स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
तृतीयः निष्यन्दः ३३७ प्रतीत्य-समुत्पाद के अंग- अविद्या संस्कार विज्ञान नामरूप षडायतन स्पर्श वेदना तृष्णा उपादान भव जाति जरा-मरण यही भव-श्रृंखला भी है । ये ही है— ‘भवचक्र’ के १२ अंग— ‘अविज्जा पच्चया संखारा, संखार पच्चया विज्ञाणं, विञ्जापच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया षडायतनं, षडायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया .... ‘भवचक्र’ प्रथम अंग = ‘अविद्या’ अन्तिम अंग = ‘मृत्यु’ । यौगिक सिद्धियाँ और उन्मेषानुशीलन— अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः । प्रवर्ततेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥ ४२ ॥ इसलिए (उन्मेष के अनुशीलन करने से) स्वल्पकाल में ही ‘बिन्दु’ ‘नाद’ ‘रूप’ एवं ‘रस’ (अभिधान वाली) सिद्धियाँ अभिव्यक्त हो जाती है किन्तु (देहाभिमानी प्राणियों को ये सिद्धियाँ) क्षोभ में डाल देती हैं ॥ ४२ ॥
- सरोजिनी * अतः = उन्मेष के अनुशीलन से 'अनुशील्यमानात्' इस कारिका में यौगिक सिद्धियों पर प्रकाश डाला गया है । अतो = (अस्मात्) इससे । अर्थात्—इस उन्मेष से । इस प्रतिपादित स्वरूप वाले उन्मेष से । 'अचिरेण' = अल्प काल में । शीघ्र ही । प्रवर्तन्ते = आविर्भूत होते हैं । बिन्दु = भ्रूमध्य आदि प्रदेशों में ध्यानाभ्यासप्रकर्ष से प्रवर्धमान उत्तरोत्तर प्रसाद तेज- विशेष । धरातत्त्व का ध्यान करने वाले योगियों के द्वारा बिन्दु के भेदाभ्यास द्वारा यह तेज विशेष आविर्भूत होता है । नाद—इसे व्योमतत्त्वाभ्यासी सुनते हैं । नदी—घन आदि के निर्घोष सूक्ष्मीभावाभिव्यज्यमान होकर मधुमत्त मधुकर ध्वनि का अनुकरण करने वाली स्वोच्चरित ध्वनिविशेष ॥ रूपं—इसे तेजस्तत्व के अभ्यासी देखते हैं । दृश्य एवं वस्तु का आकार ही रूप है । रसो = रसवान वस्तु की अनुपस्थिति में भी मुख में होने वाला अमृतास्वाद । इसका अनुभव लोलाग्रलम्बिका आदि में धारणा करने वालों को होता है । पवन तत्त्व का ध्यान करने वालों को स्पर्श विशेष एवं जलतत्त्व का ध्यान करने वालों को रसविशेष का अनुभव होता है ।१ १. स्पन्दकारिकाविवृति । स्पं० २२
३३८ स्पन्दकारिका इस 'उन्मेष' का अनुशीलन करने के ही समय में भ्रूमध्य में तेजोबिन्दु का अनुभव होने लगता है । बिन्दु के पश्चात् अनाहत-अकृत्रिम नाद की अनुभूति होती है । इसे ही 'शब्दब्रह्म' कहते हैं । दूर से श्रवण की सिद्धि भी हो जाती है । अंधकार में रूप का दर्शन, देवता का दर्शन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म का दर्शन, मुख में अमृत और षड्रस का आस्वादन आदि भी अनुभव में आते हैं । ये क्षोभक हैं? अर्थात् आत्मसंवित् की अनुभूति में विघ्न है । पंतजलि ने योगदर्शन में व्युत्थान काल में उत्पन्न सिद्धि को समाधि में विघ्न माना है । इस कारिका में प्रोक्त बिन्दु-नाद आदि का निरूपण सृष्टि-क्रम को भी ध्वनित करता है । 'उन्मेष' से सृष्टि होती है । उन्मेष से पूर्व बिन्दु (इच्छा = दृक् शक्ति का प्रसार) फिर शब्दात्मक नाद की उत्पत्ति होती है । वह क्रियाशक्ति रूपवाक् है । इसके अनन्तर रूप का उदय होता है । वह है पदार्थ का दर्शन एवं विचार । फिर उसी में इस अर्थात् अभिलाषा और उपभोग का जन्म होता है । जो रहस्यवेदी अनुभवी महापुरुष हैं वे इनको 'उद्योग', 'अवभास', 'चर्वण' और 'विलापन' कहते हैं । इससे स्वयं आत्म- संवित् का साक्षात्कार हो जाता है ।१ 'नाद' शब्दात्मक, वागाख्य एवं क्रियाशक्तिरूप है । आत्मसाक्षात्कार कैसे होता है? इसका उपाय निम्नांकित है— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥ ४३ ॥ सारांश—इस कारिका में, प्राप्त होने वाली सिद्धियों से योगियों को सावधान किया गया है क्योंकि ये सिद्धियाँ उपलब्धियाँ नहीं प्रत्युत् विघ्नपरम्परायें हैं ।२ योगदर्शन में भी इन्हें उपसर्ग कहा गया है— 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ (पा०यो०सूत्र ३.३७) स्पन्दात्मक शाक्त भूमिका की अनुभूति प्राप्त करना या शिवत्व या 'प्रत्यभिज्ञा' ही साध्य है—न कि निम्नकोटिक सिद्धियाँ ॥ उन्मेष से उपलक्ष्यमाण प्रलीयमान स्थूल सूक्ष्मादिक देहाहंभाव वाले योगी को शीघ्र ही भ्रूमध्य आदि में तारक का प्रकाश रूप 'बिन्दु' (अशेष वेद्य सामान्य प्रकाशात्मा बिन्दु), 'नाद' (सकल वाचक अविभेदशब्दनरूप अनाहत ध्वनि रूप नाद), 'रूप'— अंधकार में भी प्रकाशक तेज 'रस'—रसनाग्र पर लोकोत्तर आस्वाद की प्राप्ति होती है । किन्तु ये सिद्धियाँ क्षोभक हैं और विघ्न हैं— 'ते क्षोभकत्वेन स्पन्दतत्त्वसमासादनविघ्नभूतसंतोषप्रदत्वेन वर्तन्ते ।।' यदाहुः—'ते समाधातुपसर्गौ व्युत्थाने सिद्धयः ।।' (पातं०सू० ३।३७) इस प्रकार उन्मेष निभालन (उन्मेष का अन्तरावलोकन) में उद्यत योगी के लिए भी देहात्माभिमानी के लिए बिन्दु एवं नाद की उक्त सिद्धियाँ मात्र विघ्न हैं । जो योगी अपनी देह प्रमातृत्ता का उन्मेष के यथार्थ स्वरूप में विलय कर देता है वह सशरीरी होने पर भी १. स्पन्दप्रदीपिका । २. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य)।
