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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

तृतीयः निष्यन्दः ३१५ वैसे 'मध्य' का अर्थ सुषुम्णा भी होता है। अभ्यर्थना—यो यः कश्चित्, संसारी यमेवार्थं द्रष्टुमुत्प्रेक्ष्छो भवति, स तद्दिदृक्षा- वस्थायां झगित्युवश एवं परमात्मानं धातारमभेदेन आविशति, सा अवस्था अस्य प्रार्थना (रामकण्ठाचार्य) ॥ स्वप्न स्वातन्त्र्य—जो योगी मध्यमार्ग (सुषुम्णा) में 'हृदय' (स्पन्द तत्त्व = संवित् तत्त्व) की निरन्तर सुस्पष्ट अनुभूति प्राप्त करते रहते हैं उनकी इस अवस्था को 'स्वप्न- स्वातन्त्र्य' कहते हैं। योगी के हृदय पर से तमोगुण का आच्छादन दूर हो जाता है। इस 'स्वातन्त्र्य' के भी तीन प्रकार हैं—(१) 'जाग्रत स्वातन्त्र्य' (२) 'स्वप्न स्वातंत्र्य' और (३) 'सुषुप्ति स्वातन्त्र्य' : 'स्वप्नेन सौषुप्तमत्युपलक्षितम्' (स्प० नि०) । योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम— अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात् सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः । सततं लौकिकस्येव जाग्रत्स्वप्नपदद्वये ॥ ३५ ॥ नहीं तो (स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर लेने के अनन्तर अपने स्वरूप में अविचल रूप से स्थिर न रहा जा सका तो) ('उसके अर्थात् योगी की) जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सांसारिक प्राणियों की ही भाँति निरन्तर स्वतन्त्र रूप से भावों की सृष्टि चलती रहती है—क्योंकि स्वातन्त्र्यपूर्वक भावों की निरन्तर सर्जना करते रहना 'उसका' (स्पन्द शक्ति का अपना) धर्म है ॥ ३५ ॥

  • सरोजिनी * अन्यथा = स्वरूपस्थिति के अभाव में (भट्टकल्लट)—आत्मस्वरूप का साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर भी यदि योगी अपने निश्चल, नित्य, चिद्रूप आत्मस्वरूप में स्थिर न रह सके तो इस स्थिति के अभाव में । सृष्टि = आलविड़ालदर्शनरूपा सृष्टि (भट्टकल्लट), विचारों और दृश्यों का सर्जन कल्पनाओं की सृष्टि । सृष्टि स्वतन्त्रा स्यात् = (स्वरूप में निश्चल अवस्थान के अभाव में) योगी की जाग्रत्-स्वप्न दोनों अवस्थाओं में आलविड़ालदर्शनरूपा (असंगत) भावसृष्टि निरन्तर स्वतन्त्र रूप में चलती रहती है। 'सृष्टि' = जाग्रत् एवं स्वप्न की अवस्थाओं में मन के भावों की सर्जना, कल्पनाओं, भावनाओं एवं विचारों का असंगत प्रवाह (सृष्टि) । तद्धर्मकत्वतः = उसके उस प्रकार के धर्म वाला होने के कारण अर्थात् चूँकि स्पन्द शक्ति का यह अविचल धर्म या स्वभाव ही है इसलिए । लौकिकस्येव— सांसारिक प्राणियों की भाँति ही । जाग्रत्स्वप्नपदद्वये = जाग्रतावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों में 'धर्म' = सृष्टिस्वभाव, प्रसवधर्म (भट्टकल्लट) । सततं = निरन्तर । अन्यथा योगी एक सामान्य व्यक्ति के समान जाग्रत् एवं स्वप्नावस्थाओं में सदैव सृष्टि का विषय (Subject of creation) बना रहेगा क्योंकि सृष्टि स्वतन्त्र है क्योंकि वह

३१६ स्पन्दकारिका जाग्रत एवं स्वप्न में स्वातन्त्र के लक्षण से उपहित है । यदि पूर्वोक्त रीति से धाता सदैव आराधित नहीं हो पाता तो अपने आन्तर स्वरूप की अभिव्यक्ति का अभाव होने के कारण यह योगी जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सदैव एक अति सामान्य लौकिक व्यक्ति की भाँति ही होगा और परमात्मा की उस सृष्टि से अधिशासित रहेगा जो कि विश्व की सामान्य एवं विशिष्ट वस्तुओं के प्रकटीकरण एवं निश्चयीकरण के कार्य में निरत रहती है ।१ अर्थ यह है कि यह सृष्टि योगी को भी अति प्राकृत व्यक्ति की भाँति फेंक देगी— सांसारिक जीवन के गर्त में । भगवान् की सृष्टि स्वप्न-जागरादि पद के प्रकाशन से स्वातन्त्र्यस्वभावा है । इस प्रकार स्वप्न एवं स्वप्न-शून्य स्थिति के उन्मूलन की विवेचना एवं स्पष्टीकरण करने के उपरान्त ग्रन्थकार यह विवेचन करना चाहता है कि पूर्ण प्रबुद्ध व्यक्ति स्पन्द तत्त्व में समावेश पाता है । इसी साधन से ज्ञेय पदार्थों का ज्ञान भी होता है ।२ स्वरूप स्थिति न होने पर चित्त की चंचलता के कारण इच्छारूप स्वप्नादि सृष्टि स्वतन्त्र हो जाएगी । यहाँ स्वतन्त्र होने का अर्थ है—असमञ्जस-असंगत ही दिखाई पड़ना क्योंकि सृष्टि का स्वभाव ही ऐसा है । तत्त्व का स्वभाव ही है—इच्छाओं का प्रसार । जैसे पुरुष की इच्छायें जाग्रत एवं स्वप्न दोनों में ही स्वतन्त्र चलती रहती हैं—वे अज्ञानजन्य नहीं हैं—संविद् का स्वमत ही है और वे सहस्रों होती हैं—उनका स्वरूप है—सम्बद्ध एवं असम्बद्ध विकल्प, किन्तु ज्ञानी की स्वाधीन होती है और अज्ञानी की उच्छृंखला३ । प्राणी स्वप्न में भी अपने अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है अन्य को नहीं । ‘स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानिव पश्यति ॥' इस प्रकार के समाधि व्युत्थान मात्र से योगी एवं सांसारिक प्राणी एक समान दृष्टिगोचर होने लगते हैं । नित्ययुक्तता के दृढ़ीकरणार्थ कारिकाकार ‘अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात्' वाली कारिका कह रहा है । अन्यथा तु = उक्त प्रकार के विपरीत अन्य प्रकार से । सर्वकर्ता, स्वतन्त्र एवं अद्वैत परमेश्वर की—ममैवेदं जगत्कार्यम्—(‘यह समस्त जगत् मेरा ही कार्य है') इस प्रकार की प्रतिपत्ति के अभाव के कारण योगी के 'जागृति एवं स्वप्न पद' दोनों तद्धर्मक होने के कारण, सर्वगुणात्मकता के कारण, नानाभावविनिर्मिति रूपा सृष्टि हुआ करती है । आत्मसंवित् से आविर्भूत होने के कारण स्वातन्त्र्यशक्ति या तदुत्पन्न नियति (सृष्टि) स्वतन्त्र हैं । जब तक कि साधक अपने को स्वतन्त्रकर्ता, सर्वप्रभु, विभु एवं आत्मस्वरूप मानकर सृष्टि को अपनी शक्ति समझकर उसका परामर्शन नहीं करता तब तक यह इस प्रकार अपरामृश्यमाना होने के कारण विचित्र विभ्र उत्पन्न करने में समर्थ रहती है तथा दुर्निवार रूप में उस सामर्थ्य का विस्तार करती रहती है । लौकिकस्येवं—सांसारिक प्राणियों की भाँति । सारांश यह है कि—जागरावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों सर्गस्वभावा हैं । वहाँ ज्ञानज्ञेयभाव से पारमेश्वरी शक्ति की ही स्थिति प्रतिपादित की गई है । उस इस द्वयात्मक १-२. स्पन्दनिर्णय । ३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

तृतीयः निष्यन्दः ३१७ पदद्वय में जो योगी यथोक्त संवित्ति में समाधान (एकाग्रता, ब्रह्म में मन को लगाना) के अपरित्याग से जो उत्थित हुआ हो उस सर्वथा स्वतन्त्र, सर्वकर्ता स्वात्मा में सुव्यवस्थित योगी के लिए सृष्टिस्वभाव रूप पदद्वय (जागृति-स्वप्न) शक्ति को प्रतिबंधित नहीं करता जो व्यक्ति इससे विपरीत अर्थात् 'अन्यथा' जीवन बिताता है तब सांसारिक प्राणियों की भाँति आत्मगत भावसृष्टि के द्वारा परवश बन जाते हैं- 'लोकवन्निजयेव भावसृष्ट्या पर वशीक्रियते ।।' इसीलिए कहा गया है- 'अन्यथा स्वरूपस्थित्यभावे' ।१ भट्टकल्लट स्पन्दकारिकावृत्ति में इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- 'अन्यथा तु स्वरूपस्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलम्बिडालदर्शनरूपा सृष्टिः, यस्मात् तत्तत्त्व सृष्टिस्वभावं प्रसवधर्मत्वात् यथा सततं सर्वस्य लोकस्य जाग्रद्वृत्तौ स्वप्नावस्थायां च सम्बन्धा सम्बन्धविकल्पाः ।।'२ स्वबल का महत्व- यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि । भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥ ३६ ॥ यथा यत् परमार्थेन येन यत्र सदा स्थितम् । तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् सम्प्रवर्तते ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कोई दूर देश-स्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने पर भी, प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता है, किन्तु आत्मबल का प्रयोग करके देखने पर उसको वही पदार्थ सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगत होने लगता है । उसी प्रकार योगी के लिए स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की स्थिति में, स्वल्प समयावधि में ही समस्त पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में विद्यमान हों, ठीक उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥

