स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३३७ प्रतीत्य-समुत्पाद के अंग- अविद्या संस्कार विज्ञान नामरूप षडायतन स्पर्श वेदना तृष्णा उपादान भव जाति जरा-मरण यही भव-श्रृंखला भी है । ये ही है— ‘भवचक्र’ के १२ अंग— ‘अविज्जा पच्चया संखारा, संखार पच्चया विज्ञाणं, विञ्जापच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया षडायतनं, षडायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया .... ‘भवचक्र’ प्रथम अंग = ‘अविद्या’ अन्तिम अंग = ‘मृत्यु’ । यौगिक सिद्धियाँ और उन्मेषानुशीलन— अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः । प्रवर्ततेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥ ४२ ॥ इसलिए (उन्मेष के अनुशीलन करने से) स्वल्पकाल में ही ‘बिन्दु’ ‘नाद’ ‘रूप’ एवं ‘रस’ (अभिधान वाली) सिद्धियाँ अभिव्यक्त हो जाती है किन्तु (देहाभिमानी प्राणियों को ये सिद्धियाँ) क्षोभ में डाल देती हैं ॥ ४२ ॥
- सरोजिनी * अतः = उन्मेष के अनुशीलन से 'अनुशील्यमानात्' इस कारिका में यौगिक सिद्धियों पर प्रकाश डाला गया है । अतो = (अस्मात्) इससे । अर्थात्—इस उन्मेष से । इस प्रतिपादित स्वरूप वाले उन्मेष से । 'अचिरेण' = अल्प काल में । शीघ्र ही । प्रवर्तन्ते = आविर्भूत होते हैं । बिन्दु = भ्रूमध्य आदि प्रदेशों में ध्यानाभ्यासप्रकर्ष से प्रवर्धमान उत्तरोत्तर प्रसाद तेज- विशेष । धरातत्त्व का ध्यान करने वाले योगियों के द्वारा बिन्दु के भेदाभ्यास द्वारा यह तेज विशेष आविर्भूत होता है । नाद—इसे व्योमतत्त्वाभ्यासी सुनते हैं । नदी—घन आदि के निर्घोष सूक्ष्मीभावाभिव्यज्यमान होकर मधुमत्त मधुकर ध्वनि का अनुकरण करने वाली स्वोच्चरित ध्वनिविशेष ॥ रूपं—इसे तेजस्तत्व के अभ्यासी देखते हैं । दृश्य एवं वस्तु का आकार ही रूप है । रसो = रसवान वस्तु की अनुपस्थिति में भी मुख में होने वाला अमृतास्वाद । इसका अनुभव लोलाग्रलम्बिका आदि में धारणा करने वालों को होता है । पवन तत्त्व का ध्यान करने वालों को स्पर्श विशेष एवं जलतत्त्व का ध्यान करने वालों को रसविशेष का अनुभव होता है ।१ १. स्पन्दकारिकाविवृति । स्पं० २२