स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
४. चतुर्थ निःष्यन्द: पात-निःष्यन्द (समावेश-स्थिति, शिव-एकात्मता एवं ग्रन्थ उपसंहार)
३१० स्पन्दकारिका देहाद्यहन्ताजनित अनवच्छिन्न स्वमाहात्म्य का निरोध ही 'तम' है उसके द्वारा जो 'वरण' अर्थात् स्थगन (स्वभाव-तिरोधान) होता है उसका निर्भेद (अनन्त निज वैभवाभि- व्यक्ति के कारण विनाश) है वही उस अवस्था में आविर्भूत होता है । इसी को वृत्ति में कहा गया है—(१) 'यथा अस्य अनभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य', (२) 'स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानैव पश्यति' । 'अयमेवोदयस्तस्य' 'इयमेवामृतप्राप्ति' वाली कारिका में—संवित्त्व की उपलब्धि हेतु उत्तम विधि संस्कारों को कारण के रूप में प्रतिपादित किया गया था किन्तु प्रस्तुत श्लोक द्वय में संसारी प्राणियों के व्यवहार-निदर्शन द्वारा सिद्धयन्तर कारणत्व का प्रतिपादन किया गया है ।१ धाता = चित् शक्ति । देहिनः = जिसका स्वस्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाया है ऐसा योगी = 'अनभिव्यक्तस्वरूप योगी' ।। अभ्यर्थित = अभ्यर्थना का विषय बना हुआ । याचित । अभ्यर्थना = आन्तरिक इच्छा । योगी की आन्तरिक संकल्पात्मक वृत्ति । योगी की संकल्पात्मक इच्छा । इसे ही 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' भी कहा जाता है । सोमसूर्य = नेत्र द्वय । 'नेत्र' अन्य इन्द्रियों का भी उपलक्षक है—प्रतीक है—वाचक है । योगी जिस भी इन्द्रिय के विषयों का साक्षात्कार करना चाहता है तो धाता (स्पन्द, चिति शक्ति, आत्मा) उस-उस इन्द्रिय में विशिष्ट अवधानात्मक शक्ति को उदित कर देता है । कारिका ३४ में भट्टकल्लट ने 'स्वप्न स्वातन्त्र्य, का उल्लेख किया है । कल्लट कहते हैं कि—ऐसे योगी के 'मध्य' (सुषुम्णा) में निरन्तर, प्रतिक्षण 'हृदय' (चित् शक्ति) की अनुभूति स्पष्टतर रूप में प्राप्त होती रहती है । इसी अवस्था का नाम 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' है क्योंकि एक सिद्ध योगी स्वप्नावस्था में अपने समस्त 'आकांक्षित पदार्थों का साक्षात्कार कर लेता है । उसकी आकांक्षा को धाता कभी उपेक्षित नहीं कर सकता । सोमसूर्य तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति का नाम है । (कल्लट)२ इस तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति के विकास का परिणाम—नटों, मल्लों के आकर्षक प्रदर्शनों के सामने रहने पर भी आकांक्षित पदार्थों के स्वरूप में ही आवेश तथा आकर्षक से आकर्षक दृश्यों, स्थानों, पदार्थों से अप्रभावित रहने की शक्ति का आयत्तीकरण ।। अर्थात् तीव्र एकाग्रता । स्वप्न स्वातन्त्र्य का अधिकारी = मध्यनाड़ी में प्राणापान का लय किए हुए सिद्ध योगी । भट्टकल्लट कहते हैं— 'यथास्थानाभिव्यक्तस्वरूपस्य योगिनो जाग्रदवस्थायां यथा-यथा इच्छा भवति, तथैव तस्यानेकार्थ संनिधानेऽभिमतस्यैव कस्यचिदर्थस्य दर्शनं भवति नटमल्लप्रेक्षादिषु सोम- सूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन ।। ३३ ।।'—(भट्टकल्लट)३ १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट—'सोमसूर्य' = ज्ञानेन्द्रियों में आकांक्षित पदार्थों के प्रति तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति उदय = विकास । प्रकटीकरण । ३. 'स्पन्दसर्वस्व' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३११ उस योगी को जिसके स्वस्वरूप की पूर्णाभिव्यक्ति नहीं हो पाई हो उसको अपनी जाग्रत अवस्था में (अपने समक्ष अनेक पदार्थों के विद्यमान रहने पर भी) अपनी इच्छा के अनुसार अपना अभिलषित विशिष्ट पदार्थ ही दृष्टिगत होता है अन्य (अपने समक्ष स्थित अन्य) पदार्थ नहीं। इसका कारण क्या है? कारण यह है कि ऐसे अवसरों पर धाता (चिदात्मा) उस योगी में सोम-सूर्य को उदित कर देता है अर्थात् उसकी ज्ञानेन्द्रियों में आकांक्षित ग्राह्य विषय के प्रति तीव्र एकाग्रता की शक्ति आविर्भूत कर देता है यथा नटों आदि के चमत्कारपूर्ण 'कार्यों में दिखाई पड़ती है ऐसी अद्भुत एकाग्रता (वृत्ति- निरोधात्मक एकाग्रदृष्टि) आविर्भूत हो जाती है। भाव यह है कि - जिस प्रकार प्रेक्षक अपने समक्ष स्थित अनेक वस्तुओं के विद्यमान रहने पर भी नटों के चमत्कार-प्रदर्शन-स्थल पर केवल चमत्कारों को ही देखता अन्य को नहीं। उसी प्रकार एक योगी नटों की भाँति चमत्कार प्रदर्शन करने वाली प्रकृति के द्वारा योगी के समक्ष अनेक आकर्षक, चमत्कार पूर्ण एवं मोहक पदार्थों को प्रस्तुत करने के बाद भी एक योगी सभी का त्याग करके केवल स्वाभीष्ट पदार्थों का ही प्रेक्षण, चुनाव एवं साक्षात्कार करता है। 'तथा स्वप्नेऽपि अभीष्टार्थानैव पश्यति, प्रणस्यानतिक्रामात् इच्छाभ्यर्थनाया अनति- क्रमात् । यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यं तदेतत् 'स्वप्नस्वातन्त्र्यम्' इत्युच्यते, अयमेव तमोवरणनिर्भेद इत्यर्थः' ।। ३४ ।। (भट्टकल्लट) १ प्रत्येक योगी अपनी स्वप्नावस्था में भी स्वाकांक्षित वस्तुओं को ही साक्षात्कृत करता है। चिदात्मा उसके 'प्रणय' (आभ्यन्तर आकांक्षास्वरूप अभ्यर्थना) को कभी नहीं टालती - इसीलिए ऐसा होता है। ऐसे योगी के सुषुम्णा वर्त्म में चिदात्मा, की स्फुटतर अनुभूति प्रतिक्षण विद्यमान रहती है। इसे ही 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' की संज्ञा दी गई है। प्रणय = आभ्यन्तर उत्कट आकांक्षा ।। स्फुटतरं = सुस्पष्टतर । मध्ये = मध्यमार्ग (सुषुम्ना मार्ग) में । स्फुटतरं = और अधिक स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त है। यह 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' कहलाता है । अन्य शब्दों में इसे 'तमोवरणनिर्भेद' कहते हैं-इस समय योगी के मानस पर तमावरण नहीं रहता। भट्टकल्लट ने इन तीन कारिकाओं में योगियों की श्रेणीत्रय की ओर भी संकेत किया है - का० (३३) में - जाग्रतो देहिनः का० (३४) में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितो? का० (३५) में - अन्यथा शब्दों का प्रयोग करके संभवतः 'असिद्ध' 'सिद्ध' एवं 'अनावधात' (प्रमादी) तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। इन तीन कारिकाओं में इन योगियों की पृथक् पृथक् संकल्प शक्ति का भी प्रस्तुतीकरण किया गया है। देहिनः का अर्थ है - 'अनभिव्यक्तस्वरूप योगी' (कल्लट) है। (ये 'अपरिपक्व' 'असिद्ध' योगी हैं। 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' की व्याख्या- 'यच्च तन्मध्ये हृदयं 'स्फुटतरम् अभिव्यक्त १. 'स्पन्दसर्वस्व'।
