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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

३३६ स्पन्दकारिका (३) यह दो चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधि-काल की वह अनुभूति है जो कि व्यापक रूप में अनुभूत हुआ करती है—'स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः, चिन्ता द्वयान्तर्व्यापकतयानुभूयमानः ॥'१ एकचिन्ताप्रसक्तस्य—'स्पन्दनिर्णय' नामक ग्रन्थ में आचार्य क्षेमराज ने इस पदावली की व्याख्या यह की है कि— जब कोई योगी अपने दैनिक जीवन के समस्त दैनन्दिन आवश्यक कार्यों का त्याग करके किसी आलम्बन विशेष को पृथक्-पृथक् रूप में अपनी धारणा का विषय बनाकर उसकी गंभीर गवेषणा करते हुए एकाग्रता के चरम शृंग पर आरूढ़ हो जाता है तब उसमें स्वयमेव चित्ततत्त्व का चमत्कारमण्डित 'उन्मेष' उदित हो जाता है। विवेचना—'स्पन्दनिर्णय' के अनुसार 'उन्मेष' के उदय के लिए किसी भी व्यक्ति को वीतराग होकर चित्त को योगियों की भाँति एकाग्र करना चाहिए। एकाग्रता की यह प्रचण्डता एवं तीव्रता ही 'उन्मेष' के उदय का कारण बनती है न कि सामान्य व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन में उदित सामान्य एकाग्रता। भट्टकल्लट का मत इससे भिन्न सा प्रतीत होता है क्योंकि वे 'एकचिन्ता- प्रसक्तस्य' का अर्थ यह करते हैं—'एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य' क्षेमराज की व्याख्या के अनुसार तो 'उन्मेष तत्त्व' का उदय मात्र योगियों में२ ही संभव है—प्रचण्ड एकाग्रता के साधक योगियों में ही इसका आविर्भाव संभव है। काश्मीरी शैवदर्शन संसारित्व में भी शिवत्व के साक्षात्कार की संभावना में विश्वास रखता है क्योंकि विश्व भी तो शिवत्व का ही स्वरूप-विकास है—शक्ति का आत्मप्रसार है—शिवशक्ति का बाह्योन्मुखी विराट् प्रसार है और उसकी बाह्यवर्ती अभिव्यक्ति है। अतः 'उन्मेष' के उदय के लिए संसार का त्याग करके गुफागत, एकान्तिक एवं वैराग्यपूर्ण जीवन ही आवश्यक नहीं है प्रत्युत् संसार के प्रतिकण में विद्यमान उस उन्मेष तत्त्व को संसार के किसी भी पदार्थ एवं उसकी किसी भी अवस्था में देखा जा सकता है। भट्टकल्लट 'एक विषये व्यापृतचित्तस्य' कहकर यह सिद्ध करते हैं कि 'उन्मेष तत्त्व' चित्त में प्रतिक्षण आविर्भूत एवं लयीभूत अनन्त चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधिकालों में नित्य उदीयमान तत्त्व है और इसकी अनुभूति योगी ही नहीं प्रत्युत् प्रत्येक गृहस्थ भी एकाग्रता के क्षण में दो चिन्ताओं के मध्यवर्ती क्षणों में कर सकता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के आन्तर विमर्श का विषय है और यह 'उन्मेष तत्त्व' 'ग्लानि' के उत्पादक 'अज्ञान' का भी उच्छेदक है— 'ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः। तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥'३ 'अज्ञान' बौद्ध धर्म में 'अविद्या' के रूप में ग्रहण किया गया है। यह 'अविद्या'— भवचक्र की प्रथम श्रृंखला है। 'प्रतीत्यसमुत्पाद' का भी इससे संबन्ध है— १-२. स्पन्दसर्वस्व। ३. स्पन्दकारिका (४०)।

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