  • सरोजिनी * अर्थोऽस्फुटो = दूरस्थित अस्पष्ट कोई पदार्थ, स्वबलोद्योग = प्रयत्नविशेष । बलमाक्रम्य = स्वबलं स्वस्वरूप का आश्रय लेकर । अचिरेण = बिना बिलम्ब के सामान्य व्यक्ति एवं योगी की तुलना की गई है । जिस प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी पदार्थ को प्रथम दृष्ट्या देखता है तो उसे वह अस्पष्ट दिखाई पड़ता है किन्तु विशेष प्रयत्न करने पर वह उसे सुस्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है । उसी प्रकार यदि योगी भी आत्मबल का प्रयोग करता है तो उसे स्वल्प काल में ही उन पदार्थों का ज्ञान हो जाता है । आक्रम्य = अपनी आत्मा में विलय कर लेने पर । यत्र = जहाँ शङ्करात्मा स्वस्वभाव में । आक्रम्य = पकड़कर । यथा = जिस प्रकार । अभेद व्याप्ति के द्वारा । १. रामकण्ठाचार्य- 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट- 'स्पन्दसर्वस्व' ।

३१८ स्पन्दकारिका स्वबलोद्योगेन = अन्तर्मुखतदेकात्मता परिशीलन प्रयत्न द्वारा । प्रवर्तते = अभिव्यक्त होता है । अचिरात् = शीघ्र ही । हि = निश्चय ही । परमार्थेन = आनन्दघनरूप से । जिस प्रकार वही वस्तु पूर्ण एकाग्रता पूर्वक मनन किये जाने पर भी इसके पूर्व अस्पष्ट रूप में समझ में आती थी—अपनी निजी शक्ति के बल से देखी जाने पर सुस्पष्टतया दृष्टिगोचर होने लगती है । इसी प्रकार प्राणशक्ति पर अधिकार कर लेने पर उस वस्तु की वस्तुता उसी सत्ता के द्वारा, उसी स्थान में जिसमें कि वह रहती है— तत्काल अभिव्यक्त हो जाती है । वस्तु के वस्तुत्व का सम्यक् यथार्थ ज्ञान कैसे हो? इसी के उत्तर में ग्रन्थकार कहता है—‘यथा ह्यर्थोऽस्फुटो .... सम्प्रवर्तते ।' यथा दूरत्वादि दोषों के कारण अस्फुट (अस्पष्ट) रूप में दिखाई पड़ने वाली वस्तु पुनः अध्यक्ष निरीक्षण द्वारा स्वबलोद्योग से भावित पूर्णावलोकित होने पर स्फुटतर (सुस्पष्ट) दृष्टिगोचर होती है वह स्पन्दततत्त्वात्मक बल है जिसके द्वारा आनन्दघन शङ्क- रात्मा स्वस्वभाव में, व्याप्त होकर परिशीलन प्रयत्न द्वारा स्फुटतापूर्वक अभिव्यक्त होता है । मानसिक अवधान के बाद भी कोई वस्तु दूर होने के कारण अस्पष्ट दिखाई पड़ती है किन्तु अपनी दर्शन-शक्ति से सूक्ष्मतापूर्वक देखी जाने पर वही वस्तु सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगत होने लगती है । इसी प्रकार वह स्पन्द तत्त्व की प्राणशक्ति (Vital power) स्पन्दतत्त्वात्मक बल जो कि अपने निजी स्वरूप के साथ अभिन्न रूप से स्थित है आनन्दघन शङ्कर के साथ अद्वैतभाव से स्थित है—ज्यादा सुस्पष्ट रूप में व्यक्त होता है । किन्तु यह तभी होता है जबकि ध्यानावस्था में परमसत्य के साथ ऐकात्म्य प्राप्त कर लिया जाय । कृत्रिम ज्ञातृत्व की भूमि का विलय कर लेने पर योगी जो भी चाहता है वह पदार्थ तत्काल उपस्थित हो जाता है । आक्रम्य = आराधक द्वारा अपनी कल्पित देहादिक प्रमातृभूमि को अपने में निमग्न या लीन करके । 'स्पन्दात्मकं बलं आक्रम्य' । स्पन्दात्मक बल को अर्जित कर लेने पर योगी के समस्त जिज्ञास्य समक्ष प्रकट होते हैं । कर्तृत्व शक्ति केवल इस स्पन्दात्मक बल के माध्यम से ही अपने को व्यक्त करती है । आत्मा की विभूतियों में स्वातन्त्र्य की युक्ति का निरूपण करके अब ज्ञातृत्व और कर्तृत्व-सामर्थ्य की युक्ति बतलाते हैं । उनसे सूक्ष्म और व्यवहित आदि में ज्ञातृत्व की युक्ति कारिका ३६-३७ में बताई गई है । जैसे दूरस्थित घट पट आदि कोई पदार्थ अस्पष्ट, संदिग्ध दृष्टिगत होता है किन्तु चित्त को सावधान करके दूसरी ओर से हटाकर अपने प्रयत्न विशेष से विचार करने पर जिस समय दिखाई पड़ती है—विशेष प्रयास के अनन्तर दृष्टिगोचर होती है—विकसित

तृतीयः निष्यन्दः ३१९ संवित् से देखने पर वही सम्यक् रूप से स्पष्ट, असंदिग्ध एवं अपने निश्चित रूप में दृष्टिगत होने लगती है क्योंकि स्वरूप में कोई आवरण नहीं रहता। आत्मबल के संस्पर्श से पुरुष सामने वाले पदार्थ के सदृश ही हो जाता है। अतः यथार्थ ज्ञान होता है। इसी से मिलता जुलता अद्वैत वेदान्तियों का अन्तःकरणावच्छिन्न प्रमाता का विषयावच्छिन्न चैतन्य से एक होने पर यथार्थ ज्ञान होता है और उसमें बल का स्पर्श नहीं है। 'तत्त्वयुक्ति' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—जो विषयाधिपति है, वह जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है उसको तत्त्वतः अर्थात् आत्मसंवित् के रूप में जान लेने पर चराचर का ज्ञान हो जाता है— (१) अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥१ (२) विषयाधिपतियों हि येन जानाति पार्वति । तस्य यो वेत्ति तत्त्वेन तेन ज्ञातं चराचरम् ॥२ यथा हि = जिस प्रकार निश्चय ही। कोई ॥ सावधाने = पूर्ण अवधान रखने पर। तदर्थ—दिदृक्षा हेतु निविड प्रयत्न करने के बाद भी। चेतसि = चित्त के। अस्फुट = अस्पष्ट ॥ भाति = (प्रथते) = दृष्टिगत होता है, प्रतीत होता है। भूयो = फिर (इसके अनन्तर) ॥ स्वबलोद्योगभावितः = अपनी सामर्थ्य एवं पुरुषार्थ से युक्त। अपनी सर्वज्ञ आत्मा का बल या सामर्थ्य। शक्ति = तत्त्व आदि लक्षणा वाली शक्ति ॥ उस शक्ति के द्वारा उद्योग = उद्यमो ॥ उद्योग = निविड- तरावधान से दर्शनोत्साहित। भावित = लक्षित ॥ स्फुटतरो भाति = प्रत्यभिज्ञायमान निरवशेष विशेष। सोऽयम्—यह तथ्य स्पष्टता से परिज्ञात हो जाता है। भावार्थ—जिस किसी भी व्यक्ति को अपना दर्शनीय अभीष्ट तत्काल स्पष्टतः नहीं दृष्टिगत होता, विस्फारित नेत्र होकर देखने पर भी सम्यक् रूप से दृष्टिगत नहीं हो पाता किन्तु क्षणान्तर में ही उसी स्थान में स्थित वही पदार्थ उसको सूक्ष्मतापूर्वक अनन्य दृष्टिपूर्वक 'न्यक्षनिक्षिप्ताक्ष' होकर देखने पर स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने लगता है—इसका कारण क्या है? इसका कारण यह है कि यद्यपि यह सत्य है कि बाद में भी उसे देखने के लिए द्रष्टव्य से अतिरिक्त किसी अन्य साधन का आहरण एवं उपयोग नहीं किया जाता किन्तु, प्रत्युत् होता यह है कि—साधक के अंतर में तात्विक स्वभावानुप्रेवेश का आविर्भाव हो जाता है जिसके बल के स्पर्श से उस दिदृक्षु व्यक्ति को वह पदार्थ याथात्म्यरूप से प्रकाशित हो उठता है—अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि—स्वबलोद्योग मात्र ही सभी १. स्पन्दनिर्णय—आचार्य क्षेमराज । २. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

