भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 426

तृतीयः निष्यन्दः ३२५ जिस किसी भी सामान्य शरीर में संवेदक स्पन्दतत्त्व स्थित हो उसमें उसके अनुकूल देश, काल एवं आकार में सर्वज्ञता आदि धर्म अभिव्यक्त होते हैं वहाँ देहा- भिमान से मुक्त होकर उस आत्मतत्त्व को ही अहं रूप में अनुभव करने वाले योगी में सर्वव्यापक, सार्वदेशिक सर्वज्ञता आदि धर्म अवश्य व्यक्त हो जाते हैं ॥ ३९ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—'अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादो यस्मात्, तत्र स्वल्पयूकाभक्षणमपि क्षिप्रमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्व- ज्ञता भविष्यति ॥ ३९ ॥ आवेश और शाक्त बल—किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में, किन्हीं भयास्पद स्थितियों में एवं एकाग्रता की प्रगाढ़ता में या तीव्रावेश में व्यक्ति ऐसे कार्य कर डालता है जो कि सामान्यतः कभी कर ही नहीं सकता । 'आवेश' भी आत्मबल (स्पन्द शक्ति या संवित् शक्ति) की शक्ति है । मन में उदित होने वाली अनन्त इच्छाओं, चिन्ताओं एवं क्षोभों के अन्तराल में स्थित नित्योदित उन्मेषतत्त्व, एकाग्र मनोभाव के क्षणों में, प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है । आवेश अकस्मात् प्रकट होने वाली वह अत्यन्त प्रबल एवं अदम्य वृत्ति या चिकीर्षा शक्ति है जिसके द्वारा शरीर में शाक्त शक्ति अलक्ष्य रूप में प्रवाहित होने लगती है । यह प्रत्येक प्राणी में विद्यमान आत्मशक्ति का अस्थायी संस्पर्श है । यह आवेशात्मक शाक्त प्रेरणा कहीं बाहर से नहीं आती प्रत्युत् हृदय में ही निहित रहती है और स्पर्शमात्र से उद्बुद्ध हो जाती है । सामान्य पशुओं में भी आवेशात्मक स्थितियों में आश्चर्यजनक कार्य करने के अनेक प्रमाण मिलते हैं (यथा गाय का सिंह से लड़ जाना आदि) यह शक्ति भी आत्मबल का उदाहरण है । मानवों में यह शक्ति आत्मबल से पूर्णतः सम्बद्ध है जब कि पशुओं में क्षणिकावेश के कारण इन आवेश का सम्बन्ध स्पन्द तत्त्व से उतना नहीं है । स्पन्दतत्त्व के समावेश से अधिगत शक्तियाँ— (सर्वज्ञता आदि सिद्धियों की प्राप्ति) अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः । तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैवं भविष्यति ॥ ३९ ॥ इस (आत्म स्वभाव) से शरीर के व्याप्त होने पर उसमें सर्वज्ञता आदि धर्म अभिव्यक्त हो उठते हैं उसी प्रकार (देहाभिमान से मुक्त होकर) आत्मतत्त्व को ही अहं के रूप में अनुभव करने वाले योगी में सर्वव्यापक सर्वज्ञत्व आदि धर्म अभिव्यक्त हो उठते हैं ॥ ३९ ॥

  • सरोजिनी * प्रस्तुत कारिका में आत्मबल की महिमा पर प्रकाश डाला गया है । किसी विशिष्ट परिस्थिति में व्यक्ति कुछ असाधारण कार्यों को निष्पादित कर डालता है जिसे वह सामान्य स्थितियों में निष्पादित नहीं कर सकता । इसे 'आवेश' का अभिधान दिया जाता