स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ स्पन्दकारिका है। यह आवेशात्मक बल सामान्य व्यक्तियों में तो क्षणस्थायी होता है किन्तु योगियों में यह सार्वकालिक, सार्वत्रिक एवं सर्वावस्थानुगत होता है। यह उनमें अत्यन्त विलक्षण तीव्रता के साथ विद्यमान होता है और स्थायी होता है क्योंकि वे अपनी अहन्ता को आत्मा से तादात्म्यपूर्वक अनुभव करते हैं। अनेन = इससे। स्वस्वभावस्वरूप स्पन्दतत्त्व के द्वारा। अधिष्ठिते = अधिष्ठित होने पर। व्याप्त होने पर। यौगिक विभूतियों की प्राप्ति—उक्त कारिका में सर्वज्ञतादिक यौगिक विभूतियों की प्राप्ति का वर्णन किया गया है। योगशास्त्र में भी इन विभूतियों का वर्णन किया गया है तथा—'परिणामत्रय संयमादतीतानागतज्ञानम् ॥' (यो०सू०) (३।३) अर्थात् तीनों परिणामों में संयम कर लेने से अतीत, भूत एवं अनागत तीनों का ज्ञान हो जाता है। 'शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ (योगसूत्र ३।१७)। शब्द अर्थ और ज्ञान—इन तीनों का जो एक में दूसरे का अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण हो रहा है उसके विभाग में संयम करने से संपूर्ण प्राणियों की वाणी का ज्ञान हो जाता है। न केवल इस शरीर के सम्बन्ध में वह सर्वज्ञ हो जाता है प्रत्युत् उसे सर्वत्र सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है। योग मार्ग की विभूतियाँ—जिस प्रकार इस तत्त्व के द्वारा शरीर के व्याप्त होने पर सर्वज्ञता आदि गुण अपने को व्यक्त कर देते हैं उसी प्रकार जहाँ भी योगी अपनी अन्तरात्मा में स्थित होता है वे उपर्युक्त गुण अपने को व्यक्त कर देते हैं ॥ ७ ॥ स्वस्वभावात्मा स्पन्दतत्त्व से शरीर के व्याप्त (अधिष्ठित) हो जाने पर जैसे प्राणी के तदवस्थोचित अर्थानुभव करणादिरूप सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वादि धर्म उत्पन्न हो जाते हैं।¹ कूर्मासंकोच के समान सर्वोपसंहार द्वारा या महाविकास की युक्ति द्वारा या जब अपनी अनपायिनी चिद्रूप आत्मा में अधिष्ठान करता है तब उस अभिज्ञान के प्रत्यभिज्ञात हो जाने पर वहीं समावेश की स्थिति प्राप्त हो जाती है। तब साधक सर्वत्र अर्थात् शिव से लेकर क्षितिपर्यन्त शङ्करोचित सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व रूप गुणों से युक्त हो जाएगा ॥² जिस प्रकार सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण तथा तदवस्थो चित अर्थानुभव व्यक्ति के शरीर में तब प्रकट होते हैं जब कि वह शरीर अपने स्वरूप से अभिन्न स्पन्द तत्त्व से अधिष्ठित हो जाता है उसी प्रकार यह सशरीरी आत्मा (Embodied Self) चिद्रूप आत्मा में स्थित होने पर (चाहे वह कछुए के अंग-संकोच की भाँति अपनी समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओं को समेट कर या अपना पूर्ण विकास करके अभिज्ञानों से प्रत्यभिज्ञात समावेश की स्थिति या आत्मा पर प्रगाढ़ ध्यान करके एवं शिव से लेकर क्षिति पर्यन्त सर्वत्र सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों को शिव बनकर प्राप्त कर लेता है)।³ १-३. स्पन्दनिर्णय।