३२० स्पन्दकारिका प्राणियों के सर्वार्थप्रकाशन का साधन है अन्य कोई भी नहीं—'तेन तात्त्विक स्वभावानु- प्रवेश एवं तस्य सञ्जायते, यद्बलस्पर्शात् तस्य सोऽर्थो याथात्म्येन प्रथते' ततः स्वबलो- द्योगमात्रं सर्वार्थप्रकाशनसाधनं सर्वदेहिनां नान्यत्किंचित् ।'१ इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि पदार्थों को प्रकाशित कर सकने की (स्फुटतः देखने, समझने आदि की) शक्ति तो सभी व्यक्तियों में समान होती है किन्तु प्रबुद्ध योगियों के द्वारा प्रत्यवमृश्यमान होने पर ही किसी पदार्थ का सत्त्व (तात्त्विक स्वरूप) प्रकाशित होता है अन्य के द्वारा नहीं । मायातिमिरतिरस्कृत सम्यक् ज्ञानहीन व्यक्तियों को यह ज्ञान नहीं हो पाता । अतः योगी को ही यह ज्ञात हो पाता है—स्मरण हो पाता है कि इस वस्तु का यथार्थ स्वरूप यह है अन्य को नहीं । जिस प्रकार कि अस्फुटरूप से दृष्ट अर्थ स्वबल प्राप्त करके स्फुटतया देखा जा सकता है उसी प्रकार 'बल' (स्वस्वभाव सामर्थ्य) को प्राप्त करके दिदृक्षु व्यक्ति के = उसमें अभिन्नतया अधिष्ठित होने पर वे पदार्थ उन-उन अवस्थाओं—आकारों-देश-काल आदि स्थितियों में, असंवादी प्रकार से संप्रवर्तित होते हैं—सम्यक् रूप से अभिव्यक्त होते हैं और सम्यक् रूप से ज्ञेय बनकर अभिमुखीभूत होते हैं— 'सम्यक् ज्ञेयतया अभिमुखीभवति ॥' यह वस्तु है क्या? परमार्थेन = तत्त्वतः ।। यत् = जो । गवादि । यथा = जिस प्रकार, 'येन अवस्थात्मना प्रकारेण' येन = जिसके द्वारा यादृशविशिष्टसारभादिमान आकार द्वारा । यत्र = जहाँ । जिस व्यवहित एवं विप्रकृष्ट देश में, काल में । भावार्थ—किसी पदार्थ के अस्फुट रूप से दिखाई पड़ने पर उसके स्फुटतर अवभास के लिए जो सर्वज्ञस्वस्वभावाभेद बिना किसी प्रयत्न के सब में आविर्भूत हो जाता है, प्रबुद्ध उसके परामर्शाभ्यास द्वारा देशकालादिव्यवहित यथाभिमत अर्थों को तात्त्विक दृष्टि से जान लेता है । सर्वज्ञता आदि गुणों की अभिव्यक्ति का कारण यही है । कहा भी गया है— 'परिमितविषयमतीतानागतज्ञानं न । किंचिदाश्चर्यं विनावरण स्वस्वभावत्वात् ॥' उस दशा में देशकाल आदि अनिरुद्ध, एवं स्वस्वभावबल अभिव्यक्त होता है । यहाँ 'अस्फुटोऽर्थो दृष्टः' वाक्य उपलक्षणात्मक है अतः यह श्रुति आदि में भी योजनीय है । अतः इसका अर्थ यह हुआ कि इस प्रयुक्त वाक्य के द्वारा—दृश्य आदि पदार्थ को स्पष्टतर रूप से देखने आदि कार्यों के लिए प्रयत्नविशेषावस्था में संपद्यमान, प्रतिष्ठित स्पन्दानु प्रवेश के द्वारा, समस्त बुद्धि-नेत्र के व्यापार वाले जाग्रत अवस्था वाले पर- तत्त्वोपलब्धि ही यहाँ प्रतिपादित एवं वेदितव्य है । इसे कारिकाकर ने दो श्लोकों द्वारा व्यक्त किया—जो निम्न हैं— १. 'स्पन्दविवृति' (रामकण्ठाचार्य)

तृतीयः निष्यन्दः ३२१ (१) 'यथा किल दूरस्थित' (२) 'यथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण' ।१ आत्मबल का स्पर्श = 'स्वबलोद्योग'— 'सामान्य स्पन्द' ज्ञान का अनन्त रत्नाकर है। उसके संस्पर्श मात्र से चित्त के साथ समस्त ज्ञानेन्द्रियों में भी वह बिलक्षण सामर्थ्य आयत्त हो जाती है जिससे कि वे अस्पष्ट विषयों को भी सुस्पष्ट रूप में एवं उनके अपने गुह्य स्वस्वरूप में देख लेते हैं। 'स्पन्द शक्ति' की इस आकस्मिक गतिमयता को जो कि शम्पावत अकस्मात आती है— 'आत्मबल का स्पर्श' कहलाती है। स्पन्द शक्ति की यह गतिमयता प्रत्येक काल में, प्रत्येक क्षण आन्तरिक रूप से प्रवाहित होती रहती है किन्तु प्राणियों को इस रहस्य का बोध नहीं रहता। योगियों को इसका बोध रहता है। वे इस मध्यवर्ती स्पन्द स्पर्श (आत्म बल) को ग्रहण कर लेते हैं। अतः उनकी संकल्पशक्ति में तीव्रता की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। परिणाम यह होता है कि योगी एकाग्रता की स्वल्प मात्रा में भी भूत, भविष्य एवं सुदूरस्थ पदार्थों, दृश्यों एवं अवस्थाओं को यथास्वरूप यथाकांक्ष स्वल्पावधि में जान लेते हैं या देख लेते हैं। वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं— जिस प्रकार चित्त के सावधान रहने पर भी, किसी भी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ प्रथम दृष्टि में स्पष्टतः दृष्टिगत नहीं होती किन्तु तत्क्षण ही आत्मबल का प्रयोग करके उसको देखने पर वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है उसी प्रकार योगी को भी स्पन्दस्वरूप आत्मबल पर अवस्थित होने की अवस्था में स्वल्पकाल में ही वे समस्त पदार्थ, चाहे वे जिस समय, जिस देश एवं जिस आकार-प्रकार में भी स्थित हों ठीक उसी अवस्था में ज्ञान के विषय बन जाते हैं ।। भट्टकल्लट कहते हैं कि जिस प्रकार किसी भी व्यक्ति को कोई भी दूरस्थित पदार्थ चित्त के एकाग्र न रहने पर प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता किन्तु 'तत्क्षण ही आत्मबल या प्रयत्न विशेष के द्वारा वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दृष्टिगत होने लगता है। ठीक उसी प्रकार स्पन्दात्मक भूमिका पर अवस्थित योगी को उसी प्रकार का विशेष प्रयत्न करने पर स्वल्पावधि में ही उन समस्त पदार्थों का उसी प्रकार साक्षात्कार होने लगता है जिस रूप, जिस स्थान, जिस आकार एवं जिस स्थान में वे विद्यमान हों। इसका कारण क्या है? कारण यह है कि उस योगी के स्वरूप पर से तामसिक आवरण हट चुका है फलतः योगियों के लिए भूत-भविष्य (अतीतानागत) पदार्थों का यथार्थ रूप में बोध होना स्वाभाविक है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। भट्टकल्लट अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं— (१) 'यथा किल दूरस्थितः कश्चिदर्थः पुरुषेण पूर्वं सावधानेनापि न लक्ष्यते स एव स्फुटतरो भवति, प्रयत्नविशेषेण निरूप्यमाणस्तत्रैव स्थितस्य' ।।३६।।—'स्पन्दसर्वस्व' ।।२ १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' २. भट्टकल्लट स्पं० २१

