स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३२३ इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि बल ही सर्वोपरि है और यह बल आत्मसापेक्ष बल है जिस प्रकार एक दुर्बल व्यक्ति जिसकी जीवनीशक्ति क्षीण हो गयी है-अपने को, किसी कार्य को पूर्ण करने में, संलग्न रखता है या अपने ऊपर सौंपे अपरिहार्य कार्य को अपनी स्पन्दात्मकशक्ति के द्वारा संपादित करता है । वह व्यक्ति उस जीवन शक्ति (Vitality) के द्वारा कठिनतम एवं दुःसाध्य कार्य को भी पूर्ण कर लेता है । उसी प्रकार अति बुभुक्षित व्यक्ति उसी प्रेरणा द्वारा अपनी भूख को शान्त कर सकता है । ताप शीत की पराधीनता उस व्यक्ति के लिए नहीं होती जो चेतना के स्तर पर आरूढ़ हो चुका है क्योंकि यह ताप एवं शीत की पराधीनता केवल चेतनारूढ़ व्यक्ति के स्तर पर ही प्रभावकारी होती है किन्तु वह चेतना में लय हो जाती है ।१ ज्ञानशक्ति का निरूपण करके ग्रन्थकार अड़तीसवीं कारिका में कार्य-कर्तृत्व की सामर्थ्य का वर्णन करता है— जो पुरुष क्षीणधातु, अशक्त, कृश एवं दुर्बल भी हो गया है वह भी अपने उत्साहात्मक बल, एवं उद्योग को स्वीकार करके अपने कार्य में प्रवृत्त होता है और उसे सम्पन्न करता है । निर्बल व्यक्ति भी उद्योग-बल का आलम्बन लेकर युद्धभूमि में अपने अपूर्व शौर्य का परिचय देता है । असमर्थ व्यक्ति भी व्यायामाभ्यास से महती शक्ति प्राप्त कर लेता है । यह उद्योग-बल आत्मसंवित् का ही बल है । बुभुक्षित व्यक्ति अपने स्वभाव का अनुशीलन करके भूख को शान्त कर लेता है । पतञ्जलि ने कण्ठकूप में संयम करने से भूख-प्यास मिट जाने का उपाय बताया है । संयम के बल पर मनुष्य हाथी सरीखा बल प्राप्त कर सकता है इसका अभिप्राय यह है कि आत्मबल की अभिव्यक्ति होने पर शोक, मोह, जरा एवं मृत्यु आदि षड्मियों का नाश हो जाता है ।२ दुर्बलोऽपि = शक्तिहीन व्यक्ति भी । यतः = जिस कारण से । बल = सर्वकर्तृत्व-स्वातन्त्र्यलक्षण वाला सामर्थ्य । आक्रम्य = पूर्वोक्त युक्ति के द्वारा अव्यतिरेकपूर्वक स्थित होकर । कार्ये = भारोद्वहन आदि कार्यों में । प्रवर्तते = क्रिया प्रधान हो जाता है ।३ आक्रम = आक्रमण । कब्जा करना । प्राप्त करना । घेरना । पकड़ लेना । आक्रान्ति = कब्जा करना । आरोहण । पराभूत करना, सामर्थ्य, शक्ति । तात्पर्य यह है कि जो परिकृशकाय होने के कारण शक्ति-क्षीण एवं सामर्थ्यहीन हैं वे भी संध्यादिक व्यापार में प्रवृत्त होकर, अभ्यास के बल से अन्य विषयों में अत्यधिक अशक्य कार्यों को भी स्वात्मबल से कर डालते हैं यथा व्यायाम आदि कार्य । यह बल या सामर्थ्य स्वस्वभाव बल की प्राप्ति से ही आता है । इसके अतिरिक्त अन्य किसी निमित्त से यह बल प्राप्त नहीं होता । सर्वकर्तृत्वलक्षण वाले आत्मतत्त्व के बल की १. स्पन्दनिर्णय । २. उत्पलदेव - 'स्पन्दप्रदीपिका' । ३. रामकण्ठाचार्य - 'स्पन्दविवृति' ।