भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 425

३२४ स्पन्दकारिका आवश्यकता होती है। मायीय कर्ता माया के द्वारा शक्ति के प्रतिबद्ध हो जाने के कारण इस बल की प्राप्ति का उपाय किसी अन्य नियत कारणान्तर को मानता है और उस नियत कारणान्तर से नियत कार्य ही संपादित हो पाने को मानता है। किन्तु यदि वह यह सोच ले कि 'इस कार्य को मैं भी कर सकता हूँ' और पूर्ण सोत्साह होकर उस बल का अवलम्बन लेकर उस कार्य को करना चाहे तो उस कार्य को संपादित कर सकता है। किन्तु यह युक्ति प्राप्त करना केवल योगियों के लिए ही संभव हो पाता है— 'इति युक्तियोगिन एव प्रतिपत्तिगोचरीभवति ।' यह उन्हें ही दृष्टान्तीकृत करके इस दार्ष्टान्तिक वाक्य को उपदिष्ट किया गया अर्थात् दुर्बल व्यक्ति भी सबल की भाँति संपाद्यकार्य को संपादित करने में समर्थ होता है और यह कार्य स्वस्वभावबल के आक्रमण (संप्राप्ति) द्वारा ही निष्पन्न होता है। तथा—उसी प्रकार समस्त कार्यों को संपादित करने में स्वतन्त्र स्वबल को प्राप्त करके और उसे स्वशक्ति द्वारा अधिष्ठित करके। योऽतिबुभुक्षितः—अत्यन्त भोजने- च्छाविष्ट व्यक्ति। उस बुभुक्षा को आच्छादयेत्—स्थगित कर दे। स्थगित कर देना चाहिए। स्वस्वरूपप्रथन के द्वारा अन्नादिक अभ्यवहार (भोजन करने की क्रिया) रूप कारण द्वारा क्षुधा-निवृत्ति रूप कार्य निष्पादित होता है। व्यक्ति को नित्य तृप्त होना चाहिए। प्रतिबन्ध-विदलन द्वारा व्यक्ति को असामर्थ्य का तिरोभाव करना चाहिए। १ शाक्तबल (स्पन्दात्मिका शक्ति) के द्वारा सर्वकर्तृत्व की प्राप्ति— स्पन्दात्मक आत्मबल एवं सर्वज्ञता तथा सर्वकर्तृत्व—जिस प्रकार दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी आवेशावस्था में अशक्य कार्य को भी, अलक्ष्य आत्मबल की सहायता से निष्पादित कर लेता है और अत्यन्त क्षुधार्त होने पर भी अपनी बुभुक्षा को शमित कर लेता है उसी प्रकार सिद्धयोगी शरीर के अत्यन्त निर्बल होने पर भी स्पन्दात्मक आत्मबल पर अवस्थित होकर बड़े से बड़े दुष्कर कार्य भी निष्पादित कर लेता है। भट्टकल्लट—जिस प्रकार कोई अशक्तव्यक्ति अपने उद्योग बल का आश्रय ग्रहण करके व्यायामादिक बल से महती शक्ति प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार योगी क्षीण धातु होने पर भी अपने अदम्य उत्साह बल से आत्मबल प्राप्त करके कठिन कार्यों को निष्पादित करने हेतु उन्मुख हो जाता है। इसके अतिरिक्त वह इसी स्वभाव का संतता- नुशीलन करने से अत्यधिक क्षुधार्त होने पर भी अपनी क्षुधा को अपने वश में कर लेता है। इसका कारण क्या है ? कारण है— 'सर्वत्रैवात्मस्य रूपस्य कार्यकारण संपादन सामर्थ्यमविलम्बनम् ।। अर्थात् स्वरूप में सर्वत्र कार्यों एवं उनके कारणों को सत्ता प्रदान करने की शक्ति है। भट्टकल्लट कहते हैं— 'क्षीणधातुरपि तद्बलमुत्साहलक्षणमाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते, यथा च कश्चिद् अशक्तोऽपि व्यायामाभ्यासेन महती शक्ति प्राप्नोति उद्योग बलेन, तथानेन स्वभावानुशीलनेन बुभुक्षामपि आच्छादयति योऽतिबुभुक्षितः स्यात् यतः सर्वत्रैवा- त्मस्य रूपस्य कार्यकारणसंपादनसामर्थ्यमविलम्बितम् ॥ ३८ ॥ १. रामकण्ठाचार्य— 'स्पन्दविवृति'