३२२ स्पन्दकारिका (२) 'तथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण यत् वस्तु येन रूपेण यदा यस्मिन् काले, यत्र देशे, यथा, येनाकारेण संस्थितं, तद् वस्तु तथा तद्बलं स्वस्वरूपमाश्रि- तस्याचिरेणैव कालेन प्रतिभाति निरावरणस्वरूपत्वात् तेनातीतागतं ज्ञानं परि- मितविषयं न किञ्चिदाश्चर्यम्' ।। ३७ ।।¹ शैव दर्शन के अनुसार— (१) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अत्यन्त अस्पृष्ट, अदृष्ट, अश्रुत एवं अज्ञात दूरस्थ वस्तुओं को देख न पाने पर दिदृक्षा की तीव्रोत्कण्ठा होने पर दिदृक्षु प्रमाता की बहिर्मुखी प्रवाहित स्पन्द धारा अकस्मात अन्तर्मुखी होकर अपने मूल केन्द्र (सामान्य स्पन्द प्रवाह) में लय हो जाती है और इसी कारण एकाग्रता की तीव्रता उपबृंहित हो जाने के कारण वह वस्तु अत्यन्त दूरस्थ होने पर भी अत्यन्त सुस्पष्टता के साथ दृष्टिगत होने लगती है। (२) स्पन्दशक्ति की गतिशीलता आन्तरिक रूप में सदैव चलती रहती है किन्तु प्राणी इसे जानते नहीं। इस गुप्त रहस्य को गुरु की अनुकम्पा से शिष्य जान लेता है। योगी तीव्र विमर्शात्मक गवेषणा एवं विशिष्ट गम्भीर प्रयत्नों के द्वारा अन्तरालानुगत संवित् संस्पर्शों को पकड़कर उन पर स्थिर रह सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। इन योगियों की सङ्कल्प शक्ति इतनी तीव्र होती है कि स्वल्प संवेदनात्मक एकाग्रता आने पर भी उसके द्वारा वह भूत एवं भविष्य तथा दूर से दूर वर्तमान वस्तुओं को प्रत्यक्षीकृत कर लेता है। स्पन्दात्मक आत्मबल की शक्ति— दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । आच्छादयेद् बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥ ३८ ॥ जिस प्रकार निर्बलशरीरी व्यक्ति भी आत्मबल को प्राप्त करके (कठिनतम कार्यों को भी) निष्पादित कर डालता है और अत्यन्त क्षुधातुर रहने पर भी अपनी क्षुधा को निवृत्त कर लेता है (उसी प्रकार एक सिद्ध योगी भी अत्यधिक दुर्बल रहने पर भी स्पन्दात्मक आत्मबल प्राप्त करके दुष्कर से दुष्कर कार्य को भी निष्पादित कर डालता है और अत्यधिक क्षुधातुर होने पर भी यथाकांक्ष अवधिपर्यन्त अपनी क्षुधा को नियन्त्रण में रख लेता है ।) ॥ ३८ ॥

  • सरोजिनी * सामान्य व्यक्ति की शक्ति 'उद्योग बल' है और योगी की शक्ति 'स्पन्दात्मक आत्मबल' है। विशेष परिस्थितियों में जो विलक्षण या असाधारण कार्य अकस्मात् निष्पादित हो जाते हैं उन्हें 'आवेश' या 'भावावेश' भी कहा जाता है किन्तु यह भावावेश है क्या? आत्मबल का संस्पर्श मात्र ही तो यह है। दुर्बल व्यक्ति भी उस शक्ति को प्राप्त करके किसी कार्य में प्रवृत्त हो जाता है एवं बुभुक्षित व्यक्ति भी उस बल (संयम बल) से अपनी बुभुक्षा का शमन कर लेता है।² १. भट्टकल्लट । २. स्पन्दनिर्णय ।

तृतीयः निष्यन्दः ३२३ इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि बल ही सर्वोपरि है और यह बल आत्मसापेक्ष बल है जिस प्रकार एक दुर्बल व्यक्ति जिसकी जीवनीशक्ति क्षीण हो गयी है-अपने को, किसी कार्य को पूर्ण करने में, संलग्न रखता है या अपने ऊपर सौंपे अपरिहार्य कार्य को अपनी स्पन्दात्मकशक्ति के द्वारा संपादित करता है । वह व्यक्ति उस जीवन शक्ति (Vitality) के द्वारा कठिनतम एवं दुःसाध्य कार्य को भी पूर्ण कर लेता है । उसी प्रकार अति बुभुक्षित व्यक्ति उसी प्रेरणा द्वारा अपनी भूख को शान्त कर सकता है । ताप शीत की पराधीनता उस व्यक्ति के लिए नहीं होती जो चेतना के स्तर पर आरूढ़ हो चुका है क्योंकि यह ताप एवं शीत की पराधीनता केवल चेतनारूढ़ व्यक्ति के स्तर पर ही प्रभावकारी होती है किन्तु वह चेतना में लय हो जाती है ।१ ज्ञानशक्ति का निरूपण करके ग्रन्थकार अड़तीसवीं कारिका में कार्य-कर्तृत्व की सामर्थ्य का वर्णन करता है— जो पुरुष क्षीणधातु, अशक्त, कृश एवं दुर्बल भी हो गया है वह भी अपने उत्साहात्मक बल, एवं उद्योग को स्वीकार करके अपने कार्य में प्रवृत्त होता है और उसे सम्पन्न करता है । निर्बल व्यक्ति भी उद्योग-बल का आलम्बन लेकर युद्धभूमि में अपने अपूर्व शौर्य का परिचय देता है । असमर्थ व्यक्ति भी व्यायामाभ्यास से महती शक्ति प्राप्त कर लेता है । यह उद्योग-बल आत्मसंवित् का ही बल है । बुभुक्षित व्यक्ति अपने स्वभाव का अनुशीलन करके भूख को शान्त कर लेता है । पतञ्जलि ने कण्ठकूप में संयम करने से भूख-प्यास मिट जाने का उपाय बताया है । संयम के बल पर मनुष्य हाथी सरीखा बल प्राप्त कर सकता है इसका अभिप्राय यह है कि आत्मबल की अभिव्यक्ति होने पर शोक, मोह, जरा एवं मृत्यु आदि षड्मियों का नाश हो जाता है ।२ दुर्बलोऽपि = शक्तिहीन व्यक्ति भी । यतः = जिस कारण से । बल = सर्वकर्तृत्व-स्वातन्त्र्यलक्षण वाला सामर्थ्य । आक्रम्य = पूर्वोक्त युक्ति के द्वारा अव्यतिरेकपूर्वक स्थित होकर । कार्ये = भारोद्वहन आदि कार्यों में । प्रवर्तते = क्रिया प्रधान हो जाता है ।३ आक्रम = आक्रमण । कब्जा करना । प्राप्त करना । घेरना । पकड़ लेना । आक्रान्ति = कब्जा करना । आरोहण । पराभूत करना, सामर्थ्य, शक्ति । तात्पर्य यह है कि जो परिकृशकाय होने के कारण शक्ति-क्षीण एवं सामर्थ्यहीन हैं वे भी संध्यादिक व्यापार में प्रवृत्त होकर, अभ्यास के बल से अन्य विषयों में अत्यधिक अशक्य कार्यों को भी स्वात्मबल से कर डालते हैं यथा व्यायाम आदि कार्य । यह बल या सामर्थ्य स्वस्वभाव बल की प्राप्ति से ही आता है । इसके अतिरिक्त अन्य किसी निमित्त से यह बल प्राप्त नहीं होता । सर्वकर्तृत्वलक्षण वाले आत्मतत्त्व के बल की १. स्पन्दनिर्णय । २. उत्पलदेव - 'स्पन्दप्रदीपिका' । ३. रामकण्ठाचार्य - 'स्पन्दविवृति' ।

३२४ स्पन्दकारिका आवश्यकता होती है। मायीय कर्ता माया के द्वारा शक्ति के प्रतिबद्ध हो जाने के कारण इस बल की प्राप्ति का उपाय किसी अन्य नियत कारणान्तर को मानता है और उस नियत कारणान्तर से नियत कार्य ही संपादित हो पाने को मानता है। किन्तु यदि वह यह सोच ले कि 'इस कार्य को मैं भी कर सकता हूँ' और पूर्ण सोत्साह होकर उस बल का अवलम्बन लेकर उस कार्य को करना चाहे तो उस कार्य को संपादित कर सकता है। किन्तु यह युक्ति प्राप्त करना केवल योगियों के लिए ही संभव हो पाता है— 'इति युक्तियोगिन एव प्रतिपत्तिगोचरीभवति ।' यह उन्हें ही दृष्टान्तीकृत करके इस दार्ष्टान्तिक वाक्य को उपदिष्ट किया गया अर्थात् दुर्बल व्यक्ति भी सबल की भाँति संपाद्यकार्य को संपादित करने में समर्थ होता है और यह कार्य स्वस्वभावबल के आक्रमण (संप्राप्ति) द्वारा ही निष्पन्न होता है। तथा—उसी प्रकार समस्त कार्यों को संपादित करने में स्वतन्त्र स्वबल को प्राप्त करके और उसे स्वशक्ति द्वारा अधिष्ठित करके। योऽतिबुभुक्षितः—अत्यन्त भोजने- च्छाविष्ट व्यक्ति। उस बुभुक्षा को आच्छादयेत्—स्थगित कर दे। स्थगित कर देना चाहिए। स्वस्वरूपप्रथन के द्वारा अन्नादिक अभ्यवहार (भोजन करने की क्रिया) रूप कारण द्वारा क्षुधा-निवृत्ति रूप कार्य निष्पादित होता है। व्यक्ति को नित्य तृप्त होना चाहिए। प्रतिबन्ध-विदलन द्वारा व्यक्ति को असामर्थ्य का तिरोभाव करना चाहिए। १ शाक्तबल (स्पन्दात्मिका शक्ति) के द्वारा सर्वकर्तृत्व की प्राप्ति— स्पन्दात्मक आत्मबल एवं सर्वज्ञता तथा सर्वकर्तृत्व—जिस प्रकार दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी आवेशावस्था में अशक्य कार्य को भी, अलक्ष्य आत्मबल की सहायता से निष्पादित कर लेता है और अत्यन्त क्षुधार्त होने पर भी अपनी बुभुक्षा को शमित कर लेता है उसी प्रकार सिद्धयोगी शरीर के अत्यन्त निर्बल होने पर भी स्पन्दात्मक आत्मबल पर अवस्थित होकर बड़े से बड़े दुष्कर कार्य भी निष्पादित कर लेता है। भट्टकल्लट—जिस प्रकार कोई अशक्तव्यक्ति अपने उद्योग बल का आश्रय ग्रहण करके व्यायामादिक बल से महती शक्ति प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार योगी क्षीण धातु होने पर भी अपने अदम्य उत्साह बल से आत्मबल प्राप्त करके कठिन कार्यों को निष्पादित करने हेतु उन्मुख हो जाता है। इसके अतिरिक्त वह इसी स्वभाव का संतता- नुशीलन करने से अत्यधिक क्षुधार्त होने पर भी अपनी क्षुधा को अपने वश में कर लेता है। इसका कारण क्या है ? कारण है— 'सर्वत्रैवात्मस्य रूपस्य कार्यकारण संपादन सामर्थ्यमविलम्बनम् ।। अर्थात् स्वरूप में सर्वत्र कार्यों एवं उनके कारणों को सत्ता प्रदान करने की शक्ति है। भट्टकल्लट कहते हैं— 'क्षीणधातुरपि तद्बलमुत्साहलक्षणमाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते, यथा च कश्चिद् अशक्तोऽपि व्यायामाभ्यासेन महती शक्ति प्राप्नोति उद्योग बलेन, तथानेन स्वभावानुशीलनेन बुभुक्षामपि आच्छादयति योऽतिबुभुक्षितः स्यात् यतः सर्वत्रैवा- त्मस्य रूपस्य कार्यकारणसंपादनसामर्थ्यमविलम्बितम् ॥ ३८ ॥ १. रामकण्ठाचार्य— 'स्पन्दविवृति'

