भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः ६७ 'परिणाम' एवं 'विवर्त' नहीं है। आन्तर विमर्श में निखिल वाच्य (प्रमेय) पदार्थ विमर्श के रूप में ही 'अहं' से अभिन्न रूप में अवस्थित रहते हैं किन्तु विमर्श अपने में स्थित इन अभिन्नाकार प्रमेयों को भिन्नाकार देकर विश्व के रूप में अवभासित कर देती है। इसी तथ्य को 'परात्रिंशिका' (२४) में इस प्रकार कहा गया है— यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदय बीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (२४) एवं यो वेत्ति तत्त्वेन तंस्य निर्वाणगामिनी । दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (२५) 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' (१।१.६.७) में कहा गया है— 'तदेवं व्यवहारोऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद् बहिः ॥' आन्तर विमर्श ऐन्द्रजालिक का झोला नहीं—है कि उसमें अखरोट पिस्ता एवं बादाम के रूप में विभिन्न पदार्थ भरे हैं और सृष्टि के समय निकल पड़ते हों—'एतदुक्तं भवति न प्रसवेकादिवाक्षोटादि तत् तस्मात् निर्गतम्' (क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय') शाङ्कर भूमिका में विश्वस्पन्द में यह निखिल इदम् रूप जगत् एवं मितप्रमाता, प्रमेय एवं प्रमाणों से संपूरित कार्यजगत् अहं रूप में एकाकारावस्थित रहता है और यथासमय अहं परामर्श के द्वार से (स्वातन्त्र्य शक्ति द्वारा) इदन्ता का परामर्श उल्लसित हो उठने पर वही आन्तर प्रमेय बाह्य प्रमेय के रूप में विकसित हो उठता है— १. वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ॥ (ई०प्र० १.५.१) २. चिदात्मैव हि देवोन्तःस्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ (ई०प्र० १.५.७) ३. 'स्तवचिन्तामणि' में यह भी कहा गया है— 'निरुपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाघ्याय शूलिने ॥' परमात्मा इच्छा मात्र से आन्तरविमर्शगत पदार्थों को बाह्याकारों में रूपान्तरित करके अवभासित कर देता है जैसे बिना बाह्य उपादानों के योगीगण । यथा मुकुर-प्रतिबिम्बित नगरादिक का प्रतिबिम्ब मुकुर से पृथक् न होते हुए भी पृथकवत् दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार चिद्दर्पण में प्रतिबिम्बित विश्वात्मक प्रतिबिम्ब दर्पण से भिन्न न होकर भी भिन्नवत अवभासित होता है— स एव भगवान् स्वस्वातन्त्र्यादनतिरिक्तामप्यतिरिक्तामिव जगद्रूपतां स्वभित्तौ दर्पण- नगरवत्प्रकाशयन् स्थितः । (स्पन्द नि०) दर्पणबिम्बे यद्वन्नगरग्रामादिचित्रमविभागि । भाति विभागेनैव च परस्परं दर्पणादपि च ॥