स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ६५ 'नित्यं विसर्गपरमः स्वशक्तौ परमेश्वरः । अनुग्रहात्मा, स्रष्टा च संहर्ता चानियंत्रितः ।।' (त्रिकहृदय) सोमानन्दपाद कहते हैं—'ईश्वरस्य स्वतन्त्रस्य केनेच्छा वा विकल्प्यते ?' 'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम्' १. सभी पदार्थ सामरस्य में अवस्थित रहते हैं—(सोमानन्द) 'तस्मात्सर्वपदार्थानां सामरस्यमवस्थितम्' (शि०दृ०) २. सभी पदार्थ भगवान् की इच्छा-सामग्री से ही प्रकट होते हैं (सोमा०) योगिनामिच्छया यद्वन्नानारूपोपपत्तिता । न चास्ति साधनं किंचिन्मृदादीच्छां विना प्रभोः । तथा भगवदिच्छेव तथात्वेन प्रजायते ।।' (शिवदृष्टि) एवं सर्वेषु भावेषु यथा सा शिवरूपता । (सोमानन्द) ३. सभी पदार्थों, एवं भावों में शिवरूपता ही व्यक्त हो रही है (सोमानन्द) 'भगवदिच्छामात्रमेव विश्वरूपत्वं संपद्यते ।। (शि० दृ०) 'एवं सर्वपदार्थानां समैव शिवता स्थिता (शि० दृ०) यहाँ तक कि भेदप्रभेद भी शिवमय ही है—'भेदा अपि तदात्मकाः ।। (शि०दृ० वृत्ति) ।। 'तथा नाना शरीराणि भुवनानि तथाविसृज्य रूपं गृह्णाति प्रोत्कृष्टाधममध्यमम् ।। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शिव ही जगत् रूप कार्य भी है और उसका कारण भी है—यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च । मकड़ी और उसके जाले में क्या अन्तर है? कर्ता भी वही कार्य भी वही ।। अतः 'न सावस्था न यः शिवः ।। (स्पन्दकारिका) ।। विमर्श और सृष्टि-उन्मेषवाद उन्मेषवाद और 'विमर्श'—इस दर्शन में सृष्टिक्रम को पाँच कलाओं के क्रमा- नुसार उन्मेष संज्ञा दी गई है । 'उन्मेष' का अर्थ चक्षु-उन्मीलन ग्रहण करना यहाँ पर उपपन्न नहीं है प्रत्युत उन्मेष का अर्थ है—ज्ञान-प्रस्फुरण ।। 'दृश्य जगत' धाता के संकल्प का उन्मेष है—'सोऽकामयत्' 'बहुस्यां प्रजायेय' में इच्छासृष्टिवाद का प्रतिपादन किया गया है । 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' १. 'यथा धाता पूर्वमकल्पयत् ।।' २. कामस्तदग्रे समवर्तताधि ।।' ३. 'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ।' प्रपञ्च है धाता के संकल्प या समवर्तन का परिणाम ।। सृष्टि के रूप में विशेष रूप से या समरूप से वर्तमान होना ही 'विवर्तन' है । 'परमशिव' ज्ञानरूप चिन्मात्र 'ज्ञः' है । उसमें उन्मेषाविर्भाव होने पर दो विमर्शों का उदय स्पं० ५