३१२ स्पन्दकारिका नित्यम्' (कल्लट) है । निष्कर्ष—सुषुम्णा में 'हृदय' (स्वरूपभूत स्पन्द) की अनुभूति सुस्पष्ट होती है । १ 'देहिन' का अर्थ देहाभिमानी सांसारिक प्राणी नहीं है क्योंकि भट्टकल्लट ने अपनी 'वृत्ति' में कहा है कि वे 'योगी' हैं किन्तु वे योगी हैं जो सांसारिक प्रपंच (मायिक बन्धनों) में मग्न होकर बन्धनग्रस्त हो गए हैं किन्तु वे साधनारत भी हैं किन्तु उनका स्वस्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाया है—'अनभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य, योगिनो' जिस प्रकार आत्मस्वभावरूप स्रष्टा जाग्रत अवस्था में अपनी इच्छा से प्रेरित होकर हृद्देशस्थ अभिमत को स्वबल के आश्रय से सोम सूर्य (प्राणापान) एवं नेत्रों को उदित करके अवधानपूर्वक सम्पादित करता है उसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में स्थित रहकर हृदय में अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है क्योंकि आत्म संवित् इच्छा का अतिक्रम नहीं करता । मनुष्य के सामने असंख्य वस्तुओं के वर्तमान रहने पर भी मनुष्य जिसे देखना चाहता है उसी को देखता है क्योंकि उसी में स्वरूपानुप्रवेश हुआ करता है । पदार्थ कभी भी इच्छा का अतिक्रमण नहीं कर सकता । 'बुद्धि जो जो रसपूर्वक (सतृष्ण होकर) अभ्यर्थना करती है आत्म उसे उसके समक्ष प्रस्तुत कर देती है । मानव जिस-जिस इन्द्रियार्थ से अनुविद्ध होकर शयन करता है स्वप्नावस्था में उन्हीं उन्हीं पदार्थों को देखता है । स्पन्दतत्त्व का उदय होने पर जाग्रत अवस्था में ही निजभाव की प्राप्ति होने पर प्रमाता स्वतन्त्र हो जाता है । धाता = चित शक्ति ॥ हृदिस्थितान् = मन में कल्पित, इच्छित् । यथाभिलषित पदार्थ, यथा अनभिव्यक्तस्वस्वरूप वाले योगी को जाग्रदवस्था में जो-जो इच्छायें होती हैं (सामने सैकड़ों अन्य वस्तुओं के विद्यमान रहने पर भी) अपनी अभीष्ट वस्तु को ही देखता है अन्य को नहीं उसी प्रकार इस प्रसंग में भी समझना चाहिए ॥—(भट्टकल्लट) । जिस प्रकार 'धाता' (चिदात्मा = चित् शक्ति) इच्छात्मक अभ्यर्थना किये जाने पर सामान्य व्यक्तियों को भी उनकी आँखों के सामने उन पदार्थों का दर्शन करवाता है जिन्हें कि उन्हें हृदय में देखने की इच्छा होती है । उसी प्रकार योगियों को भी स्वप्नावस्था में उन अभीष्ट पदार्थों का साक्षात्कार करवाता है । वह धाता (चिदात्मा) ऐसे योगियों के मध्यधाम (सुषुम्ना मार्ग) में प्रतिक्षण स्फुटतर स्थिति में विद्यमान रहता है और उनके प्रणय का कभी भी अतिक्रमण नहीं करता । इसके विरुद्ध—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार अधिगत कर चुकने पर भी उस भाव पर निश्चलतापूर्वक अवस्थित नहीं रह पाता तो उसके लिए जाग्रत-स्वप्न दोनों अवस्थाओं में भावों की सर्जना उसी प्रकार स्वतन्त्रतापूर्वक चलती रहती है जिस प्रकार सामान्य प्राणियों की चलती रहती है । भावों की पूर्णस्वातन्त्र्यपूर्वक उत्तरोत्तर सृष्टि करते रहना स्पन्द शक्ति का अकाट्य स्वभाव है । १. ऐसा योगी जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में शाक्त स्पन्दना की अनुभूति करता रहता है तथा सृष्टि, संहार आदि के अधिकार प्राप्त करता है ।
तृतीयः निष्यन्दः ३१३ भट्टकल्लट की व्याख्या—यथा = जिस प्रकार की । इच्छा = अभिलाषा होती है । सोमसूर्योदय = आँख । यदि किसी भी व्यक्ति को आँख एवं अन्य ज्ञानेन्द्रिय के ग्राह्य विषयों में से किसी भी आकांक्षित विषय का साक्षात्कार करने की इच्छा होती है तो उसकी उसी ज्ञानेन्द्रिय में उसके अनुकूल ग्रहण शक्ति का आविर्भाव होता है । 'सोमसूर्य' = (भट्टकल्लट) = आँख । आँख सभी ज्ञानेन्द्रियों का उपलक्षण है अतः यहाँ सभी के ज्ञानेन्द्रियाँ के प्रतीक के रूप में उल्लिखित हैं । स्पष्टीकरण—'सोमसूर्योदयं कृत्वा' 'मध्ये' 'यथेच्छाभ्यार्थितो' आदि शब्दों की व्याख्या आवश्यक है । 'सोमसूर्योदयं कृत्वा' = (१) भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इसकी व्याख्या 'सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन' के रूप में करते हैं । सोमसूर्य = दोनों नेत्र ॥ (२) भट्टकल्लट ने नेत्रेन्द्रिय (सोमसूर्य) को अन्य ज्ञानेन्द्रियों (श्रवणेन्द्रिय, त्वगेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय) का उपलक्षण (बोधक) मानकर यह सूचित करने का प्रयास किया है कि धाता (चित् शक्ति, आत्मा) योगियों के हृदय में इच्छा के रूप में स्थित (अर्थात् अव्यक्त इच्छा के रूप में आकांक्षित) पदार्थों को उनकी आकांक्षाओं से सम्बंधित समस्त ज्ञानेन्द्रियों में तदनुकूल अवधानात्मक शक्ति का उदय करके (योगियों) की आकांक्षाओं की पूर्ति कर देता है यथा— (१) सुश्रूषा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित शब्द को सुनने हेतु श्रवणेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति । (२) दिदृक्षा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थ के देखने हेतु चक्षुरेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति । (३) घ्राणेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित सुगंधों एवं सुगंधित पदार्थों की सुगंधों को प्राप्त करने हेतु घ्राणेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति । (४) स्पर्शेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थों के स्पर्शों को प्राप्त करने हेतु त्वगेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधानशक्ति । (५) स्वादेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थों के स्वाद ग्रहण करने हेतु रसनेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति उत्पन्न कर देता है । इसे ही योगशास्त्र में पञ्चतन्मात्र साधना की सिद्धि कहा जाता है । शब्द संवित्, स्पर्श संवित्, रूप संवित्, रस संवित् एवं गंध संवित् की साधना में सिद्धि होने पर योगियों में इन विषयों की संवेदना बिना पदार्थों की उपस्थिति के भी हो जाती है । यथा—इत्र न होने पर इत्र-गंध, स्वादिष्ट पदार्थ न होने पर भी जीभ में उसका स्वाद आने लगना आदि-आदि । भट्टकल्लट कहते हैं—'नटमल्लप्रेक्षादिषु सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन' । नटमल्ल = भाव यह है कि गणिका, नट, मल्ल, दर्शक आदि सभी के अपने समक्ष विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा जिसे देखना चाहता है उसी में स्वरूप का अनुप्रवेश होता है ।
उसी प्रकार द्रष्टा स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में स्थित रहकर हृदय में स्थित अभीष्ट पदार्थों को देखता है। क्योंकि आत्मसंवित् इच्छा का अतिक्रमण नहीं करती—'प्रणयस्या नतिक्रमात्' (स्पन्द का० ३४)। यथेच्छाभ्यर्थितो = अभ्यर्थना (याचना) शब्दों के माध्यम से व्यक्त की जाती है। किन्तु यह अभ्यर्थनाभिव्यक्ति शब्दवृत्ति के माध्यम से नहीं प्रत्युत (शब्दानभिव्यक्त) मात्र हृदय में इच्छा के माध्यम से व्यक्त होने पर भी उसे अभ्यर्थना मान लिया जाता है अर्थात् भले योगी किसी पदार्थ को न माँगे किन्तु यदि वह उसकी इच्छा मात्र कर ले तो भी धाता उसे उसकी अभ्यर्थना (याचना) मानकर उसे पूरा कर देता है— 'सोमसूर्योदयं कृत्वा' (१) वाक्य के सोम-सूर्य को भट्टकल्लट ने चक्षु क्यों कहा? कारण यह है कि—'चक्षोः सूर्योऽजायत्' आँखों से सूर्य की उत्पत्ति हुई है अतः 'सूर्य' चक्षु के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त मान लिया गया। (२) अगली कारिका में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये' शब्द का प्रयोग किया गया है। 