तृतीयः निष्यन्दः ३३९ परप्रमातृता प्राप्त कर लेता है—'उन्मेषात्मनिस्वभावे देहप्रमातृतां च निमज्जयति, तदा- कारामपि परप्रमातृतां लभत इत्याह ॥'१ भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में कहते हैं— 'अतः अस्माद् उन्मेषाद् अनुशील्यमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः शब्दः, 'रूपम्' अंधकारे दर्शनम्, 'रसः' अमृतास्वादो मुखे, ऐन क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥' भाव यह कि सततानुशीलन किये जाने वाले उन्मेष के द्वारा योगी में अत्यल्पकाल में ही 'बिन्दु' (एक विशिष्ट विलक्षण तेज) 'नाद' (प्रणव या ओंकार नामक अनाहत शब्द), 'रूप' सघन तमिश्रा में भी पदार्थों को देख सकने का सामर्थ्य एवं 'रस' (मुख में अमृतवत मधुर अस्वाद)—एतत् प्रकार अनेक सिद्धियाँ आविर्भूत हो जाती हैं किन्तु ये सिद्धियाँ व्युत्सर्ग हैं क्योंकि ये क्षोभ में डाल देती हैं । विनायक गण साधकों को सिद्धियों के द्वारा अधःपतित भी करते हैं अतः योगसिद्धियों की वाञ्छा स्पृहणीय नहीं है— 'तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः । तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया ॥' (मा०वि०) (शिवसूत्रः २।१०) अपने स्थिर मन को स्पन्दात्मक स्वभाव में नियोजित न करके क्षणिक प्रलोभनों में फँसाना केवल अधःपतन का कारण बनता है क्योंकि सिद्धियाँ— 'प्रसह्य चंचलीत्येव योगिनामपि यन्मनः' (स्व०तं० ४।३११) किन्तु—'यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ (स्व०तं० ४।३१२) कारिकाकार का कथन है कि स्वल्प समय में ही 'बिन्दु', 'नाद', 'रूप' एवं 'रस' नाम्नी सिद्धियाँ व्यक्त हो जाती हैं किन्तु जिस योगी का देहाभिमान पूर्णतः गलित न हुआ हो उनके लिए ये क्षोभकारक हैं । आचार्य भट्टकल्लट कहते हैं—'अतः अस्माद उन्मेषाद् अनुशील्यमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः 'शब्दः', 'रूपम्' अंधकारे दर्शनम्, 'रसः' अमृतास्वादो मुखे, एते क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥ यौगिक सिद्धियाँ—सारांश—योगी उन्मेषानुशीलन के क्षण शीघ्र ही (साधना में स्वल्प कालातिक्रम के अनन्तर ही)— (क) बिन्दु अर्थात् विशेष प्रकार के तेज का साक्षात्कार करने लगता है = आँख (ख) नाद—प्रणव (ॐ) नामक अनाहत ध्वनि का श्रवण करने लगता है 'कान' (ग) रूप—प्रगाढान्धकार में भी पदार्थों को देखने की क्षमता प्राप्त कर लेता है— 'आँख' । १. स्पन्दनिर्णय
३४० स्पन्दकारिका (घ) रस—मुख में अकारण अमृततुल्य स्वादों की अनुभूति करने लगता है 'जीभ' किन्तु देहाभिमानी साधकों को ये सिद्धियाँ पतन के गर्त में ढकेल देती है—उनके क्षोभ का विषय बनती है। 'स्पन्दकारिकाविवृति' में इन सिद्धियों का सविस्तार विवेचन किया गया है जो निम्नानुसार है— (१) बिन्दु = पृथ्वी तत्त्व को धारण करने वाले योगियों को ध्यान की एकाग्रता की प्रखरता के कारण भ्रूमध्य के स्थान पर एक विशेष प्रकार का अत्यन्त प्रखर तेज प्रत्यक्षीकृत होता है। इसे ही 'बिन्दु' या 'बिन्दु-भेदन' (बिन्दु-भेद) कहते हैं। 'बिन्दु', भ्रूमध्यादौ प्रदेशे ध्यानाभ्यासप्रकर्षप्रवर्धनमानोत्तरप्रसादस्तेजोविशेषो, यो बिन्दुभेदाभ्यासाद् धरातत्त्वध्यायिनामभिव्यज्यते ॥१ (२) नाद—आकाशतत्त्वाभ्यासीसाधक एक स्वयंभू अनाहत ध्वनि सुनने लगते हैं। यह ध्वनि प्रखर वेग प्रवाहिता किसी सरिता की उत्तुंग तरंगों की भीषण ध्वनि के समतुल्य होती है और यही ध्वनि शनैः शनैः मधुमत्त भ्रमरों की मधुर झंकृति के समान श्रुतिगोचर होती है—'नादो'—वेगवन्नद्यौधनिर्घोषघनोपक्रमः क्रमसूक्ष्मीभावाभिव्यञ्जमान- मधुमत्तमधुकरध्वनितानुकारी स्वोच्चरितो ध्वनिविशेषो, य व्योमतत्त्वाभ्यासिन शृण्वन्ति।२ (३) रूप—अग्नितत्त्व (तेजस्तत्व) की धारणा करने वाले योगियों को प्रगाढान्ध- कार में भी अदृश्य वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं—'रूप'—सन्तमसाद्यावरणोऽपि सति तत्तददृश्यवस्त्वाकारदर्शने, यत् तेजस्तत्वन्यक्षनिक्षिप्तमतयो निरीक्षन्ते ॥'३ (४) रस—जलतत्त्व की धारणा करने वाले योगी अपने जिह्वा के अग्र भाग में या उसके समीपस्थ लम्बिका पर धारणाभ्यास करते हैं। इस धारणा की सिद्धि होने पर वस्तु को खाये बिना ही योगी को इन स्वादिष्ट पदार्थों के सुमधुर स्वादों की अनुभूति होने लगती है। 'रसो' रसवद्वस्तुनि विरहेऽपि अमृतास्वादो मुखे लोलग्रलम्बिकादिधारणा निरन्तर- भारतत्त्वध्यायिभिर्डपलभ्यते ॥'४ इसी प्रकार की सिद्धियाँ स्पर्शतन्मात्रा एवं गंध की भी हैं किन्तु इनका उल्लेख कारिका-व्याख्या में नहीं किया गया है; यथा 'तन्त्रालोक' में, 'मालिनीविजय', 'विज्ञानभैरव' आदि ग्रन्थों में एवं पतञ्जलि के योगसूत्रों में ऐसी सिद्धियों का सविस्तार वर्णन किया गया है। कारिकाकार ने इस कारिका में मात्र चार तत्त्वों एवं तीन इन्द्रियों से सम्बद्ध (पृथ्वीतत्त्व, आकाशतत्त्व, जलतत्त्व एवं अग्नितत्त्व तथा चक्षुरेन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय एवं रस-नेन्द्रिय से सम्बद्ध) मात्र सिद्धियों का ही उल्लेख किया है अन्य सिद्धियों का नहीं। १-४. स्पन्दकारिकाविवृति।
