स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ स्पन्दकारिका पुरुष एक चिन्ता में संलग्न रहता है कि तत्काल दूसरी चिन्ता का उदय हो जाता है। यह किसके द्वारा होता है? इसी का अभिधान है—'उन्मेष' । प्रति व्यक्ति को उसी का अनुभव करना चाहिए। प्रथम चिन्ता की विस्मृति एवं दूसरी चिन्ता का उदय होना—इन दोनों के मध्य 'उन्मेष' स्थित है। उस उन्मेष से अपनी आत्मा को पहचानना चाहिए। दो चिन्ताओं के मध्य व्यापक रूप से अनुभूयमान 'स्वसंवेद्य' वही है किन्तु यह युवती के सहवास- सुख के समान उपदेश देने योग्य नहीं है।१ आचार्य क्षेमराज स्पन्दनिर्णय में कहते हैं—यह 'उन्मेष' किस स्वरूप वाला है? यह किस उपाय से प्राप्य है—ऐसी आशङ्का का उत्तर देने के लिए ही ग्रन्थकार ने निम्न श्लोक कहा—'एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः..... उपलक्षयेत्।' प्रसक्त = एकाग्रीभूत । प्रत्यभिज्ञा-टीका में भी कहा गया है कि—'शरीरमपि ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिव- रूपतया पश्यन्ति अर्चयन्ति च ते सिद्ध्यन्ति घटादिकमपि तथाभिनिविश्य पश्यन्ति अर्चयन्ति च तेऽपि इति नास्त्यत्र विवादः। इस विषय में कोई विवाद नहीं है कि केवल वे ही साफल्य नहीं पाते जो कि शरीर को भी शिव के रूप में मानते एवं पूजते हैं प्रत्युत वे भी जो शिव को ३६ तत्त्वों से अभिन्नमानकर पूजते हैं। उस दृष्टि से तो जो घटादि की भी पूजा करते हैं वे भी साफल्य पा लेते हैं।२ भट्टश्रीवामन का कथन है कि—क्योंकि ज्ञात वस्तु चेतना पर स्वयं आधृत है तथा क्योंकि इसे चेतना से पृथक् रूप में विद्यमान के रूप में कल्पित नहीं किया जा सकता अतः सब कुछ चेतना का विषय है अतः प्रत्येक को चेतना के साथ अपनी अभिन्नता की अनुभूति करनी चाहिए— 'आलम्ब्य संविदं यस्मात्संवेद्यं न स्वभावतः । तस्मात्संविदितं सर्वमिति संविन्मयो भवेत् ॥' श्रीज्ञानगर्भस्तोत्र में कहा गया है—'तुम्हारी क्रीड़ामय इच्छा (Playful desire) भेद का कारण बनती है जो कि 'प्रमाता' 'प्रमा' या 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' के रूप में स्थित है। वह भेद (बहुत्व) तुम्हारी क्रीड़ात्मिका इच्छा के समाप्त हो जाने पर समाप्त हो जाती है। इस प्रकाश में कोई ज्ञानी पुरुष इसे अनुभव करता है—३ 'प्रमातृ-मिति-मान-मेयमय भेदजातस्य ते । विहार इह हेतुतां समुपयाति यस्मात्त्वयि ॥ निवृत्तविवृतौ क्वचितदपयाति तेनाध्वधुना । नयेन पुनरीक्षते जगति जातुचित् केनचित् ॥' १. स्पन्दप्रदीपिका २-३. स्पन्दनिर्णय