भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 519 में से

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पृष्ठ 167

६६ स्पन्दकारिका होता है—१. ‘अहम्’ २. ‘इदम्’ ‘इदम्’ के साथ-कला, काल, नियति, विद्या, राग एवं माया रूप कंचुकों का योग होने से जीवों का इदमात्मक विमर्श भेदात्मक, बन्धनात्मक एवं मितप्रमातृत्व का होता है । परमशिव का अहमात्मक विमर्श अभेद, अद्वैत, सामरस्यात्मक एवं मुक्तिस्वरूप होता है । विमर्शों के भेद के कारण ही विमर्श भी शुद्ध एवं अशुद्ध होते हैं । स्वप्न के अस्त होने पर स्वप्न का समस्त जगत् (ज्ञः का सारा विमर्श) ज्ञः में विलीन हो जाता है । विमर्श एवं विमर्शक में भेद नहीं है अतः अभेदस्तर पर विश्वप्रमाता एवं प्रमेय विश्व में कोई भेद नहीं रहता । दोनों अहं में विश्रान्त रहते हैं । १. ‘यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यम्’ २. ‘यस्माच्च निर्गतम्’—इन वाक्यों पर ध्यान दें तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि— क) सृष्टि के अभेद, भेदाभेद एवं भेद किसी भी स्तर पर किसी नव्य पदार्थ या सत्ता की उत्पत्ति एवं उसका संहार नहीं होता । तिल में तेल की भाँति, अभेद के स्तर पर जो विश्व अभी कारण में अस्फुट था वही अब कारण से पृथक् होकर उत्पन्न कहलाने लगा किन्तु कोई नयी सृष्टि नहीं हुई । ख) ‘आविर्भाव’ उत्पत्ति नहीं प्रत्युत् प्रकटीकरण (‘निर्गतम्’) है । सांख्य का सत्कार्यवाद तथा उपनिषद का ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इस सिद्धान्त के निकट हैं । भेद यह है कि सांख्य का सत्कार्यवाद भेदाश्रित है जब कि स्पन्दशास्त्र का अभेदाश्रित । शिव का ‘स्वभाव’ अहंविमर्शरूप एकाकारता ही तो है । ‘यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे’ ‘यदन्तस्तद्बहिः’ का सिद्धान्त ही स्पन्द को मान्य है । ‘अहमस्मि’ ‘अहमिदम्’ ‘इदमहम्’ ‘अहञ्चेदञ्च पृथक्-पृथक्’—ये सभी विमर्शों के रूप ही तो हैं और तद्वत उनकी पृथक्-पृथक् सृष्टियाँ भी हैं । शिव का ‘स्वातन्त्र्य’, ‘स्वभाव’ ‘उन्मेषनिमेषात्मक स्पन्द-क्रीड़ा’ क्या है? आन्तर विमर्श में अहमाकार रूप में अवस्थित एकाकार विश्ववैचित्र्य को अनेक नामरूपात्मक स्वरूपों में अपने में अव- भासित करना एवं पुनः इस नानात्मक जगत् को अपने अहं में एकाकारित करके उसे उपसंहृत रखने की क्रीड़ा ही तो शिव का स्वभाव, शिव की क्रीड़ा, आन्तर स्पन्द आदि कहलाता है । ‘स्पन्द’ की सृष्टि ‘स्वातन्त्र्यवाद’ एवं ‘अवभासवाद’ के सिद्धान्तों पर समाश्रित है न कि—‘विवर्तवाद’ ‘परिणामवाद’ या ‘असत्कार्यवाद’ पर ।। ‘इदम्’ रूप में स्फुटतः भासमान समस्त प्रमेय पदार्थ शिव के ‘स्वांग’ हैं । मायाशक्ति के द्वारा उनका भिन्नतया-वभासन वैसा ही है यथा एक ही मिट्टी में अनेक घड़ों का मिट्टी से पृथक् सत्ता के रूप में अवभासन । एकता में अनेकात्मकता एवं अनेकात्मकता में एकात्मकता का अवभासन निरन्तर करते रहना ही तो शिव का ‘स्वधर्म’, ‘स्वस्वभाव ‘स्वातन्त्र्य’ एवं ‘विमर्श’ है । ‘विमर्श’ उनकी शक्ति है अतः जगत् भी शिव की शक्ति का एक रूप है । कुंभकार के आन्तर विमर्श में घड़े के आकार-प्रकार आदि में सदा रहता है । कुंभकार का घटाकार विमर्श ही घट है और शिव का अपने अहं में विश्वाकार भेदात्मक विमर्श ही विश्व है । ‘उत्पत्ति’ नहीं होती अवभासन होता है—किन्तु अवभासन

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