तृतीयः निष्यन्दः ३४१ कारण यह है कि सिद्धियाँ साधनमार्ग के विघ्न हैं—'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ।' (३।३७)१ स्पन्दशास्त्र के आचार्यों ने इन्हें हेय मानकर इनको कोई महत्त्व नहीं दिया क्योंकि ये सिद्धियाँ स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका की दिव्यानुभूतियों के मार्ग के प्रत्यूह हैं । 'मालिनी वार्तिक' में कहा गया है कि विनायक गण स्वरूपानुसन्धान के यात्रियों को सिद्धियों के विघ्नों की सहायता से आगे यात्रा करने से रोककर उनको पथभ्रष्ट कर देती हैं— 'वासना मात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तम नित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः । तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवांञ्छया ।।' (मालिनीविजय) । आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में सूत्र (२.४) की व्याख्या में कहते हैं कि—ये सिद्धियाँ केवल 'अख्याति' (अज्ञान या महामाया) के समतुल्य हैं और साधक इन्हें प्राप्त करने के बाद मित जगत् की मित उपलब्धि मात्र से ही संतोष करके परोपलब्धि की यात्रा बन्द कर देता है । ये सिद्धियाँ अशुद्ध विद्या तथा किंचिज्ज्ञातृत्वादि भ्रामक विकल्प एवं भ्रम के कारक होने के कारण हेय हैं— 'गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ।। २।४ ।। 'गर्भः अख्यातिर्महामाया' तत्र तदात्मके मितमन्त्रसिद्धिप्रपंच चे यश्चित्तस्य विकासः, तावन्मात्रे प्रपंचे संतोषः, असावेव अविशिष्टा, सर्व जनन साधारणी विद्या, किंचिज्ज्ञत्व- रूपा अशुद्धविद्या, सैव स्वप्नो, भेद निष्ठो विचित्रो विकल्पात्मा भ्रमः तदुक्तं पातञ्जले— 'ते समाधावुपसर्गों व्युत्थाने सिद्धयः ।। (३।३७)'२ महर्षि पतञ्जलि का मत—महर्षि पतञ्जलि का कथन है कि 'ऋतंभरा प्रज्ञा' से मण्डित साधकों को पथभ्रष्ट करने के लिए इन सिद्धियों की अधिष्ठात्री देवियाँ इन्हें प्रलोभनों के चक्रव्यूह में फँसाने के लिए सदैव तत्पर रहती है । 'स्वच्छन्दतन्त्र' में भी इसी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है— (क) प्रसह्य चंचलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । (स्व०तं० ४.३११) किन्तु— (ख) यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिर पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु (स्वं०तं० ४.३१२) सिद्धियों के अनेक प्रकार हैं तथा— (१) अणिमा (२) गरिम (३) लघिमा, (४) महिमा (५) प्राप्ति (६) प्राकाम्य (७) ईशित्व (८) वशित्व तथा—दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूरास्वाद परकायप्रवेश, परचित्तज्ञान, भूचरत्व आदि ।। महर्षि पतञ्जलि सिद्धियों को साधना मार्ग का 'उपसर्ग' मानते हैं— १. योगसूत्र । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (२.४) ।
३४२ स्पन्दकारिका प्रत्येक भाव में स्पन्दात्मक स्वरूप की अनुभूति द्वारा प्रथमाभास— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ।। ४३ ।। जब योगी दिदृक्षा¹ (देखने की इच्छा) के द्वारा ही समस्त पदार्थों को व्याप्त करके दृढ़ रूप में स्थित रहता है तब अधिक कहने से क्या लाभ? (तब तो वह यह) स्वयं अनुभव करेगा ।। ४३ ।।
- सरोजिनी * आभास के दो प्रकार होते हैं—(१) ‘निर्विकल्प’ (२) ‘सविकल्प’ अतः आभास के ‘सविकल्प आभास’ एवं ‘निर्विकल्प आभास’ के रूप में द्विभेदरूप हैं। प्रथमाभास के स्तर पर समस्त भाव सामान्य स्पन्द रूप या चिद्रूप रहते हैं। उनका संवेदन भी विशुद्ध अहं के रूप वाला होता है। सविकल्पक आभास—स्वरूप, देश, काल एवं आकार सभी दृष्टियों से भिन्न होने के कारण इदमात्मक (इदं रूप) तथा विकल्पात्मक होते हैं। आभासों की समष्टि ही तो प्रमेयात्मक जगत् है। जहाँ भावों में भिन्नता होगी (यथा संसार में) वहाँ सविकल्प आभास ही होगा। योगी प्रथमाभास में ही स्वरूप साक्षात्कार करते हैं। अवभोत्स्यते—अनुभव करेगा (अनुभविष्यति) ।। योगियों को जगत् में नानात्मकता दृष्टिगत नहीं होती प्रत्युत् सर्वत्र आत्मा का विकास ही—आत्म प्रसार ही दृष्टिगत होता है जिस पदार्थ को देखने की उत्कण्ठा जाग्रत हुई हो वह पदार्थ वस्तु की अनिश्चित या संदिग्ध दिदृक्षा के समय जो कि अपने को ‘पश्यन्ती वाक्’ के रूप में प्रस्तुत करता है, अपनी आन्तरिक एकता या अभिन्नता में अपने को व्यक्त करता है। उसी प्रकार जब योगी अन्दर लीन हो या उन्मेष की दशा में मग्न हो, शिव से क्षिति पर्यन्त समस्त पदार्थों को व्याप्त करके या अपने सङ्कल्प या निर्णय द्वारा समस्त विश्व को ध्यानावस्था के समय अपने से अभिन्न मानकर स्थित हो और सोचता हो कि ‘मैं सदाशिव की भाँति समस्त विश्व का प्रतिनिधित्व करता हूँ’— तब वह फल जो कि प्रमातृत्ता (Supreme experienceship) में प्रवेश के आनन्द से निर्मित हो और जो समस्त ‘प्रमेयों’ (Knowable) की एकता (Unification) से जागृत किया गया है—अपने द्वारा जान लिया जाएगा या अपनी चेतना द्वारा अनुभूत कर लिया जाएगा। इस विषय में अधिक कहना ही व्यर्थ है।