भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 416

तृतीयः निष्यन्दः ३१५ वैसे 'मध्य' का अर्थ सुषुम्णा भी होता है। अभ्यर्थना—यो यः कश्चित्, संसारी यमेवार्थं द्रष्टुमुत्प्रेक्ष्छो भवति, स तद्दिदृक्षा- वस्थायां झगित्युवश एवं परमात्मानं धातारमभेदेन आविशति, सा अवस्था अस्य प्रार्थना (रामकण्ठाचार्य) ॥ स्वप्न स्वातन्त्र्य—जो योगी मध्यमार्ग (सुषुम्णा) में 'हृदय' (स्पन्द तत्त्व = संवित् तत्त्व) की निरन्तर सुस्पष्ट अनुभूति प्राप्त करते रहते हैं उनकी इस अवस्था को 'स्वप्न- स्वातन्त्र्य' कहते हैं। योगी के हृदय पर से तमोगुण का आच्छादन दूर हो जाता है। इस 'स्वातन्त्र्य' के भी तीन प्रकार हैं—(१) 'जाग्रत स्वातन्त्र्य' (२) 'स्वप्न स्वातंत्र्य' और (३) 'सुषुप्ति स्वातन्त्र्य' : 'स्वप्नेन सौषुप्तमत्युपलक्षितम्' (स्प० नि०) । योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम— अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात् सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः । सततं लौकिकस्येव जाग्रत्स्वप्नपदद्वये ॥ ३५ ॥ नहीं तो (स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर लेने के अनन्तर अपने स्वरूप में अविचल रूप से स्थिर न रहा जा सका तो) ('उसके अर्थात् योगी की) जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सांसारिक प्राणियों की ही भाँति निरन्तर स्वतन्त्र रूप से भावों की सृष्टि चलती रहती है—क्योंकि स्वातन्त्र्यपूर्वक भावों की निरन्तर सर्जना करते रहना 'उसका' (स्पन्द शक्ति का अपना) धर्म है ॥ ३५ ॥

  • सरोजिनी * अन्यथा = स्वरूपस्थिति के अभाव में (भट्टकल्लट)—आत्मस्वरूप का साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर भी यदि योगी अपने निश्चल, नित्य, चिद्रूप आत्मस्वरूप में स्थिर न रह सके तो इस स्थिति के अभाव में । सृष्टि = आलविड़ालदर्शनरूपा सृष्टि (भट्टकल्लट), विचारों और दृश्यों का सर्जन कल्पनाओं की सृष्टि । सृष्टि स्वतन्त्रा स्यात् = (स्वरूप में निश्चल अवस्थान के अभाव में) योगी की जाग्रत्-स्वप्न दोनों अवस्थाओं में आलविड़ालदर्शनरूपा (असंगत) भावसृष्टि निरन्तर स्वतन्त्र रूप में चलती रहती है। 'सृष्टि' = जाग्रत् एवं स्वप्न की अवस्थाओं में मन के भावों की सर्जना, कल्पनाओं, भावनाओं एवं विचारों का असंगत प्रवाह (सृष्टि) । तद्धर्मकत्वतः = उसके उस प्रकार के धर्म वाला होने के कारण अर्थात् चूँकि स्पन्द शक्ति का यह अविचल धर्म या स्वभाव ही है इसलिए । लौकिकस्येव— सांसारिक प्राणियों की भाँति ही । जाग्रत्स्वप्नपदद्वये = जाग्रतावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों में 'धर्म' = सृष्टिस्वभाव, प्रसवधर्म (भट्टकल्लट) । सततं = निरन्तर । अन्यथा योगी एक सामान्य व्यक्ति के समान जाग्रत् एवं स्वप्नावस्थाओं में सदैव सृष्टि का विषय (Subject of creation) बना रहेगा क्योंकि सृष्टि स्वतन्त्र है क्योंकि वह