाधि से विरहित शुद्ध चैतन्य 'ईश्वर' है और अज्ञानोपहित चैतन्य 'जीव' है । जीव ही अपने अज्ञानवश जगत् का उपादान कारण एवं निमित्तकारण है । देहभेद से जीवभेद की प्रतीति भ्रान्ति पूर्ण है क्योंकि वस्तुतः जीव एक ही है । गुरु की कृपा तथा शास्त्र विहित श्रवणादि उपायों से एक ही आत्मा का मोक्ष होता है । वामदेवादियों की मोक्षवार्ता अर्थवाद मात्र है । इसी सिद्धान्त का अपरपर्याय 'दृष्टिसृष्टिवाद' है । कुछ वेदान्तियों के मतानुसार— कुछ वेदान्तियों की सम्मति में जिस प्रकार कौन्तेय (कौन्ती-पुत्र कर्ण) की ही अविद्या के कारण राधेय (राधापुत्र) रूप से प्रतीति होती है उसी प्रकार अविकृत ब्रह्म ही अविद्या से जीवभाव प्राप्त करता है । व्याधकुलवर्धित राजपुत्र के समान जीव अविद्या के वशीभूत होकर अपने शुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव को विस्मृत किए हुए हैं । आचार्योपदेश से शुद्ध सच्चिदानन्द रूप को जानते ही वे मुक्त हो जाते हैं । ४. आभासवाद— अद्वैतमत में एक आत्मा ही सत्य है । आत्मा न तो अन्तर्यामी है और न तो साक्षी ही है । अज्ञानरूप उपाधि से युक्त आत्मा अज्ञान के साथ है । ईश्वर एक है । अद्वैतवाद के दो पक्ष हैं— १. आत्मा-परमात्मा की एकता २. ब्रह्म-जगत् की एकता वेदान्त में 'प्रतिबिम्बवाद' 'दृष्टिसृष्टिवाद' 'अवच्छेदवाद' 'अजातवाद' आदि अनेक दृष्टियाँ हैं । पैगम्बरी 'एकेश्वरवाद (Monotheism) (तौहीद) और औपनिष- दिक अद्वैतवाद (Monism) में यथेष्ट भेद है । जगत् का स्वरूप—'जगत' प्रातिभासिक है पारमार्थिक सत्य नहीं है । सत्य की तीन कोटियाँ हैं—१. व्यावहारिक २. प्रतिभासिक ३. पारमार्थिक । इनमें जगत् की सत्ता

७४ स्पन्दकारिका का सत्य व्यावहारिक है तथापि जीव एवं जगत् ब्रह्म से कोई पृथक् स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है। शांकर दृष्टि में ब्रह्म और जगत् की एकता—१. यह सम्पूर्ण विश्व जो अज्ञान के कारण नानात्मक प्रतीत हो रहा है समस्त भावनाओं के दोषों से रहित (निर्विकल्प) ब्रह्म ही है—जगत् ('रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः' भी है) भ्रम भी है किन्तु ब्रह्म से पृथक् स्वतन्त्र सत्ता भी नहीं है। 'यदिदं सकलं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात्। तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्तराशेषभावनादोषम् ॥' २. मृत्तिका का कार्य होने से घट उससे पृथक् नहीं हो सकता क्योंकि सब ओर से मृत्तिका रूप होने के कारण घट का रूप मृत्तिका से पृथक् नहीं है अतः मृत्तिका में मिथ्या कल्पित नाममात्र घर की सत्ता ही कहाँ है?१ आचार्य शङ्कर का जगन्मिथ्यात्ववाद— मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः, कुंभोऽस्ति सर्वत्र मृत्स्वरूपात् । न कुंभरूपं पृथगस्ति कुंभः, कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥ ३. मृत्तिका से घट का रूप कोई दिखा नहीं सकता। अतः घट तो मोह से कल्पित है। वस्तुतः सत्यात्मक तो मृत्तिका मात्र है।२ सत्-ब्रह्म का कार्य यह सकल प्रपञ्च सत्स्वरूप ही है क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् वही तो है उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो कहता है कि उससे पृथक् भी कुछ है उसका मोह दूर नहीं हुआ है एवं उसका यह कथन सुषुप्त पुरुष के प्रलाप के सदृश है— १. केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं, घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते । अतो घटः कल्पित एव मोहान्मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥ २. सद्ब्रह्म सकलं सदैव, तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति । अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो, विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥ 'यह संपूर्ण विश्व ब्रह्म ही है' ऐसा अति श्रेष्ठ अथर्व श्रुति कहती है अतः यह विश्व ब्रह्ममात्र ही है क्योंकि अधिष्ठान से आरोपित वस्तु की पृथक् सत्ता हो ही नहीं सकती।