'मध्य' सुषुम्णा नाड़ी को कहते हैं। योगी के प्राण एवं अपान इसमें प्रवेश करते ही निरुद्ध हो जाते हैं—इड़ा पिंगला का प्रवाह रुक जाता है—सुषुम्णा में प्राण प्रवाह होने लगता है और ऊर्ध्वपथ से जाते जाते यह प्राणापान निरुद्ध हो जाता है। इन्हीं दृष्टियों से रामकण्ठाचार्य ने (स्पन्द का०वि०) में—'चक्षुषोरुदयं कृत्वा— इति उपलक्षणमात्रमेतत् मन्तव्यम्' कहा है और इसकी व्याख्या इस प्रकार की है— 'सोमसूर्ययोः चक्षुषोः उदयम् अभिप्रेतार्थावधारणामात्रावधानरूपस्वरूपप्रथनं विधाय —इति उपमानवाक्यम्'। स्पन्दप्रदीपिकार उत्पलाचार्य ने 'सोमसूर्य' को प्राणापान का द्योतक माना है— 'सोमसूर्ययोरपानप्राणयोश्चक्षुषोश्च उदयं कृत्वा—चक्षुरादिष्ववधानेन इत्यर्थः ॥' निष्कर्ष—भट्टकल्लट के 'अनेकार्थसन्निधाने—नटमल प्रेक्षादिषु' की व्याख्या को ध्यान में रखकर स्पन्दप्रदीपिकाकार भी कहते हैं—'अनेकार्थसन्निधानेपि गणिका नट- मल्लप्रेक्षाकादिषु मध्याद्यदेव वस्त्वभिमतं तदेव यथा पश्यति—स्वरूपानुप्रवेशात्।' 'जाग्रत्येव निजभावाप्त्या स्वातन्त्र्यं तथा स्वप्नेऽप्यस्तीति वक्तुमाह ... यथेच्छा- भ्यर्थितो ... प्रकाशयेत् ॥ (स्पन्द प्र०) 'स्वबलावष्टम्भात्' हृदिस्थितान् अभिमतानर्थान् पदार्थान् सम्पादयति प्रकाशयति ॥ 'स्वप्नेऽप्यभीष्टानेवार्थान् ॥ मध्ये हृदि स्वस्वभावे स्थितः सन् स्फुटतरं कृत्वा सदैव प्रकाशयति दर्शयति कुतः? प्रणस्येच्छाभ्यर्थनाया अनतिक्रमात् अत्यागात् ॥' प्राणी प्रथमतः इच्छा करता है फिर कहता है (प्रार्थना करता है—अभीष्टप्राप्त्यर्थ वाणी द्वारा उसे व्यक्त करता है) अतः 'इच्छावस्था संसारिणः परकारणाभेदरूपा। परमेश्वर एव स्वतन्त्रों यथेष्टमिदमखिलं प्रकाशयति—इति परमार्थ तदीयमायाशक्ति- जनितदेहादि व्यवच्छेदाः संसारिणो न प्रपद्यन्ते ॥ (रामकण्ठाचार्य)। मध्ये (रामकण्ठ की दृष्टि में) = हृदय में। मध्ये = हृदि स्वस्वभावे (उत्पल) ॥ मध्ये—हृदयं (भट्टकल्लट) ॥
तृतीयः निष्यन्दः ३१५ वैसे 'मध्य' का अर्थ सुषुम्णा भी होता है। अभ्यर्थना—यो यः कश्चित्, संसारी यमेवार्थं द्रष्टुमुत्प्रेक्ष्छो भवति, स तद्दिदृक्षा- वस्थायां झगित्युवश एवं परमात्मानं धातारमभेदेन आविशति, सा अवस्था अस्य प्रार्थना (रामकण्ठाचार्य) ॥ स्वप्न स्वातन्त्र्य—जो योगी मध्यमार्ग (सुषुम्णा) में 'हृदय' (स्पन्द तत्त्व = संवित् तत्त्व) की निरन्तर सुस्पष्ट अनुभूति प्राप्त करते रहते हैं उनकी इस अवस्था को 'स्वप्न- स्वातन्त्र्य' कहते हैं। योगी के हृदय पर से तमोगुण का आच्छादन दूर हो जाता है। इस 'स्वातन्त्र्य' के भी तीन प्रकार हैं—(१) 'जाग्रत स्वातन्त्र्य' (२) 'स्वप्न स्वातंत्र्य' और (३) 'सुषुप्ति स्वातन्त्र्य' : 'स्वप्नेन सौषुप्तमत्युपलक्षितम्' (स्प० नि०) । योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम— अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात् सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः । सततं लौकिकस्येव जाग्रत्स्वप्नपदद्वये ॥ ३५ ॥ नहीं तो (स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर लेने के अनन्तर अपने स्वरूप में अविचल रूप से स्थिर न रहा जा सका तो) ('उसके अर्थात् योगी की) जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सांसारिक प्राणियों की ही भाँति निरन्तर स्वतन्त्र रूप से भावों की सृष्टि चलती रहती है—क्योंकि स्वातन्त्र्यपूर्वक भावों की निरन्तर सर्जना करते रहना 'उसका' (स्पन्द शक्ति का अपना) धर्म है ॥ ३५ ॥
- सरोजिनी * अन्यथा = स्वरूपस्थिति के अभाव में (भट्टकल्लट)—आत्मस्वरूप का साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर भी यदि योगी अपने निश्चल, नित्य, चिद्रूप आत्मस्वरूप में स्थिर न रह सके तो इस स्थिति के अभाव में । सृष्टि = आलविड़ालदर्शनरूपा सृष्टि (भट्टकल्लट), विचारों और दृश्यों का सर्जन कल्पनाओं की सृष्टि । सृष्टि स्वतन्त्रा स्यात् = (स्वरूप में निश्चल अवस्थान के अभाव में) योगी की जाग्रत्-स्वप्न दोनों अवस्थाओं में आलविड़ालदर्शनरूपा (असंगत) भावसृष्टि निरन्तर स्वतन्त्र रूप में चलती रहती है। 'सृष्टि' = जाग्रत् एवं स्वप्न की अवस्थाओं में मन के भावों की सर्जना, कल्पनाओं, भावनाओं एवं विचारों का असंगत प्रवाह (सृष्टि) । तद्धर्मकत्वतः = उसके उस प्रकार के धर्म वाला होने के कारण अर्थात् चूँकि स्पन्द शक्ति का यह अविचल धर्म या स्वभाव ही है इसलिए । लौकिकस्येव— सांसारिक प्राणियों की भाँति ही । जाग्रत्स्वप्नपदद्वये = जाग्रतावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों में 'धर्म' = सृष्टिस्वभाव, प्रसवधर्म (भट्टकल्लट) । सततं = निरन्तर । अन्यथा योगी एक सामान्य व्यक्ति के समान जाग्रत् एवं स्वप्नावस्थाओं में सदैव सृष्टि का विषय (Subject of creation) बना रहेगा क्योंकि सृष्टि स्वतन्त्र है क्योंकि वह
३१६ स्पन्दकारिका जाग्रत एवं स्वप्न में स्वातन्त्र के लक्षण से उपहित है । यदि पूर्वोक्त रीति से धाता सदैव आराधित नहीं हो पाता तो अपने आन्तर स्वरूप की अभिव्यक्ति का अभाव होने के कारण यह योगी जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सदैव एक अति सामान्य लौकिक व्यक्ति की भाँति ही होगा और परमात्मा की उस सृष्टि से अधिशासित रहेगा जो कि विश्व की सामान्य एवं विशिष्ट वस्तुओं के प्रकटीकरण एवं निश्चयीकरण के कार्य में निरत रहती है ।१ अर्थ यह है कि यह सृष्टि योगी को भी अति प्राकृत व्यक्ति की भाँति फेंक देगी— सांसारिक जीवन के गर्त में । भगवान् की सृष्टि स्वप्न-जागरादि पद के प्रकाशन से स्वातन्त्र्यस्वभावा है । इस प्रकार स्वप्न एवं स्वप्न-शून्य स्थिति के उन्मूलन की विवेचना एवं स्पष्टीकरण करने के उपरान्त ग्रन्थकार यह विवेचन करना चाहता है कि पूर्ण प्रबुद्ध व्यक्ति स्पन्द तत्त्व में समावेश पाता है । इसी साधन से ज्ञेय पदार्थों का ज्ञान भी होता है ।२ स्वरूप स्थिति न होने पर चित्त की चंचलता के कारण इच्छारूप स्वप्नादि सृष्टि स्वतन्त्र हो जाएगी । यहाँ स्वतन्त्र होने का अर्थ है—असमञ्जस-असंगत ही दिखाई पड़ना क्योंकि सृष्टि का स्वभाव ही ऐसा है । तत्त्व का स्वभाव ही है—इच्छाओं का प्रसार । जैसे पुरुष की इच्छायें जाग्रत एवं स्वप्न दोनों में ही स्वतन्त्र चलती रहती हैं—वे अज्ञानजन्य नहीं हैं—संविद् का स्वमत ही है और वे सहस्रों होती हैं—उनका स्वरूप है—सम्बद्ध एवं असम्बद्ध विकल्प, किन्तु ज्ञानी की स्वाधीन होती है और अज्ञानी की उच्छृंखला३ । प्राणी स्वप्न में भी अपने अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है अन्य को नहीं । ‘स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानिव पश्यति ॥' इस प्रकार के समाधि व्युत्थान मात्र से योगी एवं सांसारिक प्राणी एक समान दृष्टिगोचर होने लगते हैं । नित्ययुक्तता के दृढ़ीकरणार्थ कारिकाकार ‘अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात्' वाली कारिका कह रहा है । अन्यथा तु = उक्त प्रकार के विपरीत अन्य प्रकार से । सर्वकर्ता, स्वतन्त्र एवं अद्वैत परमेश्वर की—ममैवेदं जगत्कार्यम्—(‘यह समस्त जगत् मेरा ही कार्य है') इस प्रकार की प्रतिपत्ति के अभाव के कारण योगी के 'जागृति एवं स्वप्न पद' दोनों तद्धर्मक होने के कारण, सर्वगुणात्मकता के कारण, नानाभावविनिर्मिति रूपा सृष्टि हुआ करती है । आत्मसंवित् से आविर्भूत होने के कारण स्वातन्त्र्यशक्ति या तदुत्पन्न नियति (सृष्टि) स्वतन्त्र हैं । जब तक कि साधक अपने को स्वतन्त्रकर्ता, सर्वप्रभु, विभु एवं आत्मस्वरूप मानकर सृष्टि को अपनी शक्ति समझकर उसका परामर्शन नहीं करता तब तक यह इस प्रकार