² आचार्य उत्पलदेव आत्मसंवित् के साक्षात्कार के उपायों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि जब पुरुष दिदृक्षु होकर समस्त पदार्थों में व्याप्त होते हुए साधना में अग्रपद होता है तब स्वभाव का अवबोध प्राप्त कर लेता है। यहाँ इस उपदेश का आशय ज्ञातव्य है। १. प्रथमाभास (स्वरूपाभास या निर्विकल्पाभास) में अवस्थित योगी की प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप के साक्षात्कार करने की तीव्रोत्कण्ठा ही है ‘दिदृक्षा’। २. क्षेमराज: ‘स्पन्दनिर्णय’।
तृतीयः निष्यन्दः ३४३ जैसे कोई कौतूहल की वस्तु देखने के लिए सावधान होकर विकासवृत्ति से सजग हो जाता है वैसे ही समस्त पदार्थों के दर्शन की उन्मुखता रूपी वृत्ति से उदयंत्रित होकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। वह स्वयं सर्वज्ञता आदि गुणास्पद अपने स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। यह स्थिति ही 'तत्वार्थचिन्तामणि' में 'रहस्यमुद्रा' कही गई है। 'भोगमोक्षप्रदीपिका' में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है—उन्मेष के बल से उद्यंत्रित होकर अपने स्वरूप में रहना चाहिए। वह योगी आनन्दभूमि में रहकर स्वयं आये हुए विषयों का उपभोग भी करता रहता है। यह आनन्दभूमि अत्यन्त उच्छृंखल एवं परम विकस्वर है किन्तु केवल उन लोगों के लिए जिनकी बुद्धि प्रबुद्ध है। सिद्ध पुरुष सदैव इसी में आनन्दरत रहते हैं। यह परा मुद्रा है। उद्यन्तृताबलेन तु विकासवृत्या स्वरूपगस्तिष्ठेत् । स्वयमुपसृतेन्द्रियार्थानशनन्नानन्दभूमिगो योगी ॥ एषोच्छृंखलरूपा विकस्वरतरा प्रबुद्धबुद्धीनाम् । सिद्धाः स्थिता सदाऽस्यां ह्यानन्दरताः परा च मुद्रैषा ॥ अन्य स्थलों पर भी कहा गया है— 'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विष्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तंभभूतस्तिष्ठन्विश्वाधारएकोऽवभासि ॥' अर्थात् दर्शनादि समस्त शक्तियों को चित्त से उनके विषयों से एक साथ फेंककर 'उनके मध्य में स्वर्ण-स्तंभों के समान स्थिर हो जाओ। वस्तुतः तुम एक ही विश्वाधार हो ॥' इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि—वेश्या नारी के समान चंचल नेत्रादि शक्तियाँ जहाँ तहाँ स्वच्छन्द जाती रहती हैं। उन्हें केवल देखते रहो। इनका अनुगमन मत करो। वस्तुतः तुम सम्पूर्ण विश्व को धारण कर रहे हो और विश्व से पृथक् हो— 'स्वच्छन्दं वा यत्र तत्र व्रजन्तीर्वेशस्त्रीवच्चञ्चला या दृगाद्याः । शक्तीः पश्यन् केवलं नानुगच्छेद्विश्वं बिभ्रद्भासितस्य त्वमन्यः ॥' इस स्थिति में अवस्थान के लिए अगली कारिका (४४) कही गई हैं।१ यदा = जिस काल में। दिदृक्षयेव = साधक देखने की इच्छा से ही। सर्वार्थान् = अखिल प्रमेयों को। व्याप्य = (समस्त प्रमेयों को) व्याप्त करके अर्थात् स्वसंवित् प्रकाश से आच्छा- दित करके। उन्हें अन्तर्लीन करके। अवतिष्ठते = नानात्व के दर्शन की भ्रान्ति को दूर करके एक ही अद्वैततत्त्व में विश्राम करता है (विश्राम्यति) ॥ तदा = तब। उस दशा में (वह उस समय जिन फलों का वहाँ अनुभव करता है) १. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका'।
३४४ स्पन्दकारिका बहुना = (भूयसा) = अत्यधिक मात्रा में । उक्तेन = उस कहे गये फल से, ('उस कहे गये से') ॥ किं = क्या? क्या प्रयोजन? अर्थात् उसका प्रतिपादन करने की इच्छा से हजारों ग्रन्थ भी निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि वह अनुभवगम्य तो है किन्तु वह वचनगोचरातीत है—वाणी से परे है । स्वयं तदवभोत्स्यते = उस फल के स्वसंवेद्य होने के कारण, किसी व्यतिरिक्त साधन की बिना अपेक्षा किये हुए वह स्वयं ही प्राप्त कर लेगा (प्रतिपत्स्यते) ॥ तात्पर्य यह है कि—यदि योगी समस्त भावों को स्वस्वभाव से अव्यतिरिक्त देखने की जिज्ञासा रखता है तो उसे चाहिए कि अपनी इस दिदृक्षा को, अपने अनुभव द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, —सम्पूर्तित करे ॥ वह जिन भावों को देखना चाहता है वे स्वस्वभाव से अभिन्न होकर स्थित हैं—'द्रष्टुमभीष्टाः भावाः स्वस्वभावाभेदेन व्यव- तिष्ठन्ते ।'—क्योंकि योगी की इस तात्विक दिदृक्षा की उत्कण्ठा के समय 'इदन्ता- प्रत्ययात्मक' भावभेद उन्मिषित होते ही नहीं । उस समय (जिस प्रकार कि दिदृक्षावस्था में क्षेत्रज्ञ के साथ भावों का अभेद रहता है) परमात्मस्वभाव के उन्मिषित होने पर समस्त जगद्भावों के साथ दिदृक्षु के साथ जगत् के समस्त भाव भी अभिन्न रूप में स्थित हो जाते हैं 'परमात्मस्वभावात् अखिलजगद्भावानामभेद एव ॥' माया शक्ति से आविर्भूत विकल्परूपी अंधकार के द्वारा सम्यक् ज्ञान से रहित तथा निर्विभाग चिन्मात्रस्वरूप आत्मतत्त्व को प्रमाता एवं प्रमेय के भेद से भिन्न-भिन्न रूप में देखने वाले साधक, दिदृक्षित प्रमेयों के जीवस्वभाव से अभिन्न होने पर भी, उनका अभिन्न रूप में परामर्श कर पाने में असमर्थ रहते हैं ।