तृतीयः निष्यन्दः ३२५ जिस किसी भी सामान्य शरीर में संवेदक स्पन्दतत्त्व स्थित हो उसमें उसके अनुकूल देश, काल एवं आकार में सर्वज्ञता आदि धर्म अभिव्यक्त होते हैं वहाँ देहा- भिमान से मुक्त होकर उस आत्मतत्त्व को ही अहं रूप में अनुभव करने वाले योगी में सर्वव्यापक, सार्वदेशिक सर्वज्ञता आदि धर्म अवश्य व्यक्त हो जाते हैं ॥ ३९ ॥ भट्टकल्लट कहते हैं—'अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादो यस्मात्, तत्र स्वल्पयूकाभक्षणमपि क्षिप्रमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्व- ज्ञता भविष्यति ॥ ३९ ॥ आवेश और शाक्त बल—किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में, किन्हीं भयास्पद स्थितियों में एवं एकाग्रता की प्रगाढ़ता में या तीव्रावेश में व्यक्ति ऐसे कार्य कर डालता है जो कि सामान्यतः कभी कर ही नहीं सकता । 'आवेश' भी आत्मबल (स्पन्द शक्ति या संवित् शक्ति) की शक्ति है । मन में उदित होने वाली अनन्त इच्छाओं, चिन्ताओं एवं क्षोभों के अन्तराल में स्थित नित्योदित उन्मेषतत्त्व, एकाग्र मनोभाव के क्षणों में, प्रत्येक व्यक्ति अनुभव करता है । आवेश अकस्मात् प्रकट होने वाली वह अत्यन्त प्रबल एवं अदम्य वृत्ति या चिकीर्षा शक्ति है जिसके द्वारा शरीर में शाक्त शक्ति अलक्ष्य रूप में प्रवाहित होने लगती है । यह प्रत्येक प्राणी में विद्यमान आत्मशक्ति का अस्थायी संस्पर्श है । यह आवेशात्मक शाक्त प्रेरणा कहीं बाहर से नहीं आती प्रत्युत् हृदय में ही निहित रहती है और स्पर्शमात्र से उद्बुद्ध हो जाती है । सामान्य पशुओं में भी आवेशात्मक स्थितियों में आश्चर्यजनक कार्य करने के अनेक प्रमाण मिलते हैं (यथा गाय का सिंह से लड़ जाना आदि) यह शक्ति भी आत्मबल का उदाहरण है । मानवों में यह शक्ति आत्मबल से पूर्णतः सम्बद्ध है जब कि पशुओं में क्षणिकावेश के कारण इन आवेश का सम्बन्ध स्पन्द तत्त्व से उतना नहीं है । स्पन्दतत्त्व के समावेश से अधिगत शक्तियाँ— (सर्वज्ञता आदि सिद्धियों की प्राप्ति) अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः । तथा स्वात्मन्यधिष्ठानात् सर्वत्रैवं भविष्यति ॥ ३९ ॥ इस (आत्म स्वभाव) से शरीर के व्याप्त होने पर उसमें सर्वज्ञता आदि धर्म अभिव्यक्त हो उठते हैं उसी प्रकार (देहाभिमान से मुक्त होकर) आत्मतत्त्व को ही अहं के रूप में अनुभव करने वाले योगी में सर्वव्यापक सर्वज्ञत्व आदि धर्म अभिव्यक्त हो उठते हैं ॥ ३९ ॥

  • सरोजिनी * प्रस्तुत कारिका में आत्मबल की महिमा पर प्रकाश डाला गया है । किसी विशिष्ट परिस्थिति में व्यक्ति कुछ असाधारण कार्यों को निष्पादित कर डालता है जिसे वह सामान्य स्थितियों में निष्पादित नहीं कर सकता । इसे 'आवेश' का अभिधान दिया जाता

३२६ स्पन्दकारिका है। यह आवेशात्मक बल सामान्य व्यक्तियों में तो क्षणस्थायी होता है किन्तु योगियों में यह सार्वकालिक, सार्वत्रिक एवं सर्वावस्थानुगत होता है। यह उनमें अत्यन्त विलक्षण तीव्रता के साथ विद्यमान होता है और स्थायी होता है क्योंकि वे अपनी अहन्ता को आत्मा से तादात्म्यपूर्वक अनुभव करते हैं। अनेन = इससे। स्वस्वभावस्वरूप स्पन्दतत्त्व के द्वारा। अधिष्ठिते = अधिष्ठित होने पर। व्याप्त होने पर। यौगिक विभूतियों की प्राप्ति—उक्त कारिका में सर्वज्ञतादिक यौगिक विभूतियों की प्राप्ति का वर्णन किया गया है। योगशास्त्र में भी इन विभूतियों का वर्णन किया गया है तथा—'परिणामत्रय संयमादतीतानागतज्ञानम् ॥' (यो०सू०) (३।३) अर्थात् तीनों परिणामों में संयम कर लेने से अतीत, भूत एवं अनागत तीनों का ज्ञान हो जाता है। 'शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ (योगसूत्र ३।१७)। शब्द अर्थ और ज्ञान—इन तीनों का जो एक में दूसरे का अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण हो रहा है उसके विभाग में संयम करने से संपूर्ण प्राणियों की वाणी का ज्ञान हो जाता है। न केवल इस शरीर के सम्बन्ध में वह सर्वज्ञ हो जाता है प्रत्युत् उसे सर्वत्र सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है। योग मार्ग की विभूतियाँ—जिस प्रकार इस तत्त्व के द्वारा शरीर के व्याप्त होने पर सर्वज्ञता आदि गुण अपने को व्यक्त कर देते हैं उसी प्रकार जहाँ भी योगी अपनी अन्तरात्मा में स्थित होता है वे उपर्युक्त गुण अपने को व्यक्त कर देते हैं ॥ ७ ॥ स्वस्वभावात्मा स्पन्दतत्त्व से शरीर के व्याप्त (अधिष्ठित) हो जाने पर जैसे प्राणी के तदवस्थोचित अर्थानुभव करणादिरूप सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वादि धर्म उत्पन्न हो जाते हैं।¹ कूर्मासंकोच के समान सर्वोपसंहार द्वारा या महाविकास की युक्ति द्वारा या जब अपनी अनपायिनी चिद्रूप आत्मा में अधिष्ठान करता है तब उस अभिज्ञान के प्रत्यभिज्ञात हो जाने पर वहीं समावेश की स्थिति प्राप्त हो जाती है। तब साधक सर्वत्र अर्थात् शिव से लेकर क्षितिपर्यन्त शङ्करोचित सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व रूप गुणों से युक्त हो जाएगा ॥² जिस प्रकार सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण तथा तदवस्थो चित अर्थानुभव व्यक्ति के शरीर में तब प्रकट होते हैं जब कि वह शरीर अपने स्वरूप से अभिन्न स्पन्द तत्त्व से अधिष्ठित हो जाता है उसी प्रकार यह सशरीरी आत्मा (Embodied Self) चिद्रूप आत्मा में स्थित होने पर (चाहे वह कछुए के अंग-संकोच की भाँति अपनी समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओं को समेट कर या अपना पूर्ण विकास करके अभिज्ञानों से प्रत्यभिज्ञात समावेश की स्थिति या आत्मा पर प्रगाढ़ ध्यान करके एवं शिव से लेकर क्षिति पर्यन्त सर्वत्र सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों को शिव बनकर प्राप्त कर लेता है)।³ १-३. स्पन्दनिर्णय।