अपरामृश्यमाना होने के कारण विचित्र विभ्र उत्पन्न करने में समर्थ रहती है तथा दुर्निवार रूप में उस सामर्थ्य का विस्तार करती रहती है । लौकिकस्येवं—सांसारिक प्राणियों की भाँति । सारांश यह है कि—जागरावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों सर्गस्वभावा हैं । वहाँ ज्ञानज्ञेयभाव से पारमेश्वरी शक्ति की ही स्थिति प्रतिपादित की गई है । उस इस द्वयात्मक १-२. स्पन्दनिर्णय । ३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३१७ पदद्वय में जो योगी यथोक्त संवित्ति में समाधान (एकाग्रता, ब्रह्म में मन को लगाना) के अपरित्याग से जो उत्थित हुआ हो उस सर्वथा स्वतन्त्र, सर्वकर्ता स्वात्मा में सुव्यवस्थित योगी के लिए सृष्टिस्वभाव रूप पदद्वय (जागृति-स्वप्न) शक्ति को प्रतिबंधित नहीं करता जो व्यक्ति इससे विपरीत अर्थात् 'अन्यथा' जीवन बिताता है तब सांसारिक प्राणियों की भाँति आत्मगत भावसृष्टि के द्वारा परवश बन जाते हैं- 'लोकवन्निजयेव भावसृष्ट्या पर वशीक्रियते ।।' इसीलिए कहा गया है- 'अन्यथा स्वरूपस्थित्यभावे' ।१ भट्टकल्लट स्पन्दकारिकावृत्ति में इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- 'अन्यथा तु स्वरूपस्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलम्बिडालदर्शनरूपा सृष्टिः, यस्मात् तत्तत्त्व सृष्टिस्वभावं प्रसवधर्मत्वात् यथा सततं सर्वस्य लोकस्य जाग्रद्वृत्तौ स्वप्नावस्थायां च सम्बन्धा सम्बन्धविकल्पाः ।।'२ स्वबल का महत्व- यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि । भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥ ३६ ॥ यथा यत् परमार्थेन येन यत्र सदा स्थितम् । तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् सम्प्रवर्तते ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कोई दूर देश-स्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने पर भी, प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता है, किन्तु आत्मबल का प्रयोग करके देखने पर उसको वही पदार्थ सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगत होने लगता है । उसी प्रकार योगी के लिए स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की स्थिति में, स्वल्प समयावधि में ही समस्त पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में विद्यमान हों, ठीक उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥
- सरोजिनी * अर्थोऽस्फुटो = दूरस्थित अस्पष्ट कोई पदार्थ, स्वबलोद्योग = प्रयत्नविशेष । बलमाक्रम्य = स्वबलं स्वस्वरूप का आश्रय लेकर । अचिरेण = बिना बिलम्ब के सामान्य व्यक्ति एवं योगी की तुलना की गई है । जिस प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी पदार्थ को प्रथम दृष्ट्या देखता है तो उसे वह अस्पष्ट दिखाई पड़ता है किन्तु विशेष प्रयत्न करने पर वह उसे सुस्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है । उसी प्रकार यदि योगी भी आत्मबल का प्रयोग करता है तो उसे स्वल्प काल में ही उन पदार्थों का ज्ञान हो जाता है । आक्रम्य = अपनी आत्मा में विलय कर लेने पर । यत्र = जहाँ शङ्करात्मा स्वस्वभाव में । आक्रम्य = पकड़कर । यथा = जिस प्रकार । अभेद व्याप्ति के द्वारा । १. रामकण्ठाचार्य- 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट- 'स्पन्दसर्वस्व' ।
३१८ स्पन्दकारिका स्वबलोद्योगेन = अन्तर्मुखतदेकात्मता परिशीलन प्रयत्न द्वारा । प्रवर्तते = अभिव्यक्त होता है । अचिरात् = शीघ्र ही । हि = निश्चय ही । परमार्थेन = आनन्दघनरूप से । जिस प्रकार वही वस्तु पूर्ण एकाग्रता पूर्वक मनन किये जाने पर भी इसके पूर्व अस्पष्ट रूप में समझ में आती थी—अपनी निजी शक्ति के बल से देखी जाने पर सुस्पष्टतया दृष्टिगोचर होने लगती है । इसी प्रकार प्राणशक्ति पर अधिकार कर लेने पर उस वस्तु की वस्तुता उसी सत्ता के द्वारा, उसी स्थान में जिसमें कि वह रहती है— तत्काल अभिव्यक्त हो जाती है । वस्तु के वस्तुत्व का सम्यक् यथार्थ ज्ञान कैसे हो? इसी के उत्तर में ग्रन्थकार कहता है—‘यथा ह्यर्थोऽस्फुटो .... सम्प्रवर्तते ।' यथा दूरत्वादि दोषों के कारण अस्फुट (अस्पष्ट) रूप में दिखाई पड़ने वाली वस्तु पुनः अध्यक्ष निरीक्षण द्वारा स्वबलोद्योग से भावित पूर्णावलोकित होने पर स्फुटतर (सुस्पष्ट) दृष्टिगोचर होती है वह स्पन्दततत्त्वात्मक बल है जिसके द्वारा आनन्दघन शङ्क- रात्मा स्वस्वभाव में, व्याप्त होकर परिशीलन प्रयत्न द्वारा स्फुटतापूर्वक अभिव्यक्त होता है । मानसिक अवधान के बाद भी कोई वस्तु दूर होने के कारण अस्पष्ट दिखाई पड़ती है किन्तु अपनी दर्शन-शक्ति से सूक्ष्मतापूर्वक देखी जाने पर वही वस्तु सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगत होने लगती है । इसी प्रकार वह स्पन्द तत्त्व की प्राणशक्ति (Vital power) स्पन्दतत्त्वात्मक बल जो कि अपने निजी स्वरूप के साथ अभिन्न रूप से स्थित है आनन्दघन शङ्कर के साथ अद्वैतभाव से स्थित है—ज्यादा सुस्पष्ट रूप में व्यक्त होता है । किन्तु यह तभी होता है जबकि ध्यानावस्था में परमसत्य के साथ ऐकात्म्य प्राप्त कर लिया जाय । कृत्रिम ज्ञातृत्व की भूमि का विलय कर लेने पर योगी जो भी चाहता है वह पदार्थ तत्काल उपस्थित हो जाता है । आक्रम्य = आराधक द्वारा अपनी कल्पित देहादिक प्रमातृभूमि को अपने में निमग्न या लीन करके । 'स्पन्दात्मकं बलं आक्रम्य' । स्पन्दात्मक बल को अर्जित कर लेने पर योगी के समस्त जिज्ञास्य समक्ष प्रकट होते हैं । कर्तृत्व शक्ति केवल इस स्पन्दात्मक बल के माध्यम से ही अपने को व्यक्त करती है । आत्मा की विभूतियों में स्वातन्त्र्य की युक्ति का निरूपण करके अब ज्ञातृत्व और कर्तृत्व-सामर्थ्य की युक्ति बतलाते हैं । उनसे सूक्ष्म और व्यवहित आदि में ज्ञातृत्व की युक्ति कारिका ३६-३७ में बताई गई है । जैसे दूरस्थित घट पट आदि कोई पदार्थ अस्पष्ट, संदिग्ध दृष्टिगत होता है किन्तु चित्त को सावधान करके दूसरी ओर से हटाकर अपने प्रयत्न विशेष से विचार करने पर जिस समय दिखाई पड़ती है—विशेष प्रयास के अनन्तर दृष्टिगोचर होती है—विकसित
तृतीयः निष्यन्दः ३१९ संवित् से देखने पर वही सम्यक् रूप से स्पष्ट, असंदिग्ध एवं अपने निश्चित रूप में दृष्टिगत होने लगती है क्योंकि स्वरूप में कोई आवरण नहीं रहता। आत्मबल के संस्पर्श से पुरुष सामने वाले पदार्थ के सदृश ही हो जाता है। अतः यथार्थ ज्ञान होता है। इसी से मिलता जुलता अद्वैत वेदान्तियों का अन्तःकरणावच्छिन्न प्रमाता का विषयावच्छिन्न चैतन्य से एक होने पर यथार्थ ज्ञान होता है और उसमें बल का स्पर्श नहीं है। 'तत्त्वयुक्ति' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—जो विषयाधिपति है, वह जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है उसको तत्त्वतः अर्थात् आत्मसंवित् के रूप में जान लेने पर चराचर का ज्ञान हो जाता है— (१) अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥१ (२) विषयाधिपतियों हि येन जानाति पार्वति । तस्य यो वेत्ति तत्त्वेन तेन ज्ञातं चराचरम् ॥२ यथा हि = जिस प्रकार निश्चय ही। कोई ॥ सावधाने = पूर्ण अवधान रखने पर। तदर्थ—दिदृक्षा हेतु निविड प्रयत्न करने के बाद भी। चेतसि = चित्त के। अस्फुट = अस्पष्ट ॥ भाति = (प्रथते) = दृष्टिगत होता है, प्रतीत होता है। भूयो = फिर (इसके अनन्तर) ॥ स्वबलोद्योगभावितः = अपनी सामर्थ्य एवं पुरुषार्थ से युक्त। अपनी सर्वज्ञ आत्मा का बल या सामर्थ्य। शक्ति = तत्त्व आदि लक्षणा वाली शक्ति ॥ उस शक्ति के द्वारा उद्योग = उद्यमो ॥ उद्योग = निविड- तरावधान से दर्शनोत्साहित। भावित = लक्षित ॥ स्फुटतरो भाति = प्रत्यभिज्ञायमान निरवशेष विशेष। सोऽयम्—यह तथ्य स्पष्टता से परिज्ञात हो जाता है। भावार्थ—जिस किसी भी व्यक्ति को अपना दर्शनीय अभीष्ट तत्काल स्पष्टतः नहीं दृष्टिगत होता, विस्फारित नेत्र होकर देखने पर भी सम्यक् रूप से दृष्टिगत नहीं हो पाता किन्तु क्षणान्तर में ही उसी स्थान में स्थित वही पदार्थ उसको सूक्ष्मतापूर्वक अनन्य दृष्टिपूर्वक 'न्यक्षनिक्षिप्ताक्ष' होकर देखने पर स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने लगता है—इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि यद्यपि यह सत्य है कि बाद में भी उसे देखने के लिए द्रष्टव्य से अतिरिक्त किसी अन्य साधन का आहरण एवं उपयोग नहीं किया जाता किन्तु, प्रत्युत् होता यह है कि—साधक के अंतर में तात्विक स्वभावानुप्रेवेश का आविर्भाव हो जाता है जिसके बल के स्पर्श से उस दिदृक्षु व्यक्ति को वह पदार्थ याथात्म्यरूप से प्रकाशित हो उठता है—अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि—स्वबलोद्योग मात्र ही सभी १. स्पन्दनिर्णय—आचार्य क्षेमराज । २. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
३२० स्पन्दकारिका प्राणियों के सर्वार्थप्रकाशन का साधन है अन्य कोई भी नहीं—'तेन तात्त्विक स्वभावानु- प्रवेश एवं तस्य सञ्जायते, यद्बलस्पर्शात् तस्य सोऽर्थो याथात्म्येन प्रथते' ततः स्वबलो- द्योगमात्रं सर्वार्थप्रकाशनसाधनं सर्वदेहिनां नान्यत्किंचित् ।'१ इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि पदार्थों को प्रकाशित कर सकने की (स्फुटतः देखने, समझने आदि की) शक्ति तो सभी व्यक्तियों में समान होती है किन्तु प्रबुद्ध योगियों के द्वारा प्रत्यवमृश्यमान होने पर ही किसी पदार्थ का सत्त्व (तात्त्विक स्वरूप) प्रकाशित होता है अन्य के द्वारा नहीं । मायातिमिरतिरस्कृत सम्यक् ज्ञानहीन व्यक्तियों को यह ज्ञान नहीं हो पाता । अतः योगी को ही यह ज्ञात हो पाता है—स्मरण हो पाता है कि इस वस्तु का यथार्थ स्वरूप यह है अन्य को नहीं । जिस प्रकार कि अस्फुटरूप से दृष्ट अर्थ स्वबल प्राप्त करके स्फुटतया देखा जा सकता है उसी प्रकार 'बल' (स्वस्वभाव सामर्थ्य) को प्राप्त करके दिदृक्षु व्यक्ति के = उसमें अभिन्नतया अधिष्ठित होने पर वे पदार्थ उन-उन अवस्थाओं—आकारों-देश-काल आदि स्थितियों में, असंवादी प्रकार से संप्रवर्तित होते हैं—सम्यक् रूप से अभिव्यक्त होते हैं और सम्यक् रूप से ज्ञेय बनकर अभिमुखीभूत होते हैं— 'सम्यक् ज्ञेयतया अभिमुखीभवति ॥' यह वस्तु है क्या? परमार्थेन = तत्त्वतः ।। यत् = जो । गवादि । यथा = जिस प्रकार, 'येन अवस्थात्मना प्रकारेण' येन = जिसके द्वारा यादृशविशिष्टसारभादिमान आकार द्वारा । यत्र = जहाँ । जिस व्यवहित एवं विप्रकृष्ट देश में, काल में । भावार्थ—किसी पदार्थ के अस्फुट रूप से दिखाई पड़ने पर उसके स्फुटतर अवभास के लिए जो सर्वज्ञस्वस्वभावाभेद बिना किसी प्रयत्न के सब में आविर्भूत हो जाता है, प्रबुद्ध उसके परामर्शाभ्यास द्वारा देशकालादिव्यवहित यथाभिमत अर्थों को तात्त्विक दृष्टि से जान लेता है । सर्वज्ञता आदि गुणों की अभिव्यक्ति का कारण यही है । कहा भी गया है— 'परिमितविषयमतीतानागतज्ञानं न । किंचिदाश्चर्यं विनावरण स्वस्वभावत्वात् ॥' उस दशा में देशकाल आदि अनिरुद्ध, एवं स्वस्वभावबल अभिव्यक्त होता है । यहाँ 'अस्फुटोऽर्थो दृष्टः' वाक्य उपलक्षणात्मक है अतः यह श्रुति आदि में भी योजनीय है । अतः इसका अर्थ यह हुआ कि इस प्रयुक्त वाक्य के द्वारा—दृश्य आदि पदार्थ को स्पष्टतर रूप से देखने आदि कार्यों के लिए प्रयत्नविशेषावस्था में संपद्यमान, प्रतिष्ठित स्पन्दानु प्रवेश के द्वारा, समस्त बुद्धि-नेत्र के व्यापार वाले जाग्रत अवस्था वाले पर- तत्त्वोपलब्धि ही यहाँ प्रतिपादित एवं वेदितव्य है । इसे कारिकाकर ने दो श्लोकों द्वारा व्यक्त किया—जो निम्न हैं— १. 'स्पन्दविवृति' (रामकण्ठाचार्य)
तृतीयः निष्यन्दः ३२१ (१) 'यथा किल दूरस्थित' (२) 'यथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण' ।१ आत्मबल का स्पर्श = 'स्वबलोद्योग'— 'सामान्य स्पन्द' ज्ञान का अनन्त रत्नाकर है। उसके संस्पर्श मात्र से चित्त के साथ समस्त ज्ञानेन्द्रियों में भी वह बिलक्षण सामर्थ्य आयत्त हो जाती है जिससे कि वे अस्पष्ट विषयों को भी सुस्पष्ट रूप में एवं उनके अपने गुह्य स्वस्वरूप में देख लेते हैं। 'स्पन्द शक्ति' की इस आकस्मिक गतिमयता को जो कि शम्पावत अकस्मात आती है— 'आत्मबल का स्पर्श' कहलाती है। स्पन्द शक्ति की यह गतिमयता प्रत्येक काल में, प्रत्येक क्षण आन्तरिक रूप से प्रवाहित होती रहती है किन्तु प्राणियों को इस रहस्य का बोध नहीं रहता। योगियों को इसका बोध रहता है। वे इस मध्यवर्ती स्पन्द स्पर्श (आत्म बल) को ग्रहण कर लेते हैं। अतः उनकी संकल्पशक्ति में तीव्रता की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। परिणाम यह होता है कि योगी एकाग्रता की स्वल्प मात्रा में भी भूत, भविष्य एवं सुदूरस्थ पदार्थों, दृश्यों एवं अवस्थाओं को यथास्वरूप यथाकांक्ष स्वल्पावधि में जान लेते हैं या देख लेते हैं। वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं— जिस प्रकार चित्त के सावधान रहने पर भी, किसी भी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ प्रथम दृष्टि में स्पष्टतः दृष्टिगत नहीं होती किन्तु तत्क्षण ही आत्मबल का प्रयोग करके उसको देखने पर वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है उसी प्रकार योगी को भी स्पन्दस्वरूप आत्मबल पर अवस्थित होने की अवस्था में स्वल्पकाल में ही वे समस्त पदार्थ, चाहे वे जिस समय, जिस देश एवं जिस आकार-प्रकार में भी स्थित हों ठीक उसी अवस्था में ज्ञान के विषय बन जाते हैं ।। भट्टकल्लट कहते हैं कि जिस प्रकार किसी भी व्यक्ति को कोई भी दूरस्थित पदार्थ चित्त के एकाग्र न रहने पर प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता किन्तु 'तत्क्षण ही आत्मबल या प्रयत्न विशेष के द्वारा वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दृष्टिगत होने लगता है। ठीक उसी प्रकार स्पन्दात्मक भूमिका पर अवस्थित योगी को उसी प्रकार का विशेष प्रयत्न करने पर स्वल्पावधि में ही उन समस्त पदार्थों का उसी प्रकार साक्षात्कार होने लगता है जिस रूप, जिस स्थान, जिस आकार एवं जिस स्थान में वे विद्यमान हों। इसका कारण क्या है? कारण यह है कि उस योगी के स्वरूप पर से तामसिक आवरण हट चुका है फलतः योगियों के लिए भूत-भविष्य (अतीतानागत) पदार्थों का यथार्थ रूप में बोध होना स्वाभाविक है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। भट्टकल्लट अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं— (१) 'यथा किल दूरस्थितः कश्चिदर्थः पुरुषेण पूर्वं सावधानेनापि न लक्ष्यते स एव स्फुटतरो भवति, प्रयत्नविशेषेण निरूप्यमाणस्तत्रैव स्थितस्य' ।।३६।।—'स्पन्दसर्वस्व' ।।२ १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' २. भट्टकल्लट स्पं० २१