१ जब वे इस स्तर पर ही असमर्थ रहते हैं तो फिर भला जगद्भावों एवं परमात्मभावों के साथ अपनी अभेदता कैसे स्थापित कर पायेंगे? अतः योगियों को चाहिए कि वे भेद के अंधकार को सूर्य की भाँति नष्ट करते हुए जगद्भावों एवं परमात्मस्वभावों तथा स्वस्वभाव के साथ अखिलभुवन के भावाभासों के साथ अभेदता का परामर्श करते हुए अभेदभाव का साक्षात्कार करने का उदाहरण प्रस्तुत करें ॥ दिदृक्षा क्या है? 'दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा तदवस्थास्थ इव' ।२ आचार्य भट्टकल्लट कहते हैं कि— 'दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा, तदवस्थास्थ इव सर्वान् भावान् यदा व्याप्यावनिष्ठते तदा किं बहुना उक्तेन, स्वयमेव तत्त्वस्वभावम् अवभोत्स्यते ज्ञास्यति ॥'३ उनका कथन है कि—(१) जब योगी समस्त भावों में अपने सत्वस्वरूप (संवित् तत्त्व) की सार्वभौम व्यापकता का साक्षात्कार करने की सामर्थ्य रखकर उनमें अपने सत्स्वरूप के साथ प्रविष्ट होकर उनके स्वरूप को देखने की कामना (दिदृक्षा) करता है १-२. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । ३. स्पन्दसर्वस्व ।
तृतीयः निष्यन्दः ३४५ तब वह स्वयं ही (सहज ही) स्वभावभूत स्पन्द तत्त्व की अनुभूति कर लेता है। (२) किसी भी पदार्थ के विषय में पूर्ण जानकारी पाने हेतु दिदृक्षु, जिज्ञासु एवं अनुसंधित्सु को उस पदार्थ में स्वयं ही स्वस्वरूप के साथ प्रविष्ट हो जाना चाहिए तथा सभी पदार्थों में एक ही स्पन्दतत्त्व की व्यापकता को देख सकने या अनुभव कर सकने की क्षमता का विकास करना चाहिए। तभी वह प्रमेयों का यथार्थ प्रमाता बन पायेगा और उसका तद्विषयक ज्ञान 'प्रमा' बन पायेगा। सारांश यह है कि यदि तुच्छ यौगिक सिद्धियों का त्याग करके योगी विश्वात्मभाव ('अहमिदं' का भाव 'अहं व्याप्तोस्मि सर्वेषु' का भाव) को ग्रहण कर ले तो प्रकृति, महामाया एवं दैवी शक्तियों के समस्त रहस्य अपने आप उद्घाटित हो जाते हैं। शैवदर्शन का आभास-प्रक्रिया—'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' के ज्ञानाधिकार में इसका सविस्तार विवेचन किया गया है। किसी भी भाव के साक्षात्कार हेतु आभासद्वय की भूमिकायें हैं जो निम्न हैं—(१) 'सविकल्पक आभास' (२) 'निर्विकल्पक आभास'। (क) इन्द्रिय एवं भाव का संयोग होने पर प्राथमिक क्षण के 'आभास' जो कि विकल्पों से रहित होते हैं = विकल्पशून्य आभास। (ख) इन्द्रिय एवं भाव का संयोग होने पर आने वाले अगले क्षण जो कि विकल्प-सहित होते हैं = सविकल्पक आभास ॥ 'निर्विकल्पक आभास' विद्युतवत तीव्र गति से कौंध जाता है। इसमें सामान्य स्वरूपसत्ता ही वर्तमान रहती है। इसमें जाति, गुण क्रिया आदि अभीष्ट विशेषताएँ परिलक्षित नहीं होतीं। इसे ही 'निर्विकल्पाभास' 'स्वलक्षणाभास' 'निर्विकल्पाभास' एवं 'स्वरूपाभास' कहा जाता है। सविकल्पक आभास में अनेक आभासों का मिश्रण होता है। 'निर्विकल्पक आभास' यथा 'घट' नामक भाव गोलार्द्ध, चौड़ाई, लम्बाई, वर्ण आदि विकल्प से शून्य है। (सामान्य रूप) ॥ 'सविकल्पक आभास' यथा 'घट' नामक भाव गोलार्ध, चौड़ाई, लम्बाई, व्यास, वर्ण आदि से युक्त हैं। प्रथमाभास के ठीक परवर्ती आने वाला आभास सविकल्पक है। भेद पूर्ण आभासों की सर्जना इसकी विशेषता है। निर्विकल्पक आभास = समस्त भाव सामान्य स्पन्द है। इसकी संवेदना विशुद्ध अहंरूपात्मक है। सविकल्पक आभास के भाव काल, आकार, स्वरूप एवं देश के आधारों पर भिन्नता रखते हैं। यह संवेदना 'इदंरूप' है। समस्त प्रमेय जगत् अधिकांशतः इसी से सम्बद्ध है। जागतिक व्यवहारों के लिए सविकल्पक आभास आवश्यक है। जगत् भेदों, वैचित्र्यों और भिन्नताओं पर आश्रित हैं। मित सिद्धियाँ भी सविकल्पक आभास हैं। प्रथमाभास विश्व के प्रत्येक अणु में चिद्रूप आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति का संकेतक है। ये इन्द्रिय बोध गम्य नहीं है। अतीन्द्रिय बोध एवं प्रातिमज्ञान योगियों में
३४६ स्पन्दकारिका पाया जाता है अतः ऐसी क्षमतासम्पन्न योगी प्रथमाभास के क्षण में ही चित्तत्त्व की सार्वभौम व्यापकता का अनुभव करता है। प्रथमाभास में स्थित योगी का प्रत्येक भाव में स्वरूप साक्षात्कार करने की तीव्रोत्कण्ठा ही 'दिदृक्षा' है। यह योगी को शाक्त भूमिका पर आरूढ़ कर देती है। योगियों को भी नानात्मक, वैचित्र्यपूर्ण एवं भेदात्मक जगत् का बोध होता है किन्तु वे उसके समस्त भेदों, अनेकात्मकताओं एवं भिन्नताओं में भी एकात्मकता का सूत्र अर्थात् अखण्ड स्वरूप भाव का साक्षात्कार करते हैं। उनकी दृष्टि में 'भेदमात्र अभेद का, द्वैतमात्र अद्वैत का तथा अनेकात्मकता मात्र एकात्मकता का विकास मात्र है।' उत्पलदेवाचार्य ने भेद एवं अनेकात्मकता या द्वैत प्रथा को शङ्कराचार्य की भाँति मिथ्या तो नहीं कहा है किन्तु उसे सत्य का आभास माना है—सत्य का विस्तार माना है, परमेश्वर ही माया शक्ति के द्वारा स्वात्मरूप को भेदों में रूपान्तरित करके एक से अनेक हो जाता है— 'प्रकाशात्मनः परमेश्वरस्य मायाशक्त्या स्वात्मरूपं विश्वं भेदेनाभासयते ॥' (प्र०का० वृत्ति १।