स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ स्पन्दकारिका नित्यम्' (कल्लट) है । निष्कर्ष—सुषुम्णा में 'हृदय' (स्वरूपभूत स्पन्द) की अनुभूति सुस्पष्ट होती है । १ 'देहिन' का अर्थ देहाभिमानी सांसारिक प्राणी नहीं है क्योंकि भट्टकल्लट ने अपनी 'वृत्ति' में कहा है कि वे 'योगी' हैं किन्तु वे योगी हैं जो सांसारिक प्रपंच (मायिक बन्धनों) में मग्न होकर बन्धनग्रस्त हो गए हैं किन्तु वे साधनारत भी हैं किन्तु उनका स्वस्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाया है—'अनभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य, योगिनो' जिस प्रकार आत्मस्वभावरूप स्रष्टा जाग्रत अवस्था में अपनी इच्छा से प्रेरित होकर हृद्देशस्थ अभिमत को स्वबल के आश्रय से सोम सूर्य (प्राणापान) एवं नेत्रों को उदित करके अवधानपूर्वक सम्पादित करता है उसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में स्थित रहकर हृदय में अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है क्योंकि आत्म संवित् इच्छा का अतिक्रम नहीं करता । मनुष्य के सामने असंख्य वस्तुओं के वर्तमान रहने पर भी मनुष्य जिसे देखना चाहता है उसी को देखता है क्योंकि उसी में स्वरूपानुप्रवेश हुआ करता है । पदार्थ कभी भी इच्छा का अतिक्रमण नहीं कर सकता । 'बुद्धि जो जो रसपूर्वक (सतृष्ण होकर) अभ्यर्थना करती है आत्म उसे उसके समक्ष प्रस्तुत कर देती है । मानव जिस-जिस इन्द्रियार्थ से अनुविद्ध होकर शयन करता है स्वप्नावस्था में उन्हीं उन्हीं पदार्थों को देखता है । स्पन्दतत्त्व का उदय होने पर जाग्रत अवस्था में ही निजभाव की प्राप्ति होने पर प्रमाता स्वतन्त्र हो जाता है । धाता = चित शक्ति ॥ हृदिस्थितान् = मन में कल्पित, इच्छित् । यथाभिलषित पदार्थ, यथा अनभिव्यक्तस्वस्वरूप वाले योगी को जाग्रदवस्था में जो-जो इच्छायें होती हैं (सामने सैकड़ों अन्य वस्तुओं के विद्यमान रहने पर भी) अपनी अभीष्ट वस्तु को ही देखता है अन्य को नहीं उसी प्रकार इस प्रसंग में भी समझना चाहिए ॥—(भट्टकल्लट) । जिस प्रकार 'धाता' (चिदात्मा = चित् शक्ति) इच्छात्मक अभ्यर्थना किये जाने पर सामान्य व्यक्तियों को भी उनकी आँखों के सामने उन पदार्थों का दर्शन करवाता है जिन्हें कि उन्हें हृदय में देखने की इच्छा होती है । उसी प्रकार योगियों को भी स्वप्नावस्था में उन अभीष्ट पदार्थों का साक्षात्कार करवाता है । वह धाता (चिदात्मा) ऐसे योगियों के मध्यधाम (सुषुम्ना मार्ग) में प्रतिक्षण स्फुटतर स्थिति में विद्यमान रहता है और उनके प्रणय का कभी भी अतिक्रमण नहीं करता । इसके विरुद्ध—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार अधिगत कर चुकने पर भी उस भाव पर निश्चलतापूर्वक अवस्थित नहीं रह पाता तो उसके लिए जाग्रत-स्वप्न दोनों अवस्थाओं में भावों की सर्जना उसी प्रकार स्वतन्त्रतापूर्वक चलती रहती है जिस प्रकार सामान्य प्राणियों की चलती रहती है । भावों की पूर्णस्वातन्त्र्यपूर्वक उत्तरोत्तर सृष्टि करते रहना स्पन्द शक्ति का अकाट्य स्वभाव है । १. ऐसा योगी जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में शाक्त स्पन्दना की अनुभूति करता रहता है तथा सृष्टि, संहार आदि के अधिकार प्राप्त करता है ।