३२२ स्पन्दकारिका (२) 'तथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण यत् वस्तु येन रूपेण यदा यस्मिन् काले, यत्र देशे, यथा, येनाकारेण संस्थितं, तद् वस्तु तथा तद्बलं स्वस्वरूपमाश्रि- तस्याचिरेणैव कालेन प्रतिभाति निरावरणस्वरूपत्वात् तेनातीतागतं ज्ञानं परि- मितविषयं न किञ्चिदाश्चर्यम्' ।। ३७ ।।¹ शैव दर्शन के अनुसार— (१) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अत्यन्त अस्पृष्ट, अदृष्ट, अश्रुत एवं अज्ञात दूरस्थ वस्तुओं को देख न पाने पर दिदृक्षा की तीव्रोत्कण्ठा होने पर दिदृक्षु प्रमाता की बहिर्मुखी प्रवाहित स्पन्द धारा अकस्मात अन्तर्मुखी होकर अपने मूल केन्द्र (सामान्य स्पन्द प्रवाह) में लय हो जाती है और इसी कारण एकाग्रता की तीव्रता उपबृंहित हो जाने के कारण वह वस्तु अत्यन्त दूरस्थ होने पर भी अत्यन्त सुस्पष्टता के साथ दृष्टिगत होने लगती है। (२) स्पन्दशक्ति की गतिशीलता आन्तरिक रूप में सदैव चलती रहती है किन्तु प्राणी इसे जानते नहीं। इस गुप्त रहस्य को गुरु की अनुकम्पा से शिष्य जान लेता है। योगी तीव्र विमर्शात्मक गवेषणा एवं विशिष्ट गम्भीर प्रयत्नों के द्वारा अन्तरालानुगत संवित् संस्पर्शों को पकड़कर उन पर स्थिर रह सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। इन योगियों की सङ्कल्प शक्ति इतनी तीव्र होती है कि स्वल्प संवेदनात्मक एकाग्रता आने पर भी उसके द्वारा वह भूत एवं भविष्य तथा दूर से दूर वर्तमान वस्तुओं को प्रत्यक्षीकृत कर लेता है। स्पन्दात्मक आत्मबल की शक्ति— दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । आच्छादयेद् बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार निर्बलशरीरी व्यक्ति भी आत्मबल को प्राप्त करके (कठिनतम कार्यों को भी) निष्पादित कर डालता है और अत्यन्त क्षुधातुर रहने पर भी अपनी क्षुधा को निवृत्त कर लेता है (उसी प्रकार एक सिद्ध योगी भी अत्यधिक दुर्बल रहने पर भी स्पन्दात्मक आत्मबल प्राप्त करके दुष्कर से दुष्कर कार्य को भी निष्पादित कर डालता है और अत्यधिक क्षुधातुर होने पर भी यथाकांक्ष अवधिपर्यन्त अपनी क्षुधा को नियन्त्रण में रख लेता है ।) ॥ ३८ ॥
- सरोजिनी * सामान्य व्यक्ति की शक्ति 'उद्योग बल' है और योगी की शक्ति 'स्पन्दात्मक आत्मबल' है। विशेष परिस्थितियों में जो विलक्षण या असाधारण कार्य अकस्मात् निष्पादित हो जाते हैं उन्हें 'आवेश' या 'भावावेश' भी कहा जाता है किन्तु यह भावावेश है क्या? आत्मबल का संस्पर्श मात्र ही तो यह है। दुर्बल व्यक्ति भी उस शक्ति को प्राप्त करके किसी कार्य में प्रवृत्त हो जाता है एवं बुभुक्षित व्यक्ति भी उस बल (संयम बल) से अपनी बुभुक्षा का शमन कर लेता है।² १. भट्टकल्लट । २. स्पन्दनिर्णय ।
तृतीयः निष्यन्दः ३२३ इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि बल ही सर्वोपरि है और यह बल आत्मसापेक्ष बल है जिस प्रकार एक दुर्बल व्यक्ति जिसकी जीवनीशक्ति क्षीण हो गयी है-अपने को, किसी कार्य को पूर्ण करने में, संलग्न रखता है या अपने ऊपर सौंपे अपरिहार्य कार्य को अपनी स्पन्दात्मकशक्ति के द्वारा संपादित करता है । वह व्यक्ति उस जीवन शक्ति (Vitality) के द्वारा कठिनतम एवं दुःसाध्य कार्य को भी पूर्ण कर लेता है । उसी प्रकार अति बुभुक्षित व्यक्ति उसी प्रेरणा द्वारा अपनी भूख को शान्त कर सकता है । ताप शीत की पराधीनता उस व्यक्ति के लिए नहीं होती जो चेतना के स्तर पर आरूढ़ हो चुका है क्योंकि यह ताप एवं शीत की पराधीनता केवल चेतनारूढ़ व्यक्ति के स्तर पर ही प्रभावकारी होती है किन्तु वह चेतना में लय हो जाती है ।१ ज्ञानशक्ति का निरूपण करके ग्रन्थकार अड़तीसवीं कारिका में कार्य-कर्तृत्व की सामर्थ्य का वर्णन करता है— जो पुरुष क्षीणधातु, अशक्त, कृश एवं दुर्बल भी हो गया है वह भी अपने उत्साहात्मक बल, एवं उद्योग को स्वीकार करके अपने कार्य में प्रवृत्त होता है और उसे सम्पन्न करता है । निर्बल व्यक्ति भी उद्योग-बल का आलम्बन लेकर युद्धभूमि में अपने अपूर्व शौर्य का परिचय देता है । असमर्थ व्यक्ति भी व्यायामाभ्यास से महती शक्ति प्राप्त कर लेता है । यह उद्योग-बल आत्मसंवित् का ही बल है । बुभुक्षित व्यक्ति अपने स्वभाव का अनुशीलन करके भूख को शान्त कर लेता है । पतञ्जलि ने कण्ठकूप में संयम करने से भूख-प्यास मिट जाने का उपाय बताया है । संयम के बल पर मनुष्य हाथी सरीखा बल प्राप्त कर सकता है इसका अभिप्राय यह है कि आत्मबल की अभिव्यक्ति होने पर शोक, मोह, जरा एवं मृत्यु आदि षड्मियों का नाश हो जाता है ।२ दुर्बलोऽपि = शक्तिहीन व्यक्ति भी । यतः = जिस कारण से । बल = सर्वकर्तृत्व-स्वातन्त्र्यलक्षण वाला सामर्थ्य । आक्रम्य = पूर्वोक्त युक्ति के द्वारा अव्यतिरेकपूर्वक स्थित होकर । कार्ये = भारोद्वहन आदि कार्यों में । प्रवर्तते = क्रिया प्रधान हो जाता है ।३ आक्रम = आक्रमण । कब्जा करना । प्राप्त करना । घेरना । पकड़ लेना । आक्रान्ति = कब्जा करना । आरोहण । पराभूत करना, सामर्थ्य, शक्ति । तात्पर्य यह है कि जो परिकृशकाय होने के कारण शक्ति-क्षीण एवं सामर्थ्यहीन हैं वे भी संध्यादिक व्यापार में प्रवृत्त होकर, अभ्यास के बल से अन्य विषयों में अत्यधिक अशक्य कार्यों को भी स्वात्मबल से कर डालते हैं यथा व्यायाम आदि कार्य । यह बल या सामर्थ्य स्वस्वभाव बल की प्राप्ति से ही आता है । इसके अतिरिक्त अन्य किसी निमित्त से यह बल प्राप्त नहीं होता । सर्वकर्तृत्वलक्षण वाले आत्मतत्त्व के बल की १. स्पन्दनिर्णय । २. उत्पलदेव - 'स्पन्दप्रदीपिका' । ३. रामकण्ठाचार्य - 'स्पन्दविवृति' ।
३२४ स्पन्दकारिका आवश्यकता होती है। मायीय कर्ता माया के द्वारा शक्ति के प्रतिबद्ध हो जाने के कारण इस बल की प्राप्ति का उपाय किसी अन्य नियत कारणान्तर को मानता है और उस नियत कारणान्तर से नियत कार्य ही संपादित हो पाने को मानता है। किन्तु यदि वह यह सोच ले कि 'इस कार्य को मैं भी कर सकता हूँ' और पूर्ण सोत्साह होकर उस बल का अवलम्बन लेकर उस कार्य को करना चाहे तो उस कार्य को संपादित कर सकता है। किन्तु यह युक्ति प्राप्त करना केवल योगियों के लिए ही संभव हो पाता है— 'इति युक्तियोगिन एव प्रतिपत्तिगोचरीभवति ।' यह उन्हें ही दृष्टान्तीकृत करके इस दार्ष्टान्तिक वाक्य को उपदिष्ट किया गया अर्थात् दुर्बल व्यक्ति भी सबल की भाँति संपाद्यकार्य को संपादित करने में समर्थ होता है और यह कार्य स्वस्वभावबल के आक्रमण (संप्राप्ति) द्वारा ही निष्पन्न होता है। तथा—उसी प्रकार समस्त कार्यों को संपादित करने में स्वतन्त्र स्वबल को प्राप्त करके और उसे स्वशक्ति द्वारा अधिष्ठित करके। योऽतिबुभुक्षितः—अत्यन्त भोजने- च्छाविष्ट व्यक्ति। उस बुभुक्षा को आच्छादयेत्—स्थगित कर दे। स्थगित कर देना चाहिए। स्वस्वरूपप्रथन के द्वारा अन्नादिक अभ्यवहार (भोजन करने की क्रिया) रूप कारण द्वारा क्षुधा-निवृत्ति रूप कार्य निष्पादित होता है। व्यक्ति को नित्य तृप्त होना चाहिए। प्रतिबन्ध-विदलन द्वारा व्यक्ति को असामर्थ्य का