तृतीयः निष्यन्दः ३२७ भट्टकल्लट 'वृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार करते हैं— अनेनात्मस्वभावेन अधिष्ठिते व्याप्ते शरीरे सर्वज्ञतादयो यस्मात् तत्र स्वल्प यूकाभक्षणमपि क्षिप्रमेव जानाति, तथा स्वात्मन्यवहितस्य सर्वत्र सर्वज्ञता भविष्यति ।¹ स्वस्वभाव के द्वारा अपने इस शरीर पर अधिकार कर लेने से इसके विषय में जैसे सर्वज्ञता आदि गुणों की प्राप्ति हो जाती है—कोई छोटा सा कीड़ा छू जाय तो पता चल जाता है उसी प्रकार अपने स्वरूप, या स्वभाव पर आधिपत्य स्थापित हो जाने पर सर्वत्र सब कुछ ज्ञात हो जाता है । 'ज्ञानसंबोध' में कहा भी गया है—सब कुछ वही है क्योंकि वह व्यापक है । वह स्वभाव से ही सर्वज्ञ है । 'यह पुरुष सर्वज्ञ है'—इसी से सर्वज्ञता प्रस्फुटित होती है— इस संदर्भ में यह भी कहा गया है—यदि सबके हृदय में विद्यमान तुम सर्वदा सर्वज्ञ न होते तो भला, नष्ट पदार्थविषयक स्मृति किसी को कैसे होती? जन्म लेते ही बालक स्तनपान की शिक्षा किससे प्राप्त करता है? छोटे-छोटे जन्तुओं को जल में तैरना कौन सिखाता है? यह सब तुम्हारी सर्वज्ञता का ही उल्लास है— 'सर्वज्ञः सर्वदैव त्वं सर्वस्य हृदये न चेत् । केनाऽन्यथास्य संभाव्या नष्टार्थविषया स्मृतिः ॥ तदहर्जातबालैश्च स्तनपानं क्व शिक्षितम्? प्राणिभिर्वाप्सु तरणमेतत् सर्वज्ञ चेष्टितम् ॥' अन्य भी कहा गया है—जो निम्नांकित है— मधुमक्खी जब मधुसंचय करने लगती है तब उसको यह संवित् कैसे होती है कि मुझे किसका रस लेना चाहिए? किसका नहीं लेना चाहिए? कौन स्वादिष्ट है और कौन अस्वादिष्ट?—यह आपका ही विलास नहीं तो और क्या है? नन्हें-नन्हें कीड़े भी अपने भरण-पोषण की आश्चर्यजनक व्यवस्था कर लेते हैं । अज्ञानी पशु हाथी अपने ऊपर जल फेंककर स्नान करता है । वह किसके ज्ञान का फल है? भोले हिरनों को संगीत की पहचान कैसे होती है जिससे वे खाना-पीना भी भूल जाते हैं?—इस अनन्त संवित् का विलास हुए बिना चूहा बिल में रहते हुए भी बिल्ली से क्यों डरता है? विवेकरहित कछुआ पानी के भीतर छिप जाता है और अपने समस्त अंगों को समेट लेता है—यह बुद्धि उसे कहाँ से प्राप्त होती है? आत्मसंवित् ही तो मोर में बैठकर नाच रही है । पक्षी अगाध जल में कूदकर मछली पकड़ने का कौशल किससे सीखता है? हंस नीर से क्षीर का विवेक करने की संवित् किससे प्राप्त करता है? छोटा से छोटा जीव बोलकर अपनी भावना कैसे प्रकट करता है? प्रातःकाल 'आज यह-यह काम करना है'—ऐसा संकल्प कहाँ से उदय होता है? मूर्ख पशुओं को अपने सींग, दाँत और पंजे से दूसरों पर प्रहार करने की विद्या किसने १. भट्टकल्लटः स्पन्दकारिकावृत्ति (३९) ।

३२८ स्पन्दकारिका सिखाई है? यदि भीतर अखण्ड संवित् स्पन्दित न होता तो हाथी को अपने बल और सिंह को अपने तेज का पता कैसे चलता? पशु पक्षियों को भी अतिवृष्टि और अनावृष्टि, एवं भूकम्प आदि की पूर्वसूचना कहाँ से प्राप्त हो जाती है? यमराज के समान भयंकर सिंह आदि प्राणियों से भी मनुष्य का प्रेम हो जाता है। बिना सबके हृदय में एक संविद् की स्थिति होते हुए भला ऐसी मित्रता या मिलनसारी कहाँ से आती है?— भक्ष्यं स्यात्किमभक्ष्यं वा स्वाद्वस्वाद्विति निश्चये। मक्षिकाणां कुतः संवित्? क्षौद्रसंचितिकर्मणि॥ सर्वज्ञस्याप्यधिष्ठातुस्तद्विजृम्भितमन्यथा। कृमिमात्राल्पकायानां संभृतिर्विस्मयास्पदम्॥ कतकस्य फलं वारिप्रसाधन विधित्सया। द्विपः सिपति तस्यैषा प्रज्ञा ह्यज्ञस्य किं पशोः॥ गीताकर्णनवैदग्ध्यं मुग्ध बुद्धेर्मृगस्य किम्। संभाव्यते हि येनाऽस्य रोमन्थविरता स्थितिः॥ भक्षयिष्यति मामित्थमाखार्विवरवर्तिनः। मार्जारं प्रति का शंका सर्वज्ञ ज्ञापनं विना॥ भयात् कूर्मः सवार्यन्तः सर्वाण्यंगानि गूहते। दुर्भेदबुद्धिस्तत्रास्यविवेकविकलस्य किम्॥ वीक्ष्यान्यक्षींणपक्षाणां वैलक्षण्यमचेतनः। नृत्तमारभते बर्ही स्फुरितं तज्जगद्गुरोः॥ अगाधजलमध्यस्थमत्स्यभक्षणलक्षणम्। केनोपदिष्टं तन्मग्दोरनुमानं विना कृतम्॥ अशक्तशक्ति कस्येयं सलिलात् पिबतः पयः। हंसस्य न पुनस्तस्य हृदयान्तर वर्तिनः॥ कृकवाकोर्गिरः कस्मात् क्षेत्रज्ञव्यापिन विना। यासामाकलनोद्युक्तो कालवित्कलना ततः॥ प्रवर्तते दिनारंभे निर्भ्रान्त कृत संविधिः। शृदन्त नखादीन प्राणिनामायुधानि यत्॥ परप्रहरणोद्रेके केनाख्यातान्यसंविदाम्। बलं तेजः करी सिंहो जानाति निजभूर्जितम्॥ को हेतुर्यावदन्तस्तथप्रतिपत्तिर्न सस्फुरा। अतिवृष्टेरनावृष्टेर्व्यञ्जकं चिह्नमिङ्गितैः॥ सूचयन्ति न तच्चित्रं पशवः पक्षिणोऽपि यत्॥ कृतान्तकल्पैः सिंहाद्यैः प्रीतिः प्राणभृतां कुतः। विनैकस्य हृदिस्थस्य संवित्संवादसुस्थितम्॥

तृतीयः निष्यन्दः ३२९ यह सब आत्मसंवित् की ही विशेषाभिव्यक्ति है। अपने स्वरूप में स्थिति अर्थात् सबके स्वरूप में स्थिति है। कभी स्वरूप से च्युति नहीं होती। यही युक्ति है जिससे सर्वत्र सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता आदि अभिव्यक्त हो जाते हैं। कहा भी गया है— एक ही भाव सबका स्वभाव है। सभी भाव एक ही भाव के स्वभाव हैं। जिसने एक ही भाव को तत्त्वतः अनुभव कर लिया उसने सभी भावों को तत्त्वतः अनुभव कर लिया— एको भावः सर्वभावस्वभावः सर्वे भावा ह्येकभावस्वभावाः । एको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः ॥ इस संबन्ध में एक रहस्य-युक्ति है कि जिस-जिस शरीर में संवित् दृढ़ता प्राप्त करेगा वहीं-वहीं उसके समस्त गुण प्रकट हो जाएँगे— ‘रहस्ययुक्तिरत्रेयं शरीरे यत्र यत्र च । संविदो दार्ढ्यलाभः स्यात्तत्र तत्र गुणोदयः ॥१ सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्व आदि गुणों की अभिव्यक्ति के उपायों को प्रतिपादित करके कारिकाकार अब एक उपपत्ति के निदर्शन के द्वारा उसे प्रदर्शित कर रहा है। अनेन = इस चेतन आत्मा के द्वारा। अधिष्ठिते = अधिष्ठित होने पर। मैं हूँ—इस प्रतिपत्ति के द्वारा अध्यासित होने पर, देहे = शरीर के। सर्वज्ञतादयः = सर्वज्ञातृत्व आदि। शरीराश्रित समस्त ज्ञेय कार्य। सर्व+ज्ञता । ‘ज्ञता’ = ज्ञातृत्वादिक जिसमें हों वे वे ही कर्तृत्वादिक धर्म। यथा = जिस प्रकार। सभी में स्थित हैं। व्यक्ति केवल अपने शरीर के स्तर पर ही सर्वज्ञ नहीं हो जाता प्रत्युत् वह सर्वत्र सर्वज्ञ हो जाता है। यह आत्मा जिस जिस भी पदार्थ को अहं के रूप में स्वीकार करता जाता है वे सभी उसके शरीर बनते जाते हैं और समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म पदार्थ उसके आश्रित होते जाते हैं। वह इन सभी को जानने लगता है और सभी कार्य करने लगता है। तथैव = उसी प्रकार, देह की अहं के रूप में स्वीकार करने या अहं को देहाधिष्ठान मानने की भाँति ।२ ग्लानि और उसकी निवृत्ति— ग्लानिर्विलुण्ठिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥ ४० ॥ १. उत्पलदेवाचार्य— ‘स्पन्दप्रदीपिका’। २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति'।

