स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 436, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३३५ (१) 'जीव' समग्र का एक रूप है। (२) 'जीव' की ही समस्त शक्तियाँ हैं क्योंकि विश्व उससे ही उत्पन्न होता है। ('सर्वभावसमुद्भवत्वं जीवस्य। संविद्येय प्रसूतायां जगतः सद्भावात्सर्वभावसमुद्भव- वत्वं जीवस्य। जीवादेव उदयति विश्वं अतः अयं सर्वमयो विश्वशक्तिः ।')¹ जीवात्मा सर्वमयता से अभिन्न है। जीव समग्र से अभिन्न है। समग्र से जीव की एकात्मता या अभिन्नता इस बात से प्रमाणित होती है कि जीव की समस्त वस्तुनिष्ठ जगत् के ज्ञान से अभिन्नता है। जगत् नील सुख दुःखादि रूप है। उपर्युक्त दोनों श्लोकों द्वारा समस्त भेदों के उन्मूलन का प्रतिपादन किया गया है। स्पन्दतत्त्व द्वारा विश्वोपदेश, मोक्ष एवं अभेद का उपदेश दिया गया है— (१) 'सर्वभेदपाद्योन्मूलन उपपत्ति परिघटिताश्च ज्ञानोपदेशकथाः ।' (२) 'स्पन्दतत्त्वेन एव विश्वोपदेशः स्वीकृतः ।' (३) 'एतत् प्रतिपत्ति सारतया एव मोक्षः ।' द्वैतवाद या व्यक्तिवाद के वृक्ष का उन्मूलन एवं समस्त विश्व के साथ ऐकात्म्य- भाव, अभिन्नता एवं अद्वैत भावना ही मुक्ति है।² 'उन्मेष'—किसी व्यक्ति का चित्त कभी किसी प्रकार की चिन्ता में लीन रहता है और तत्क्षण उसमें किसी अलक्षित आत्मशक्ति के कारण अकस्मात् कोई अन्य चिन्ता उदित हो जाती है। आत्मबल के इस तत्कालिक उदय को ही 'उन्मेष' का अभिधान दिया गया है। इसका साक्षात्कार या इसकी संवेदना साधक के स्वयं के सूक्ष्म आत्मनिरीक्षण के द्वारा ही संभव हो पाती है स्वतः नहीं। 'उन्मेष' का स्वभाव—भट्टकल्लट कहते हैं— यदि किसी विषयविशेष में चित्त पूर्णतः लीन है—चिन्तन एवं विचार-विमर्श में निमग्न है तो जिस स्वभाव के द्वारा उसमें अकस्मात् किसी अन्य चिन्ता का आगमन या उदय होता है उस अन्य चिन्ता के उदय (आविर्भाव) का वह मूल कारण ही 'उन्मेष' है। 'एकत्रविषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या चिन्तोत्पद्यते स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः ॥'³ भाव यह कि चित्त में एक चिन्ता के व्याप्त रहने पर भी जो अन्य चिन्ता अकस्मात् उदित हो जाती है उस अकस्मात् उदित चिन्ता का कारण 'उन्मेष' कहलाता है। 'उन्मेष' अज्ञान का उच्छेदक है—'उन्मेष' (१) एकचिन्ताप्रसक्त (एक विशिष्ट विचार-विमर्श में एकाग्र एवं निमग्न) चित्त में अकस्मात् जो अपर विचार या चिन्ता आविर्भूत हो जाती है उसका कारण मात्र 'उन्मेष' है। (२) इसकी अनुभूति योगियों को आत्म-शोध द्वारा ही संभव हो पाती है—'स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः ॥'⁴ १-२. स्पन्दनिर्णय। ३-४. स्पन्दसर्वस्व।