तिरोभाव करना चाहिए। १ शाक्तबल (स्पन्दात्मिका शक्ति) के द्वारा सर्वकर्तृत्व की प्राप्ति— स्पन्दात्मक आत्मबल एवं सर्वज्ञता तथा सर्वकर्तृत्व—जिस प्रकार दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी आवेशावस्था में अशक्य कार्य को भी, अलक्ष्य आत्मबल की सहायता से निष्पादित कर लेता है और अत्यन्त क्षुधार्त होने पर भी अपनी बुभुक्षा को शमित कर लेता है उसी प्रकार सिद्धयोगी शरीर के अत्यन्त निर्बल होने पर भी स्पन्दात्मक आत्मबल पर अवस्थित होकर बड़े से बड़े दुष्कर कार्य भी निष्पादित कर लेता है। भट्टकल्लट—जिस प्रकार कोई अशक्तव्यक्ति अपने उद्योग बल का आश्रय ग्रहण करके व्यायामादिक बल से महती शक्ति प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार योगी क्षीण धातु होने पर भी अपने अदम्य उत्साह बल से आत्मबल प्राप्त करके कठिन कार्यों को निष्पादित करने हेतु उन्मुख हो जाता है। इसके अतिरिक्त वह इसी स्वभाव का संतता- नुशीलन करने से अत्यधिक क्षुधार्त होने पर भी अपनी क्षुधा को अपने वश में कर लेता है। इसका कारण क्या है ? कारण है— 'सर्वत्रैवात्मस्य रूपस्य कार्यकारण संपादन सामर्थ्यमविलम्बनम् ।। अर्थात् स्वरूप में सर्वत्र कार्यों एवं उनके कारणों को सत्ता प्रदान करने की शक्ति है। भट्टकल्लट कहते हैं— 'क्षीणधातुरपि तद्बलमुत्साहलक्षणमाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते, यथा च कश्चिद् अशक्तोऽपि व्यायामाभ्यासेन महती शक्ति प्राप्नोति उद्योग बलेन, तथानेन स्वभावानुशीलनेन बुभुक्षामपि आच्छादयति योऽतिबुभुक्षितः स्यात् यतः सर्वत्रैवा- त्मस्य रूपस्य कार्यकारणसंपादनसामर्थ्यमविलम्बितम् ॥ ३८ ॥ १. रामकण्ठाचार्य— 'स्पन्दविवृति'
तृतीयः निष्यन्दः ३२५ जिस किसी भी सामान्य शरीर में संवेदक स्पन्दतत्त्व स्थित हो उसमें उसके अनुकूल देश, काल एवं आकार में सर्वज्ञता आदि धर्म अभिव्यक्त होते हैं वहाँ देहा- भिमान से मुक्त होकर उस आत्मतत्त्व को ही अहं रूप में अनुभव करने वाले योगी में सर्वव्यापक, सार्वदेशिक सर्वज्ञता आदि धर्म अवश्य व्यक्त हो जाते हैं ॥ ३९ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—'अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादो यस्मात्, तत्र स्वल्पयूकाभक्षणमपि क्षिप्रमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्व- ज्ञता भविष्यति ॥ ३९ ॥ आवेश और शाक्त बल—किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में, किन्हीं भयास्पद स्थितियों में एवं एकाग्रता की प्रगाढ़ता में या तीव्रावेश में व्यक्ति ऐसे कार्य कर डालता है जो कि सामान्यतः कभी कर ही नहीं सकता । 'आवेश' भी आत्मबल (स्पन्द शक्ति या संवित् शक्ति) की शक्ति है । मन में उदित होने वाली अनन्त इच्छाओं, चिन्ताओं एवं क्षोभों के अन्तराल में स्थित नित्योदित उन्मेषतत्त्व, एकाग्र मनोभाव के क्षणों में, प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है । आवेश अकस्मात् प्रकट होने वाली वह अत्यन्त प्रबल एवं अदम्य वृत्ति या चिकीर्षा शक्ति है जिसके द्वारा शरीर में शाक्त शक्ति अलक्ष्य रूप में प्रवाहित होने लगती है । यह प्रत्येक प्राणी में विद्यमान आत्मशक्ति का अस्थायी संस्पर्श है । यह आवेशात्मक शाक्त प्रेरणा कहीं बाहर से नहीं आती प्रत्युत् हृदय में ही निहित रहती है और स्पर्शमात्र से उद्बुद्ध हो जाती है । सामान्य पशुओं में भी आवेशात्मक स्थितियों में आश्चर्यजनक कार्य करने के अनेक प्रमाण मिलते हैं (यथा गाय का सिंह से लड़ जाना आदि) यह शक्ति भी आत्मबल का उदाहरण है । मानवों में यह शक्ति आत्मबल से पूर्णतः सम्बद्ध है जब कि पशुओं में क्षणिकावेश के कारण इन आवेश का सम्बन्ध स्पन्द तत्त्व से उतना नहीं है । स्पन्दतत्त्व के समावेश से अधिगत शक्तियाँ— (सर्वज्ञता आदि सिद्धियों की प्राप्ति) अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः । तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैवं भविष्यति ॥ ३९ ॥ इस (आत्म स्वभाव) से शरीर के व्याप्त होने पर उसमें सर्वज्ञता आदि धर्म अभिव्यक्त हो उठते हैं उसी प्रकार (देहाभिमान से मुक्त होकर) आत्मतत्त्व को ही अहं के रूप में अनुभव करने वाले योगी में सर्वव्यापक सर्वज्ञत्व आदि धर्म अभिव्यक्त हो उठते हैं ॥ ३९ ॥
- सरोजिनी * प्रस्तुत कारिका में आत्मबल की महिमा पर प्रकाश डाला गया है । किसी विशिष्ट परिस्थिति में व्यक्ति कुछ असाधारण कार्यों को निष्पादित कर डालता है जिसे वह सामान्य स्थितियों में निष्पादित नहीं कर सकता । इसे 'आवेश' का अभिधान दिया जाता
३२६ स्पन्दकारिका है। यह आवेशात्मक बल सामान्य व्यक्तियों में तो क्षणस्थायी होता है किन्तु योगियों में यह सार्वकालिक, सार्वत्रिक एवं सर्वावस्थानुगत होता है। यह उनमें अत्यन्त विलक्षण तीव्रता के साथ विद्यमान होता है और स्थायी होता है क्योंकि वे अपनी अहन्ता को आत्मा से तादात्म्यपूर्वक अनुभव करते हैं। अनेन = इससे। स्वस्वभावस्वरूप स्पन्दतत्त्व के द्वारा। अधिष्ठिते = अधिष्ठित होने पर। व्याप्त होने पर। यौगिक विभूतियों की प्राप्ति—उक्त कारिका में सर्वज्ञतादिक यौगिक विभूतियों की प्राप्ति का वर्णन किया गया है। योगशास्त्र में भी इन विभूतियों का वर्णन किया गया है तथा—'परिणामत्रय संयमादतीतानागतज्ञानम् ॥' (यो०सू०) (३।३) अर्थात् तीनों परिणामों में संयम कर लेने से अतीत, भूत एवं अनागत तीनों का ज्ञान हो जाता है। 'शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ (योगसूत्र ३।१७)। शब्द अर्थ और ज्ञान—इन तीनों का जो एक में दूसरे का अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण हो रहा है उसके विभाग में संयम करने से संपूर्ण प्राणियों की वाणी का ज्ञान हो जाता है। न केवल इस शरीर के सम्बन्ध में वह सर्वज्ञ हो जाता है प्रत्युत् उसे सर्वत्र सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है। योग मार्ग की विभूतियाँ—जिस प्रकार इस तत्त्व के द्वारा शरीर के व्याप्त होने पर सर्वज्ञता आदि गुण अपने को व्यक्त कर देते हैं उसी प्रकार जहाँ भी योगी अपनी अन्तरात्मा में स्थित होता है वे उपर्युक्त गुण अपने को व्यक्त कर देते हैं ॥ ७ ॥ स्वस्वभावात्मा स्पन्दतत्त्व से शरीर के व्याप्त (अधिष्ठित) हो जाने पर जैसे प्राणी के तदवस्थोचित अर्थानुभव करणादिरूप सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वादि धर्म उत्पन्न हो जाते हैं।¹ कूर्मासंकोच के समान सर्वोपसंहार द्वारा या महाविकास की युक्ति द्वारा या जब अपनी अनपायिनी चिद्रूप आत्मा में अधिष्ठान करता है तब उस अभिज्ञान के प्रत्यभिज्ञात हो जाने पर वहीं समावेश की स्थिति प्राप्त हो जाती है। तब साधक सर्वत्र अर्थात् शिव से लेकर क्षितिपर्यन्त शङ्करोचित सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व रूप गुणों से युक्त हो जाएगा ॥² जिस प्रकार सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण तथा तदवस्थो चित अर्थानुभव व्यक्ति के शरीर में तब प्रकट होते हैं जब कि वह शरीर अपने स्वरूप से अभिन्न स्पन्द तत्त्व से अधिष्ठित हो जाता है उसी प्रकार यह सशरीरी आत्मा (Embodied Self) चिद्रूप आत्मा में स्थित होने पर (चाहे वह कछुए के अंग-संकोच की भाँति अपनी समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओं को समेट कर या अपना पूर्ण विकास करके अभिज्ञानों से प्रत्यभिज्ञात समावेश की स्थिति या आत्मा पर प्रगाढ़ ध्यान करके एवं शिव से लेकर क्षिति पर्यन्त सर्वत्र सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों को शिव बनकर प्राप्त कर लेता है)।³ १-३. स्पन्दनिर्णय।