४९) चिदात्मा ही बाहर एवं भीतर सर्वत्र व्याप्त है अतः एक ही अनेक है और अनेक ही एक है—अनेकात्मकता में एकात्मकता निहित है— 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपदानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ (प्रत्यभिज्ञा का० वृत्ति) प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप की व्यापकता की अनुभूति करने विषयक योगोपदेश— प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोक्य गोचरम् । एकत्रारोपयेत् सर्वं ततोऽन्येन न पीडयते ॥ ४४ ॥ योगी को समस्त इन्द्रिय गम्य जगत् को अपनी ज्ञान-दृष्टि से देखकर सदैव पूर्ण प्रबोध के साथ स्थित रहना चाहिए तथा उसे (इस विधि से) निखिल प्रमेय वर्ग को एक ही तत्त्व में लय कर देना चाहिए। ऐसा करने से (साधक) किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा पीड़ित नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥
- सरोजिनी * सर्वदा = सदैव । जागृतावस्था-स्वप्नावस्था-सुषुप्ति अवस्था एवं संविदादि मध्यान्तपदों में । प्रबुद्धः = 'प्रकर्षेण बुद्धः' अत्यधिक 'जाग्रत होकर । उन्मीलित स्पन्दतत्त्वावष्टंभादिव्यदृष्टि । तिष्ठेत् = स्थित होना चाहिए । सुप्रबुद्धता को प्राप्त करना चाहिए । ज्ञानेन = ज्ञान के द्वारा । बहिर्मुख अवभास द्वारा सर्वं गोचरं = समस्त इन्द्रियगम्य जगत् को । नील सुखादि रूप विषय को एकत्र = एक जगह स्थित । स्रष्टा शङ्करात्मा स्वभाव में ।¹ १. स्पन्दनिर्णय
तृतीयः निष्यन्दः ३४७ सर्वमारोपयेत् = निमीलन-उन्मीलन-दशाओं को अभिन्न रूप में जानना चाहिए। ('पूर्वापर कोट्यवष्टंभ दाढर्यान्मध्यभूमिमपि चिद्रसाश्यानतावरूपतयैव पश्येत् इति' ) ॥ इस प्रकार करने से योगी किसी अन्य व्यतिरिक्त वस्तु से बाधित नहीं होगा क्योंकि वह सभी अपने को ही देखेगा । प्रत्यभिज्ञाकार ने (उ०स्तो० १३।१६) में कहा भी है—१ 'योऽविकल्पमिदमर्थमण्डलं पश्यतीशनिखिलं भवद्वपुः । स्वात्मपक्षपरिपूरिते जगत्यस्यनित्यसुखिनः कुतो भयम्? ॥' योगी को सदैव चेतना के आदि, (प्रारम्भ) मध्य एवं अन्त में, जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति में सदैव सावधान रहना चाहिए । या उसे पूर्ण प्रबोध का आश्रय ग्रहण करना चाहिए । उसे दिव्य दृष्टि (Divine vision) के साथ, स्पन्दतत्त्व के आधार के प्रति जाग्रत रहना चाहिए । यह कैसे संभव हों?—उसे निम्नांकित श्लोक की दृष्टि के साथ चिन्तन-मनन करते हुए जाग्रत रहना चाहिए— २ 'तस्माच्छब्दार्थ चिन्तासु न सावस्था न या शिवः ॥' (२।१४) योगी को इस समग्र ज्ञेय को स्रष्टा शङ्कर से अभिन्न देखते हुए केवल एक यथार्थ स्वरूप में स्थित समझना चाहिए या उसे इसे यथार्थस्वरूप से अभिन्न समझना चाहिए जो कि Involution एवं Evolution दोनों दशाओं में स्थित है । उसे 'मध्य' की दशा को भी चिदानन्द के भौतिकीकरण मूर्तिकरण (Materialiesation of the bliss of concious) के साथ अभिन्न समझना चाहिए । इससे दुःखों का नाश हो जाता है । क्योंकि अपने से परिपूरित जगत् में भला सदाह्लादित योगी को भय या दुःख कैसे हो सकता है? वह तो इस पदार्थान्वित विश्व को परमात्मा का शरीर मानता है । ३ समावेश की प्रक्रिया के विवेचन का परिणाम निकालते हुए ग्रन्थकार उस स्पन्द तत्त्व को यहाँ पर प्रस्तुत करता है जो कि अनेक पदार्थों में विभक्त है । 'स्पन्दतत्त्व' में प्रवेश उसी के लिए संभव हो जाता है जोकि पूर्णतया प्रबुद्ध (Enlightened) है और जो प्रवेश के उपायों पर अविरत ध्यान आकृष्ट किये रहता है । 'उपपादित उपायजातं (Varities of means) परिशीलनतः सततं स्पन्दतत्त्वसमाविष्टं सुप्रबुद्धस्य भवति ॥'४ आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं कि साधन को चाहिए कि वह अपनी शक्तियों का सङ्कोच किये बिना प्रबुद्ध, निर्विकल्प एवं सदा उद्युक्त रहे । ज्ञान के सम्मुख जो भी विषय उपस्थित हो, उसको देखकर संवित् की दीप्ति से ज्ञेय का लोप कर दे, उनको अविभाग में प्रतिष्ठित कर दे, तब उसे दूसरा कोई पीड़ा नहीं पहुँचा सकता । भोगमोक्षप्रदीपिका में कहा गया है—अविभाग-बोध की अग्नि से विभाग को विलुप्त करके वेद्य-पीयूष को पीकर एवं शीघ्र ही संतुत्त, नीरोग एवं एकाकी विचरण करने लगता है । यह क्रमार्थ का सार है और शक्तियों की परधारा भूमिका । उसी की अनुज्ञा से सच्छिष्यों के ज्ञान के लिए इसका वर्णन किया गया है क्योंकि यह परधारा भूमिका निर्विभाग है— १-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय ।