३ 'यदि यह जगत् सत्य हो तो आत्मा की अनन्तता में दोष आता है और श्रुति अप्रामाणिक हो जाती है एवं ईश्वर भी मिथ्यावादी ठहरते हैं। ये तीनों बातें सत्पुरुषों के लिए शुभ नहीं है। 'यदि विश्व सत्य होता तो सुषुप्ति में भी उसकी प्रतीति होनी चाहिए थी किन्तु उस समय इसकी कुछ भी प्रतीति नहीं होती अतः यह स्वप्नवत् असत एवं मिथ्या है—४ १. ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी, श्रोती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा । तस्मादेतद् ब्रह्ममात्रं हि विश्वं, नानाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥ १-४. विवेक चूड़ामणि।

प्रथमः निष्यन्दः ७५ २. सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनोऽनन्तत्वहानिर्निगमाप्रमाणता । असत्यवादित्वमयीशितुः स्यान्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥ ३. यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तावुपलभ्यताम् । यन्नोपलभ्यते किंचिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥१ अतःपरमात्मा से पृथक् जगत् है ही नहीं। उसकी पृथक् प्रतीति तो गुणी से गुण आदि की पृथक् प्रतीति के सदृश मिथ्या ही है। आरोपित वस्तु की वास्तविकता ही क्या? वह तो अधिष्ठान ही भ्रम से उस प्रकार भासित हो रहा है। अज्ञानी जनों को अज्ञानवश जो कुछ प्रतीत हो रहा है वह सब ब्रह्म ही है जिस प्रकार भ्रम से प्रतीति हुआ रजत = वस्तुतः सीपी है। 'यह जगत् है' इसमें 'इदम्' रूप से सदा ब्रह्म ही कहा जाता है, ब्रह्म में आरोपित जगत् तो नाममात्र ही है। १. अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः, पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत् । आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता- धिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥ २. भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं ब्रह्मैवतत्तद्रजतं हि शुक्तिः । इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यतेत्वारोपित ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥२ 'परिणामवाद'-अवस्थान्तरपरिणमन ही 'परिणाम' है- (क) अतत्त्व-प्रथा = 'विवर्त' (ख) सतत्त्व-प्रथा-'परिणाम' परिणाम में एक रूप का तिरोभाव एवं रूपान्तर का आविर्भाव होता है-परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति, रूपान्तरं च प्रादुर्भवतीत्युक्तम् ॥३ असत्य रूप में निर्भास ही 'विवर्त' है 'विवर्तो हि असत्य रूपनिर्भासात्मेत्युक्तम् ।' (अभिनवगुप्तः ई०प्र०वि०वि०) शुक्ति में रजताभास 'विवर्त' है और दूध का दही में परिणमन 'परिणाम' है। 'परिणाम' अपने उपादान का समसत्ताक होता है किन्तु 'विवर्त' अपने उपादान का 'विषम-सत्ताक' होता है यथा रज्जु में अहि का भ्रम ॥ भास्करराय का 'अविकृत परिणामवाद' - भर्तृहरि, शान्तरक्षित ('तत्त्वसंग्रह') एवं भवभूति 'विवर्त' एवं 'परिणाम' को एकार्थक मानते रहे जब कि दोनों शब्द विष- मार्थी है। अविकृत परिणामवाद - भास्करराय जगत् को 'परिणाम' मानते हैं किन्तु प्रचलित परिणामवाद के सिद्धान्त से पृथक् अर्थ में। भास्करराय कहते हैं- १. मृत्तिका एवं घट में कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जगत् और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य है। भेदभावना ही मिथ्यात्व है- १-२. विवेकचूड़ामणि । ३. ई०प्रत्यभिज्ञाविवृत्ति वि० (पृ ८, अ १, वि० १)