तृतीयः निष्यन्दः ३२७ भट्टकल्लट 'वृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार करते हैं— अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादयो यस्मात् तत्र स्वल्प यूकाभक्षणमपि क्षिप्रमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्वज्ञता भविष्यति ।¹ स्वस्वभाव के द्वारा अपने इस शरीर पर अधिकार कर लेने से इसके विषय में जैसे सर्वज्ञता आदि गुणों की प्राप्ति हो जाती है—कोई छोटा सा कीड़ा छू जाय तो पता चल जाता है उसी प्रकार अपने स्वरूप, या स्वभाव पर आधिपत्य स्थापित हो जाने पर सर्वत्र सब कुछ ज्ञात हो जाता है । 'ज्ञानसंबोध' में कहा भी गया है—सब कुछ वही है क्योंकि वह व्यापक है । वह स्वभाव से ही सर्वज्ञ है । 'यह पुरुष सर्वज्ञ है'—इसी से सर्वज्ञता प्रस्फुटित होती है— इस संदर्भ में यह भी कहा गया है—यदि सबके हृदय में विद्यमान तुम सर्वदा सर्वज्ञ न होते तो भला, नष्ट पदार्थविषयक स्मृति किसी को कैसे होती? जन्म लेते ही बालक स्तनपान की शिक्षा किससे प्राप्त करता है? छोटे-छोटे जन्तुओं को जल में तैरना कौन सिखाता है? यह सब तुम्हारी सर्वज्ञता का ही उल्लास है— 'सर्वज्ञः सर्वदैव त्वं सर्वस्य हृदये न चेत् । केनाऽन्यथास्य संभाव्या नष्टार्थविषया स्मृतिः ॥ तदहर्जातबालैश्च स्तनपानं क्व शिक्षितम्? प्राणिभिर्वाप्सु तरणमेतत् सर्वज्ञ चेष्टितम् ॥' अन्य भी कहा गया है—जो निम्नांकित है— मधुमक्खी जब मधुसंचय करने लगती है तब उसको यह संवित् कैसे होती है कि मुझे किसका रस लेना चाहिए? किसका नहीं लेना चाहिए? कौन स्वादिष्ट है और कौन अस्वादिष्ट?—यह आपका ही विलास नहीं तो और क्या है? नन्हें-नन्हें कीड़े भी अपने भरण-पोषण की आश्चर्यजनक व्यवस्था कर लेते हैं । अज्ञानी पशु हाथी अपने ऊपर जल फेंककर स्नान करता है । वह किसके ज्ञान का फल है? भोले हिरनों को संगीत की पहचान कैसे होती है जिससे वे खाना-पीना भी भूल जाते हैं?—इस अनन्त संवित् का विलास हुए बिना चूहा बिल में रहते हुए भी बिल्ली से क्यों डरता है? विवेकरहित कछुआ पानी के भीतर छिप जाता है और अपने समस्त अंगों को समेट लेता है—यह बुद्धि उसे कहाँ से प्राप्त होती है? आत्मसंवित् ही तो मोर में बैठकर नाच रही है । पक्षी अगाध जल में कूदकर मछली पकड़ने का कौशल किससे सीखता है? हंस नीर से क्षीर का विवेक करने की संवित् किससे प्राप्त करता है? छोटा से छोटा जीव बोलकर अपनी भावना कैसे प्रकट करता है? प्रातःकाल 'आज यह-यह काम करना है'—ऐसा संकल्प कहाँ से उदय होता है? मूर्ख पशुओं को अपने सींग, दाँत और पंजे से दूसरों पर प्रहार करने की विद्या किसने १. भट्टकल्लटः स्पन्दकारिकावृत्ति (३९) ।
३२८ स्पन्दकारिका सिखाई है? यदि भीतर अखण्ड संवित् स्पन्दित न होता तो हाथी को अपने बल और सिंह को अपने तेज का पता कैसे चलता? पशु पक्षियों को भी अतिवृष्टि और अनावृष्टि, एवं भूकम्प आदि की पूर्वसूचना कहाँ से प्राप्त हो जाती है? यमराज के समान भयंकर सिंह आदि प्राणियों से भी मनुष्य का प्रेम हो जाता है। बिना सबके हृदय में एक संविद् की स्थिति होते हुए भला ऐसी मित्रता या मिलनसारी कहाँ से आती है?— भक्ष्यं स्यात्किमभक्ष्यं वा स्वाद्वस्वाद्विति निश्चये। मक्षिकाणां कुतः संवित्? क्षौद्रसंचितिकर्मणि॥ सर्वज्ञस्याप्यधिष्ठातुस्तद्विजृम्भितमन्यथा। कृमिमात्राल्पकायानां संभृतिर्विस्मयास्पदम्॥ कतकस्य फलं वारिप्रसाधन विधित्सया। द्विपः सिपति तस्यैषा प्रज्ञा ह्यज्ञस्य किं पशोः॥ गीताकर्णनवैदग्ध्यं मुग्ध बुद्धेर्मृगस्य किम्। संभाव्यते हि येनाऽस्य रोमन्थविरता स्थितिः॥ भक्षयिष्यति मामित्थमाखार्विवरवर्तिनः। मार्जारं प्रति का शंका सर्वज्ञ ज्ञापनं विना॥ भयात् कूर्मः सवार्यन्तः सर्वाण्यंगानि गूहते। दुर्भेदबुद्धिस्तत्रास्यविवेकविकलस्य किम्॥ वीक्ष्यान्यक्षींणपक्षाणां वैलक्षण्यमचेतनः। नृत्तमारभते बर्ही स्फुरितं तज्जगद्गुरोः॥ अगाधजलमध्यस्थमत्स्यभक्षणलक्षणम्। केनोपदिष्टं तन्मग्दोरनुमानं विना कृतम्॥ अशक्तशक्ति कस्येयं सलिलात् पिबतः पयः। हंसस्य न पुनस्तस्य हृदयान्तर वर्तिनः॥ कृकवाकोर्गिरः कस्मात् क्षेत्रज्ञव्यापिन विना। यासामाकलनोद्युक्तो कालवित्कलना ततः॥ प्रवर्तते दिनारंभे निर्भ्रान्त कृत संविधिः। शृदन्त नखादीन प्राणिनामायुधानि यत्॥ परप्रहरणोद्रेके केनाख्यातान्यसंविदाम्। बलं तेजः करी सिंहो जानाति निजभूर्जितम्॥ को हेतुर्यावदन्तस्तथप्रतिपत्तिर्न सस्फुरा। अतिवृष्टेरनावृष्टेर्व्यञ्जकं चिह्नमिङ्गितैः॥ सूचयन्ति न तच्चित्रं पशवः पक्षिणोऽपि यत्॥ कृतान्तकल्पैः सिंहाद्यैः प्रीतिः प्राणभृतां कुतः। विनैकस्य हृदिस्थस्य संवित्संवादसुस्थितम्॥
तृतीयः निष्यन्दः ३२९ यह सब आत्मसंवित् की ही विशेषाभिव्यक्ति है। अपने स्वरूप में स्थिति अर्थात् सबके स्वरूप में स्थिति है। कभी स्वरूप से च्युति नहीं होती। यही युक्ति है जिससे सर्वत्र सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता आदि अभिव्यक्त हो जाते हैं। कहा भी गया है— एक ही भाव सबका स्वभाव है। सभी भाव एक ही भाव के स्वभाव हैं। जिसने एक ही भाव को तत्त्वतः अनुभव कर लिया उसने सभी भावों को तत्त्वतः अनुभव कर लिया— एको भावः सर्वभावस्वभावः सर्वे भावा ह्येकभावस्वभावाः । एको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः ॥ इस संबन्ध में एक रहस्य-युक्ति है कि जिस-जिस शरीर में संवित् दृढ़ता प्राप्त करेगा वहीं-वहीं उसके समस्त गुण प्रकट हो जाएँगे— ‘रहस्ययुक्तिरत्रेयं शरीरे यत्र यत्र च । संविदो दार्ढ्यलाभः स्यात्तत्र तत्र गुणोदयः ॥१ सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्व आदि गुणों की अभिव्यक्ति के उपायों को प्रतिपादित करके कारिकाकार अब एक उपपत्ति के निदर्शन के द्वारा उसे प्रदर्शित कर रहा है। अनेन = इस चेतन आत्मा के द्वारा। अधिष्ठिते = अधिष्ठित होने पर। मैं हूँ—इस प्रतिपत्ति के द्वारा अध्यासित होने पर, देहे = शरीर के। सर्वज्ञतादयः = सर्वज्ञातृत्व आदि। शरीराश्रित समस्त ज्ञेय कार्य। सर्व+ज्ञता । ‘ज्ञता’ = ज्ञातृत्वादिक जिसमें हों वे वे ही कर्तृत्वादिक धर्म। यथा = जिस प्रकार। सभी में स्थित हैं। व्यक्ति केवल अपने शरीर के स्तर पर ही सर्वज्ञ नहीं हो जाता प्रत्युत् वह सर्वत्र सर्वज्ञ हो जाता है। यह आत्मा जिस जिस भी पदार्थ को अहं के रूप में स्वीकार करता जाता है वे सभी उसके शरीर बनते जाते हैं और समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म पदार्थ उसके आश्रित होते जाते हैं। वह इन सभी को जानने लगता है और सभी कार्य करने लगता है। तथैव = उसी प्रकार, देह की अहं के रूप में स्वीकार करने या अहं को देहाधिष्ठान मानने की भाँति ।२ ग्लानि और उसकी निवृत्ति— ग्लानिर्विलुण्ठिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥ ४० ॥ १. उत्पलदेवाचार्य— ‘स्पन्दप्रदीपिका’। २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति'।