३४८ स्पन्दकारिका अथवा विभागबोधज्वलनेन विलाप्य वेद्यपीयूषम् । पीत्वा तृप्तोविचरन्त्रीरोगो योऽचिरात् सदैकाकी ॥ एतत्क्रममार्थसारं परधाराभूमिका च शक्तीनाम् । तदनुज्ञयाऽत्र कथितं सच्छिष्य विबोधनाय यथा ॥ कहा भी गया है—विभाग के हेतु ये प्रसिद्ध हैं—देश, काल, क्रिया और आकार। जिसमें ये नहीं हैं, उसमें विभाग का कोई कारण ही नहीं है— 'देशकालक्रियाकाराः प्रसिद्धा भागहेतवः । तेन सन्ति पुनर्यस्य विभागस्तस्य किंकृतः ॥' अन्यत्र भी कहा गया है—विषय सहित मन भस्म करना है। ज्ञानाग्नि अपनी दृष्टि से उसे भस्म करती है। उसके भस्म हो जाने पर अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता दोनों समाधि हो जाती है— मनः सविषयं दाह्यं ज्ञानाग्निदर्शनैर्दहेत् । अन्तर्बहिर्मुखश्चैवं समाधिरुपपद्यते ॥ इसके अतिरिक्त भी विद्वानों द्वारा कहा गया है कि— विज्ञान की वाडवाग्नि प्रदीप्त होकर अपनी शक्ति से ज्ञेय विषय रूप समुद्रों को निरन्तर ग्रस्त रहती है। अन्य कोई उसको ग्रस्त करने में समर्थ नहीं है। जल न मिलने से पिपासा संवर्द्धित नहीं होती और बहुत सा जल मिल जाने पर तृप्ति या कृत- कृत्यता नहीं होती । यह ज्ञान ऐसा विलक्षण बड़वानल है विज्ञान वाडवो दीप्तः स्व शक्त्या ज्ञेयतोयधीन् । अजस्रं ग्रसते नान्यस्तद्ग्रासे शक्तिमान् भवेत् । नाऽप्राप्त्या पयसां तृष्णां प्राप्त्या वा भूयसामपि । यस्यास्ति कृतकृत्यत्वं कोऽप्यसौ वडवामुखम् ॥ 'यस्मात्सर्वमयो जीवः' में इस विषय का सयुक्तिक वर्णन किया जा चुका है। तत्त्व का स्वभाव विद्यात्मक ज्ञान स्वरूप है । अतः संपूर्ण ज्ञेय को उससे एक कर देना चाहिए। बस, इस ऐक्य के होते ही दूसरी कलात्मक विकल्परूप शक्तियाँ फिर किसी प्रकार की पीड़ा-बाधा नहीं पहुँचा सकतीं-अर्थात् स्वरूप से प्रच्युत नहीं कर सकतीं । कहा भी गया है— आकाश एक और व्यापक है । दीवार आदि के संयोग से उसमें बाह्य-आभ्यन्तर का भेद प्रतीत होता है । इसी प्रकार पशुपति तत्त्वज्ञ ग्राह्य और ग्राहक को एक ही रूप देखता है । आपके समाधि स्वरूप में विक्षेप्य और विक्षेपक, व्याक्षिप्त और व्याक्षेप्य का कोई भेद नहीं है— एकं व्याप्ति व्योमकुड्यादियोगात्तस्मिन् बाह्याभ्यन्तरत्वं समाधिः । पश्यत्येकं ग्राहक ग्राह्यरूपं व्याक्षिप्ताक्षेप्यतस्त्वत्समाधिः ॥१ १. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३४९ सर्वदा = समस्त अनुभव की दशाओं में । प्रबुद्धस्तिष्ठेत् = प्रतिपादित उपदेशों के अभ्यास से अनिमीलितसम्यक् ज्ञान दृष्टि वाला होकर जाग्रत हुआ स्थित रहता है । किस प्रकार? ज्ञानेन = संवेदन के द्वारा । गोचरं = विषय को । आलोच्य = (परिच्छेद्य) = सत्यासत्य का विवेचन करके । (आलोचन = देखना, परख, गुणदोष विवेचन) । आरोपयेत् = अर्पित करना चाहिए ।। अभिन्न रूप से प्रतिपादित करना चाहिए ततश्च = और उसके द्वारा । समस्त भावों के एक प्रमातृस्वरूपाभेद की प्रतिपत्तिरूप आरोपण से ।। अन्येन = व्यतिरिक्ततापूर्वक अवभासमान प्रमेयों के द्वारा ।। वक्ष्यमाण कलाद्यात्मक भावजात द्वारा । न पीड्यते = पीड़ित नहीं किया जाता । अहंभाव प्रति- पत्तिरूपविनश्वर भाव द्वारा संसार-चक्र में, बन्धन के पाश से बन्धकर तिरस्कृत नहीं होता ।। कदर्थना = पीड़ा, अत्याचार । कदर्थित = तिरस्कृत, घृणित । तुच्छीकृत ।। अत्याचार पीड़ित, तुच्छ। सारांश— प्रमाता जिन-जिन रूपादिक अर्थों को चक्षु आदि के ज्ञान से आलोचना करता है—निश्चय करता है (निश्चिनोति)—वे वे निश्चयावस्था में प्रामातृरूप से अभिन्न होते हैं । निश्चितत्व वस्तु का प्रकाशमानत्व है । वह प्रकाशमान होने के कारण अभिन्न है क्योंकि वह अन्य वस्तु बन ही नहीं सकता क्योंकि प्रकाश व्यतिरिक्त रूप संभव है ही नहीं क्योंकि तब रूप प्रकाशित ही नहीं होगा । रूप की अभिव्यक्ति प्रकाश से ही संभव है न कि प्रकाशाभाव से ।¹ भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में भट्टकल्लट इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं— 'प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरमज्ञेयं परिच्छिद्य । एवमेकत्र तत्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन न पीड्यते ॥² प्रत्येक भाव में आत्मस्वरूप की व्याप्ति की अनुभूति के साधन—योगी को चाहिए कि वह प्रत्येक प्रमेय (ज्ञेय) विषय का विश्लेषण करके (पर्यालोचना करके) ज्ञेय विषय के साक्षात्कार की तीनों कोटियों—आदिकोटि, मध्य कोटि एवं अन्त कोटि—(ग्रहणेच्छा काल, ग्रहण काल एवं विश्रान्ति काल) के स्तरों पर अपनी स्वरूपावस्था में अवस्थित रहे । वह ऐसा करके भावना की शक्ति के द्वारा प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव पर (स्पन्दसत्ता पर) अभिन्न रक्खे । ऐसा करने से साधक को कलासमूह की पीड़ा का शिकार नहीं होना पड़ेगा । भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं³—प्रबुद्धः = १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' । २-३. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।
