स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ स्पन्दकारिका लुण्ठति । लुण्ठिष्यति । अलुण्ठीत । लुण्ठयति । = लुण्ठक (डाकू, चोर) । लुण्ठन = लुण्ठा (लूट, डाका) लुण्ठी (लूटपाट) । लुण्ठक = डाकू । वक्ष्यमाण उन्मेष के परिशीलन से आविर्भूत सत्यात्मप्रत्यय वाले व्यक्ति को ग्लानि कैसे हो सकती है? सहजानन्दहानिरूप ग्लानि का अभाव होना ही मुख्यफल है और साधना का गौण फल है—वलीपलितादिक का अभाव ।—इन दोनों के अभाव की स्थिति में कारण के बिना कार्याभाव के कारण—भला ग्लानि कैसे रह सकती है? कहा भी गया है—‘अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम्’ ।१ ‘उन्मेष’ द्वारा अज्ञान उन्मूलित होता है । ‘उन्मेष’ का स्वरूप क्या है? कारिकाकार कहता है— 'एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ उन्मेष = आत्मबल । आकस्मिक आत्मबल । यदि किसी चिन्तनकर्ता का चित्त किसी एक विषय से सम्बद्ध चिन्ता में एकाग्रभाव से डूबा हुआ हो तो उसमें जिस स्वभाव के द्वारा सहसा कोई अन्य चिन्ता उभर आती है तो उस दूसरी चिन्ता की उत्पत्ति का कारण उन्मेष (आत्म बल का आकस्मिक विकास) है । कारिकाकार का कथन है कि ‘ग्लानि’ (औदासीन्य, बौद्धिक शैथिल्य, क्षोभ) शरीर के बल, तेज, धातु आदि सभी का विनाश करने वाली है । यह ‘ग्लानि’ अज्ञान से उत्पन्न होती है । यदि ‘उन्मेष’ का विकास किया जाय तो इस अज्ञान का मूलोच्छेद किया जा सकता है । अज्ञान के नष्ट होने पर (कारण के उच्छिन्न हो जाने पर) ग्लानि रूप कार्य का स्वयमेव उच्छेद हो जाता है । ग्लानि अज्ञान एवं उन्मेष—कारणकार्यवाद (Causation) (क) ‘कारण’ = ‘अज्ञान’ (ख) ‘कार्य’ = ‘ग्लानि’ । कारण का उच्छेद हो जाने पर कार्य स्वयं उच्छिन्न हो जाता है । कारण (अज्ञान)–कार्य (ग्लानि) । उन्मेष—अज्ञान का ध्वंस—ग्लानि का ध्वंस । ग्लानि = शरीर की विनाशक शक्ति है—‘ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी’,२ ‘ग्लानिर्विलुम्पिका देहे’ ।३ ‘ग्लानि’ और ‘अज्ञान’ का क्या सम्बन्ध है? यह ‘ग्लानि’ नामक मानसिक वृत्ति केवल ‘अज्ञान’ से उत्पन्न होती है—‘सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते ॥’४ ‘अज्ञान’ का उच्छेद कैसे हो सकता है?—अज्ञानोच्छेद ‘उन्मेष’ से हो सकता है ‘तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योज्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ॥’५ योगियों के शरीर पर जरा के लक्षण क्यों नहीं होते?—कारणरूप ‘अज्ञान’ के नष्ट हो जाने पर कार्यरूप ‘ग्लानि’ भी नष्ट हो जाती है और ‘उन्मेषतत्त्व’ का प्राचुर्य १. रामकण्ठाचार्य—‘स्पन्दकारिकाविवृति’ । २. भट्टकल्लट—‘स्पन्दसर्वस्व’ । ३-५. स्पन्दकारिका ।