स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३३१ ‘त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेस्मिन्देहे हेये मूढतां मा व्रजेथाः। शुभाशुभैः कर्मभिर्देहेमेतमदादिभिः कञ्चुकस्ते निबद्धः ॥ मा०पु० २५।१४ ॥ क्षीयमाण देह के रहने पर भी परमयोगियों को ग्लानि कभी नहीं होती—और यह ग्लान्य- भाव ही योगियों की विभूति है । 'देहावस्थितस्यापि सर्वदा ग्लान्यभाव एव परयोगिनो विभूतिः ॥' अज्ञान = 'अज्ञानं नाम जन्मपरिणामविवृद्धिक्षयविनाशात्मकविकारविर- हित नित्यनिर्विकारस्वस्वभावाप्रत्यभिज्ञानात् जन्मादिविकाराधिकरणे कलेवरादौ आत्माभि- मानः ॥ यस्मिंश्च सति प्रबुद्धो जनः तद्विकारान् जन्मादीन् आत्मनि आरोपयन् ग्लान्या विलुण्ठ्यते ॥ (रामकण्ठाचार्य) । आचार्य उत्पलदेव इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि आत्मसंवित् के उल्लास को कुण्ठित, लुप्त या विनष्ट करने वाली यदि कोई वस्तु इस शरीर में है तो वह है—ग्लानि । ग्लानि का अर्थ है अनुत्साह । उत्साह से ही स्वभाव की अभिव्यक्ति होती है । ग्लानि का जनक है—अज्ञान । यदि आत्मस्वभाव द्वारा उस अज्ञान को नष्ट कर दिया जाय तो जीवन में ग्लानि या अनुत्साह नहीं रह सकते । इसी अज्ञान और ग्लानि को मिटाकर योगी लोग जरा-मरण को मिटाकर शरीर को दृढ़ कर लेते हैं । ग्लानि = हर्षक्षति । अनुत्साहरूपा हर्षक्षति । विलुण्ठिका = विलुम्पिका, विनाशिनी । सृति = सरण । विलुप्त = निर्णोदित, नाशित ।१ ग्लानि = मान्द्य आदि जनित हर्ष की हानि । सा = वह ग्लानि । ‘देहे' = षाटकौशिक कलेवर में । विलुण्ठिका = धातुबलवर्णतेज एवं शक्ति आदि का हठपूर्वक हरण करने वाली । तस्याश्चाज्ञानतः = प्रतिपादित तत्त्वावगमाभाव के कारण । सृतिः = सरण अर्थात् प्रवृत्ति । तत् = अज्ञान । उन्मेषविलुप्तं = 'उन्मेष' के द्वारा अर्थात् वक्ष्यमाण स्वभावा- लोकविकास के द्वारा, विलुप्त—विच्छिन्न या निर्मूल । (ऐसी स्थिति में यह ग्लानि कारण-रहित होने के कारण भला अस्तित्व में कैसे रह सकती है? स्पष्ट है कि कारण के बिना कार्य रहता ही नहीं ।) अज्ञान—जन्म-परिणाम-विवृद्धि-क्षय-विनाश से युक्त-विकारों से विरहित, नित्य, निर्विकार, स्वस्वभाव के अप्रत्यभिज्ञात होने से जन्मादिविकाराधिकरण शरीरादिक में जो आत्माभिमान है वही अज्ञान है—'अज्ञानं नाम जन्मपरिणामविवृद्धिक्षयविनाशात्मक- विकारविरहितनित्यनिर्विकारस्वस्वभावाप्रत्यभिज्ञानात् जन्मादिविकाराधिकरणे कलेवरादौ आत्माभिमानः ॥' इसके होने से ही अप्रबुद्ध व्यक्ति उन विकारों को अर्थात् जन्मादिक विकारों को आत्मा में आरोपित करके ग्लानि के कारण विलुण्ठित हुआ करता है (लूट लिया जाता है, लँगड़ा हो जाता है) ‘लुण्ठ' = चुराना, लूटना, सामना करना, लंगड़ा होना ।— १. स्पन्दनिर्णय—क्षेमराज । २. उत्पलाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।