स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३३३ भी वर्तमान रहता है अतः योगी के शरीर में 'वलीपलित' नहीं होतीं और योगी का शरीर इनके अभाव के परिणामस्वरूप अत्यन्त दृढ़ रहता है— 'अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम्'१ अर्थात् योगियों के शरीर जराजन्य झुर्रियों एवं श्वेत बालों से मुक्त होते हैं। उन्मेष के दो पक्ष हैं—(१) सायोगिक (आकस्मिक) (२) साधनात्मक । (क) साधनात्मक दशा में एकाग्रता की स्थिति में उत्पन्न उन्मेष—जब कोई योगी विरागी होकर किसी निश्चित धारणा का आलम्बन लेकर एकाग्रता की चरमसीमा पर आरूढ़ हो जाता है तब उसमें स्वयमेव 'उन्मेष' का आविर्भाव हो जाता है। (ख) भट्टकल्लट की व्याख्या—आकस्मिक या सायोगिक उन्मेष—भट्टकल्लट कहते हैं कि—किसी विशिष्ट विषय के विमर्शन में व्यापृत चित्त में स्वभाव द्वारा ही अकस्मात् जो चिन्ता प्रादुर्भूत हो जाती है उस चिन्ता का कारण 'उन्मेष' है। 'एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या चिन्तोत्पद्यते, स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः ॥'२ यह (उन्मेषतत्त्व) दो चिन्ताओं के मध्यवर्ती सन्धिकाल में अनुभव में आता है। यह आन्तर विमर्श का विषय है। 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' कारिका (१।१) में प्रयुक्त 'उन्मेष' शब्द सङ्कल्पात्मक गतिमयता—इच्छाशक्ति—सङ्कल्प के द्योतक हैं— 'स्वस्वभावस्यैव शिवात्मक सङ्कल्पमात्रेण (प्रलयोदयौ) जगदुत्पत्तिसंहारयोः कार- णत्वं' (स्पन्दकारिकावृत्तिः भट्टकल्लट) यह 'एकचिन्ताप्रसक्तस्य' वाली कारिका के 'उन्मेष' से पृथक् अर्थ वाला है। उन्मेष का स्वरूप— एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ ४१ ॥ किसी एक विचार में संल्लीन व्यक्ति के मन में जहाँ से अन्य विचार उत्पन्न होता है उसे 'उन्मेष' समझना चाहिए तथा (व्यक्ति को) स्वयं उसको (अन्तरावलोकन के द्वारा) जानना चाहिए ॥ ४१ ॥
- सरोजिनी * एकचिन्ताप्रसक्तस्य = दृश्यमान या स्मर्यमाण विशिष्ट वस्तुओं या दृश्यों के प्रति प्रसक्त व्यक्ति का इनमें से एक वस्तु की चिन्ता में मग्न होने पर 'यतो' जिस कारण से। चिन्त्याभासानुपरक्तज्ञानात्मा स्वस्वभावप्रकाश के कारणभूत 'अपर' (अन्य) चिन्ता से सम्बद्ध ज्ञानान्तर उत्पन्न हो जाता है।३ १. स्पन्दसर्वस्व । २. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' । ३. रामकण्ठाचार्यः ।