३३० स्पन्दकारिका औदासीन्य (मानसिक क्षोभ) शरीर में (धातु, बल, उत्साह, तेज शक्ति आदि) सभी कुछ नष्ट कर देने वाली है और उसका प्रसार अज्ञान से होता है । यदि वह उन्मेष के द्वारा उन्मूलित कर दी जाय तो कारण का अभाव होने से (वह) कहाँ से उत्पन्न हो पायेगी? ॥ ४० ॥

  • सरोजिनी * अज्ञानतः सूतिः = अज्ञान से संसरण चक्र का प्रादुर्भाव होता है । बौद्ध धर्म में भी इसे 'अविद्या' के रूप में ग्रहण किया गया है । 'भवचक्र' की प्रथम श्रृंखला 'अविद्या' मानी गई है । विलुप्तं = 'विच्छिन्नं । निर्मूलतां नीतं ॥' (रामकण्ठाचार्य) उन्मेषेण = स्वभावालोकविकासेन (रामकण्ठाचार्य) विलुण्ठिका = धातुबलवर्णतेजःशक्त्यादीनां हठेन हर्त्री ॥ (रामकण्ठाचार्य) सूतिः = सरणं, प्रवृत्तिः । ग्लानि = हर्षक्षति अनुत्साहरूपा । (उत्पलाचार्य) ॥ विलुण्ठिका = विलुम्पिका । विनाशिनी । (उत्पलाचार्य) ॥ भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है—'ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी । सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते । तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योझितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत्? अनेनैव कारणेन वलीपलितभावः शरीरदाढर्यं च योगिनाम् ॥१ उन्मेषेन = आत्मस्वभावेन (उत्पलाचार्य) दुःख की अनुभूति शरीर का चोर है । यह अज्ञान से उत्पन्न होती है । यदि यह अज्ञान उन्मेष के द्वारा विलुप्त होता है तो अपने कारण के अभाव में यह दुःख भला कहाँ रह सकता है ? दुःख की भावना जो कि व्यक्ति अपने शरीर को अपनी आत्मा मानकर अनुभव करता है—चोर की भाँति कार्य करती है जब कि यह पूर्णज्ञान के धन को चुराती है एवं बन्धन रूपा निर्धनता देती है । दुःखोत्पत्ति एवं उसकी सत्ता अज्ञान के कारण या आनन्द एवं ज्ञान से अभिन्न अपने आत्मस्वरूप की अप्रत्यभिज्ञा (Non recognition) के कारण होती है । अज्ञान एवं अप्रत्यभिज्ञान एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं । दुःखों के नष्ट हो जाने पर शरीर के अपरिहार्य दुःख भय भोग लुप्त हो जाते हैं और इनके लुप्त होने के अनुपात में योगी का यथार्थ स्वरूप उसी प्रकार प्रकट हो जाता है यथा स्वर्ण के तपाये जाने पर एवं उसके मल के नष्ट होने पर स्वर्ण अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकट होता है अतः योगी का महत्तम धन है—अपनी दैहिक सत्ता में भी दुःखात्यन्ताभाव । जैसा कि योगिनी मदालसा ने भी कहा है कि— १. स्पन्दकारिकावृत्ति (कल्लट) ।

तृतीयः निष्यन्दः ३३१ ‘त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेस्मिन्देहे हेये मूढतां मा व्रजेथाः। शुभाशुभैः कर्मभिर्देहेमेतमदादिभिः कञ्चुकस्ते निबद्धः ॥ मा०पु० २५।१४ ॥ क्षीयमाण देह के रहने पर भी परमयोगियों को ग्लानि कभी नहीं होती—और यह ग्लान्य- भाव ही योगियों की विभूति है । 'देहावस्थितस्यापि सर्वदा ग्लान्यभाव एव परयोगिनो विभूतिः ॥' अज्ञान = 'अज्ञानं नाम जन्मपरिणामविवृद्धिक्षयविनाशात्मकविकारविर- हित नित्यनिर्विकारस्वस्वभावाप्रत्यभिज्ञानात् जन्मादिविकाराधिकरणे कलेवरादौ आत्माभि- मानः ॥ यस्मिंश्च सति प्रबुद्धो जनः तद्विकारान् जन्मादीन् आत्मनि आरोपयन् ग्लान्या विलुण्ठ्यते ॥ (रामकण्ठाचार्य) । आचार्य उत्पलदेव इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि आत्मसंवित् के उल्लास को कुण्ठित, लुप्त या विनष्ट करने वाली यदि कोई वस्तु इस शरीर में है तो वह है—ग्लानि । ग्लानि का अर्थ है अनुत्साह । उत्साह से ही स्वभाव की अभिव्यक्ति होती है । ग्लानि का जनक है—अज्ञान । यदि आत्मस्वभाव द्वारा उस अज्ञान को नष्ट कर दिया जाय तो जीवन में ग्लानि या अनुत्साह नहीं रह सकते । इसी अज्ञान और ग्लानि को मिटाकर योगी लोग जरा-मरण को मिटाकर शरीर को दृढ़ कर लेते हैं । ग्लानि = हर्षक्षति । अनुत्साहरूपा हर्षक्षति । विलुण्ठिका = विलुम्पिका, विनाशिनी । सृति = सरण । विलुप्त = निर्णोदित, नाशित ।१ ग्लानि = मान्द्य आदि जनित हर्ष की हानि । सा = वह ग्लानि । ‘देहे' = षाटकौशिक कलेवर में । विलुण्ठिका = धातुबलवर्णतेज एवं शक्ति आदि का हठपूर्वक हरण करने वाली । तस्याश्चाज्ञानतः = प्रतिपादित तत्त्वावगमाभाव के कारण । सृतिः = सरण अर्थात् प्रवृत्ति । तत् = अज्ञान । उन्मेषविलुप्तं = 'उन्मेष' के द्वारा अर्थात् वक्ष्यमाण स्वभावा- लोकविकास के द्वारा, विलुप्त—विच्छिन्न या निर्मूल । (ऐसी स्थिति में यह ग्लानि कारण-रहित होने के कारण भला अस्तित्व में कैसे रह सकती है? स्पष्ट है कि कारण के बिना कार्य रहता ही नहीं ।) अज्ञान—जन्म-परिणाम-विवृद्धि-क्षय-विनाश से युक्त-विकारों से विरहित, नित्य, निर्विकार, स्वस्वभाव के अप्रत्यभिज्ञात होने से जन्मादिविकाराधिकरण शरीरादिक में जो आत्माभिमान है वही अज्ञान है—'अज्ञानं नाम जन्मपरिणामविवृद्धिक्षयविनाशात्मक- विकारविरहितनित्यनिर्विकारस्वस्वभावाप्रत्यभिज्ञानात् जन्मादिविकाराधिकरणे कलेवरादौ आत्माभिमानः ॥' इसके होने से ही अप्रबुद्ध व्यक्ति उन विकारों को अर्थात् जन्मादिक विकारों को आत्मा में आरोपित करके ग्लानि के कारण विलुण्ठित हुआ करता है (लूट लिया जाता है, लँगड़ा हो जाता है) ‘लुण्ठ' = चुराना, लूटना, सामना करना, लंगड़ा होना ।— १. स्पन्दनिर्णय—क्षेमराज । २. उत्पलाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।

