स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३११ उस योगी को जिसके स्वस्वरूप की पूर्णाभिव्यक्ति नहीं हो पाई हो उसको अपनी जाग्रत अवस्था में (अपने समक्ष अनेक पदार्थों के विद्यमान रहने पर भी) अपनी इच्छा के अनुसार अपना अभिलषित विशिष्ट पदार्थ ही दृष्टिगत होता है अन्य (अपने समक्ष स्थित अन्य) पदार्थ नहीं। इसका कारण क्या है? कारण यह है कि ऐसे अवसरों पर धाता (चिदात्मा) उस योगी में सोम-सूर्य को उदित कर देता है अर्थात् उसकी ज्ञानेन्द्रियों में आकांक्षित ग्राह्य विषय के प्रति तीव्र एकाग्रता की शक्ति आविर्भूत कर देता है यथा नटों आदि के चमत्कारपूर्ण 'कार्यों में दिखाई पड़ती है ऐसी अद्भुत एकाग्रता (वृत्ति- निरोधात्मक एकाग्रदृष्टि) आविर्भूत हो जाती है। भाव यह है कि - जिस प्रकार प्रेक्षक अपने समक्ष स्थित अनेक वस्तुओं के विद्यमान रहने पर भी नटों के चमत्कार-प्रदर्शन-स्थल पर केवल चमत्कारों को ही देखता अन्य को नहीं। उसी प्रकार एक योगी नटों की भाँति चमत्कार प्रदर्शन करने वाली प्रकृति के द्वारा योगी के समक्ष अनेक आकर्षक, चमत्कार पूर्ण एवं मोहक पदार्थों को प्रस्तुत करने के बाद भी एक योगी सभी का त्याग करके केवल स्वाभीष्ट पदार्थों का ही प्रेक्षण, चुनाव एवं साक्षात्कार करता है। 'तथा स्वप्नेऽपि अभीष्टार्थानैव पश्यति, प्रणस्यानतिक्रामात् इच्छाभ्यर्थनाया अनति- क्रमात् । यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यं तदेतत् 'स्वप्नस्वातन्त्र्यम्' इत्युच्यते, अयमेव तमोवरणनिर्भेद इत्यर्थः' ।। ३४ ।। (भट्टकल्लट) १ प्रत्येक योगी अपनी स्वप्नावस्था में भी स्वाकांक्षित वस्तुओं को ही साक्षात्कृत करता है। चिदात्मा उसके 'प्रणय' (आभ्यन्तर आकांक्षास्वरूप अभ्यर्थना) को कभी नहीं टालती - इसीलिए ऐसा होता है। ऐसे योगी के सुषुम्णा वर्त्म में चिदात्मा, की स्फुटतर अनुभूति प्रतिक्षण विद्यमान रहती है। इसे ही 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' की संज्ञा दी गई है। प्रणय = आभ्यन्तर उत्कट आकांक्षा ।। स्फुटतरं = सुस्पष्टतर । मध्ये = मध्यमार्ग (सुषुम्ना मार्ग) में । स्फुटतरं = और अधिक स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त है। यह 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' कहलाता है । अन्य शब्दों में इसे 'तमोवरणनिर्भेद' कहते हैं-इस समय योगी के मानस पर तमावरण नहीं रहता। भट्टकल्लट ने इन तीन कारिकाओं में योगियों की श्रेणीत्रय की ओर भी संकेत किया है - का० (३३) में - जाग्रतो देहिनः का० (३४) में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितो? का० (३५) में - अन्यथा शब्दों का प्रयोग करके संभवतः 'असिद्ध' 'सिद्ध' एवं 'अनावधात' (प्रमादी) तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। इन तीन कारिकाओं में इन योगियों की पृथक् पृथक् संकल्प शक्ति का भी प्रस्तुतीकरण किया गया है। देहिनः का अर्थ है - 'अनभिव्यक्तस्वरूप योगी' (कल्लट) है। (ये 'अपरिपक्व' 'असिद्ध' योगी हैं। 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' की व्याख्या- 'यच्च तन्मध्ये हृदयं 'स्फुटतरम् अभिव्यक्त १. 'स्पन्दसर्वस्व'।