३३२ स्पन्दकारिका लुण्ठति । लुण्ठिष्यति । अलुण्ठीत । लुण्ठयति । = लुण्ठक (डाकू, चोर) । लुण्ठन = लुण्ठा (लूट, डाका) लुण्ठी (लूटपाट) । लुण्ठक = डाकू । वक्ष्यमाण उन्मेष के परिशीलन से आविर्भूत सत्यात्मप्रत्यय वाले व्यक्ति को ग्लानि कैसे हो सकती है? सहजानन्दहानिरूप ग्लानि का अभाव होना ही मुख्यफल है और साधना का गौण फल है—वलीपलितादिक का अभाव ।—इन दोनों के अभाव की स्थिति में कारण के बिना कार्याभाव के कारण—भला ग्लानि कैसे रह सकती है? कहा भी गया है—‘अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम्’ ।१ ‘उन्मेष’ द्वारा अज्ञान उन्मूलित होता है । ‘उन्मेष’ का स्वरूप क्या है? कारिकाकार कहता है— 'एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ उन्मेष = आत्मबल । आकस्मिक आत्मबल । यदि किसी चिन्तनकर्ता का चित्त किसी एक विषय से सम्बद्ध चिन्ता में एकाग्रभाव से डूबा हुआ हो तो उसमें जिस स्वभाव के द्वारा सहसा कोई अन्य चिन्ता उभर आती है तो उस दूसरी चिन्ता की उत्पत्ति का कारण उन्मेष (आत्म बल का आकस्मिक विकास) है । कारिकाकार का कथन है कि ‘ग्लानि’ (औदासीन्य, बौद्धिक शैथिल्य, क्षोभ) शरीर के बल, तेज, धातु आदि सभी का विनाश करने वाली है । यह ‘ग्लानि’ अज्ञान से उत्पन्न होती है । यदि ‘उन्मेष’ का विकास किया जाय तो इस अज्ञान का मूलोच्छेद किया जा सकता है । अज्ञान के नष्ट होने पर (कारण के उच्छिन्न हो जाने पर) ग्लानि रूप कार्य का स्वयमेव उच्छेद हो जाता है । ग्लानि अज्ञान एवं उन्मेष—कारणकार्यवाद (Causation) (क) ‘कारण’ = ‘अज्ञान’ (ख) ‘कार्य’ = ‘ग्लानि’ । कारण का उच्छेद हो जाने पर कार्य स्वयं उच्छिन्न हो जाता है । कारण (अज्ञान)–कार्य (ग्लानि) । उन्मेष—अज्ञान का ध्वंस—ग्लानि का ध्वंस । ग्लानि = शरीर की विनाशक शक्ति है—‘ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी’,२ ‘ग्लानिर्विलुम्पिका देहे’ ।३ ‘ग्लानि’ और ‘अज्ञान’ का क्या सम्बन्ध है? यह ‘ग्लानि’ नामक मानसिक वृत्ति केवल ‘अज्ञान’ से उत्पन्न होती है—‘सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते ॥’४ ‘अज्ञान’ का उच्छेद कैसे हो सकता है?—अज्ञानोच्छेद ‘उन्मेष’ से हो सकता है ‘तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योज्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ॥’५ योगियों के शरीर पर जरा के लक्षण क्यों नहीं होते?—कारणरूप ‘अज्ञान’ के नष्ट हो जाने पर कार्यरूप ‘ग्लानि’ भी नष्ट हो जाती है और ‘उन्मेषतत्त्व’ का प्राचुर्य १. रामकण्ठाचार्य—‘स्पन्दकारिकाविवृति’ । २. भट्टकल्लट—‘स्पन्दसर्वस्व’ । ३-५. स्पन्दकारिका ।

तृतीयः निष्यन्दः ३३३ भी वर्तमान रहता है अतः योगी के शरीर में 'वलीपलित' नहीं होतीं और योगी का शरीर इनके अभाव के परिणामस्वरूप अत्यन्त दृढ़ रहता है— 'अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम्'१ अर्थात् योगियों के शरीर जराजन्य झुर्रियों एवं श्वेत बालों से मुक्त होते हैं। उन्मेष के दो पक्ष हैं—(१) सायोगिक (आकस्मिक) (२) साधनात्मक । (क) साधनात्मक दशा में एकाग्रता की स्थिति में उत्पन्न उन्मेष—जब कोई योगी विरागी होकर किसी निश्चित धारणा का आलम्बन लेकर एकाग्रता की चरमसीमा पर आरूढ़ हो जाता है तब उसमें स्वयमेव 'उन्मेष' का आविर्भाव हो जाता है। (ख) भट्टकल्लट की व्याख्या—आकस्मिक या सायोगिक उन्मेष—भट्टकल्लट कहते हैं कि—किसी विशिष्ट विषय के विमर्शन में व्यापृत चित्त में स्वभाव द्वारा ही अकस्मात् जो चिन्ता प्रादुर्भूत हो जाती है उस चिन्ता का कारण 'उन्मेष' है। 'एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्‍यन्या चिन्तोत्पद्यते, स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः ॥'२ यह (उन्मेषतत्त्व) दो चिन्ताओं के मध्यवर्ती सन्धिकाल में अनुभव में आता है। यह आन्तर विमर्श का विषय है। 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' कारिका (१।१) में प्रयुक्त 'उन्मेष' शब्द सङ्कल्पात्मक गतिमयता—इच्छाशक्ति—सङ्कल्प के द्योतक हैं— 'स्वस्वभावस्यैव शिवात्मक सङ्कल्पमात्रेण (प्रलयोदयौ) जगदुत्पत्तिसंहारयोः कार- णत्वं' (स्पन्दकारिकावृत्तिः भट्टकल्लट) यह 'एकचिन्ताप्रसक्तस्य' वाली कारिका के 'उन्मेष' से पृथक् अर्थ वाला है। उन्मेष का स्वरूप— एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ ४१ ॥ किसी एक विचार में संल्लीन व्यक्ति के मन में जहाँ से अन्य विचार उत्पन्न होता है उसे 'उन्मेष' समझना चाहिए तथा (व्यक्ति को) स्वयं उसको (अन्तरावलोकन के द्वारा) जानना चाहिए ॥ ४१ ॥

  • सरोजिनी * एकचिन्ताप्रसक्तस्य = दृश्यमान या स्मर्यमाण विशिष्ट वस्तुओं या दृश्यों के प्रति प्रसक्त व्यक्ति का इनमें से एक वस्तु की चिन्ता में मग्न होने पर 'यतो' जिस कारण से। चिन्त्याभासानुपरक्तज्ञानात्मा स्वस्वभावप्रकाश के कारणभूत 'अपर' (अन्य) चिन्ता से सम्बद्ध ज्ञानान्तर उत्पन्न हो जाता है।३ १. स्पन्दसर्वस्व । २. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' । ३. रामकण्ठाचार्यः ।

३३४ स्पन्दकारिका पुरुष एक चिन्ता में संलग्न रहता है कि तत्काल दूसरी चिन्ता का उदय हो जाता है। यह किसके द्वारा होता है? इसी का अभिधान है—'उन्मेष' । प्रति व्यक्ति को उसी का अनुभव करना चाहिए। प्रथम चिन्ता की विस्मृति एवं दूसरी चिन्ता का उदय होना—इन दोनों के मध्य 'उन्मेष' स्थित है। उस उन्मेष से अपनी आत्मा को पहचानना चाहिए। दो चिन्ताओं के मध्य व्यापक रूप से अनुभूयमान 'स्वसंवेद्य' वही है किन्तु यह युवती के सहवास- सुख के समान उपदेश देने योग्य नहीं है।१ आचार्य क्षेमराज स्पन्दनिर्णय में कहते हैं—यह 'उन्मेष' किस स्वरूप वाला है? यह किस उपाय से प्राप्य है—ऐसी आशङ्का का उत्तर देने के लिए ही ग्रन्थकार ने निम्न श्लोक कहा—'एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः..... उपलक्षयेत्।' प्रसक्त = एकाग्रीभूत । प्रत्यभिज्ञा-टीका में भी कहा गया है कि—'शरीरमपि ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिव- रूपतया पश्यन्ति अर्चयन्ति च ते सिद्ध्यन्ति घटादिकमपि तथाभिनिविश्य पश्यन्ति अर्चयन्ति च तेऽपि इति नास्त्यत्र विवादः। इस विषय में कोई विवाद नहीं है कि केवल वे ही साफल्य नहीं पाते जो कि शरीर को भी शिव के रूप में मानते एवं पूजते हैं प्रत्युत वे भी जो शिव को ३६ तत्त्वों से अभिन्नमानकर पूजते हैं। उस दृष्टि से तो जो घटादि की भी पूजा करते हैं वे भी साफल्य पा लेते हैं।२ भट्टश्रीवामन का कथन है कि—क्योंकि ज्ञात वस्तु चेतना पर स्वयं आधृत है तथा क्योंकि इसे चेतना से पृथक् रूप में विद्यमान के रूप में कल्पित नहीं किया जा सकता अतः सब कुछ चेतना का विषय है अतः प्रत्येक को चेतना के साथ अपनी अभिन्नता की अनुभूति करनी चाहिए— 'आलम्ब्य संविदं यस्मात्संवेद्यं न स्वभावतः । तस्मात्संविदितं सर्वमिति संविन्मयो भवेत् ॥' श्रीज्ञानगर्भस्तोत्र में कहा गया है—'तुम्हारी क्रीड़ामय इच्छा (Playful desire) भेद का कारण बनती है जो कि 'प्रमाता' 'प्रमा' या 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' के रूप में स्थित है। वह भेद (बहुत्व) तुम्हारी क्रीड़ात्मिका इच्छा के समाप्त हो जाने पर समाप्त हो जाती है। इस प्रकाश में कोई ज्ञानी पुरुष इसे अनुभव करता है—३ 'प्रमातृ-मिति-मान-मेयमय भेदजातस्य ते । विहार इह हेतुतां समुपयाति यस्मात्त्वयि ॥ निवृत्तविवृतौ क्वचितदपयाति तेनाध्वधुना । नयेन पुनरीक्षते जगति जातुचित् केनचित् ॥' १. स्पन्दप्रदीपिका २-३. स्पन्दनिर्णय