३५० स्पन्दकारिका असंकुचित शक्तिः सर्वदा = सभी समय। ज्ञानेनालोच्य गोचरम् = ज्ञेय को परिच्छेद सहित आलोचित करके। एकत्रारोपयेत् = तत्त्वसद्भाव में (विद्यात्मक स्वरूप में) सभी को आरोपित करना चाहिए। ततोऽन्येन = वक्ष्यमाण कला समूह के द्वारा। पीड्यते = पीड़ित किया जाता है। प्रबुद्ध व्यक्ति अपने प्रातिभ ज्ञान के द्वारा सृष्टि के प्रत्येक भाववैचित्र्य, पदार्थों की विविधता, अनेकात्मकता एवं भिन्नताओं का इतना सूक्ष्म पर्यवेक्षण करता है कि उसे समस्त भाव-वैचित्र्यों में आत्मा का विकास मात्र ही परिलक्षित होता है और वे किसी भी दशा में अपनी अखण्ड स्वरूप भावना से कभी भेददृष्टि के गर्त में संवलित नही होते। प्रबुद्धः = जागरुक योगी। 'स्पन्दकारिकाविवृति' के अनुसार—'अनिमीलित- सम्यग्ज्ञानदृष्टिः जाग्रदेव'। जो योगी प्रत्येक प्रमेय को देखने के समय उसके प्राणभूत स्वस्वरूप स्पन्द तत्त्व प्रत्यभिज्ञान करने में समर्थ हो और अपने स्वातन्त्र्य की असीमता का अनुभव कर चुका हो वही है 'प्रबुद्ध' ॥ ज्ञेय विषय के साक्षात्कार की प्रक्रिया के चरण—इस प्रक्रिया के तीन चरण हैं— (१) आदि कोटि—किसी ज्ञेय विषय को इन्द्रियों द्वारा गृहीत किये जाने के पूर्व तद्विषयक उनकी जो ग्रहणेच्छा होती है वही है 'आदिकोटि'। (२) मध्य कोटि—बाह्येन्द्रियों के द्वारा स्थूल रूप में ग्रहण काल में माया शक्ति (स्वातन्त्र्य शक्ति) के द्वारा अहरूप से पृथग्भूत रूप में 'इदं' द्वारा वाच्य स्थूल पाँच भौतिक रूप। सांसारिक अवस्था का पंचविषयात्मक संसारभाव। (३) अन्त कोटि—इन्द्रियों के द्वारा गृहीत प्रमेयों के संवेदन के उपरान्त अवबोध में विश्रान्ति काल। 'आदि कोटि' एवं 'अन्त कोटि'—इन कोटियों के स्तर पर अहं विमर्श से युक्त जो प्रमाता का भाव है उसमें 'प्रमेय' के साथ 'प्रमाता' तद्रूपता की अवस्था में (तदात्मकता = तादात्म्य की स्थिति में) अवस्थित रहता है। 'पशु' (संसारी) ज्ञेय पदार्थों के आदि एवं अन्त कोटियों के रूपों की नहीं जान पाते प्रत्युत् वे ज्ञेय पदार्थों के मध्य कोटि वाले स्थूल रूप को यथार्थ स्वरूप मानने का भ्रम पाले रहता है। 'प्रबुद्ध' योगी ज्ञेय पदार्थों के साक्षात्कार की तीनों कोटियों पर ज्ञेय पदार्थों के अपने स्वनिहित एवं नित्यात्मक स्वस्वरूप का साक्षात्कार करता रहता है क्योंकि 'न सावस्था न यः शिवः ॥' स्वस्वरूपानुभूति के उपाय—प्रत्येक अनुभव में स्वरूप का साक्षात्कार होते रहना तथा सभी ज्ञेय पदार्थों में अपनी ही स्थिति की संवेदना होते रहना ही वास्तविक उपलब्धि है। प्रत्येक संवेदना, प्रत्येक ज्ञान, प्रत्येक अनुभव एवं प्रत्येक साक्षात्कार की अवस्था में अपने स्वस्वरूप में ही अवस्थित रहने की प्रक्रिया यह है—अपने तात्विक विमर्श के द्वारा प्रत्येक प्रमेय विषय का स्वरूप-विश्लेषण करके उसके तात्विक आत्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा।
तृतीयः निष्यन्दः ३५१ एक उदाहरण लीजिए। एक स्वर्ण केयूर है। केयूर का आकार, उसकी गोलाई, उसका आयतन, उसका रंग, उसकी मोटाई आदि उसके स्वस्वरूप नहीं है क्योंकि वे परिवर्तित होते रहते हैं किन्तु उसका 'स्वर्णत्व' परिवर्तित नहीं होता। स्वर्णरूपत्व प्राप्त करने के पूर्व भी वह वैचारिक आकार में विद्यमान रहता है अतः स्वर्ण केयूर का अपना नित्य स्वस्वरूप चित्कलात्मक अहंविमर्शयुक्त स्पन्दतत्त्व ही उसका यथार्थ स्वस्वरूप है। स्वस्वरूप विश्लेषण की प्रक्रिया का अनुवर्ती साधक अन्त में इस सत्य का साक्षात्कार कर ही लेता है कि—समग्र विश्व स्वरूप स्पन्द मात्र है। साधक को अपनी प्रत्येक अनुभव दशा में स्वरूपोन्मीलन हेतु निरन्तर आत्म- विमर्श करते रहना चाहिए। अपने सद्धिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय विषय का स्वरूप- विश्लेषण करके उसके यथार्थ स्वरूप की पहचान करते रहना चाहिए। किसी भी पदार्थ का आकार-प्रकार, ऊँचाई-लम्बाई-चौड़ाई गोलाई, रंग, रूप, रूप-रंग आदि विशेषताएँ उस पदार्थ का वास्तविक स्वरूप नहीं है क्योंकि ये बाह्य लक्षण तो परिवर्तनशील, कल्पित एवं नश्वर हैं। इन सबका त्याग करके उस पदार्थ का जो सारतत्त्व शेष रह जाता है वह चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त शेष कुछ नहीं हैं। स्वरूप विश्लेषण की पद्धति द्वारा ही अपना एवं जगत् के स्वरूप का अनुसंधान करना चाहिए क्योंकि तभी स्वस्वरूप की पहचान संभव है। विश्व स्पन्द का ही मूर्त विग्रह है। 'ज्ञानमन्नम्' (शिवसूत्रः २-९) में इसी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। स्वरूपानुप्रवेश होने पर तो— 'मृत्युञ्च कालं च कलाकलापं विकारजातं प्रतिपत्तिसाम्यम् । ऐकात्म्यनानात्म्य वितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥' १ पशु कौन है? शाब्दी प्रभाव से पशुत्व प्राप्ति— शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कला विलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ ४५ ॥ शब्दसमूह से समुद्भूत शाब्दीशक्तियों के भोग का विषय बनकर एवं कलावर्ग के कारण विलुप्त वैभव वाला होकर (वही पति प्रमाता) 'पशुप्रमाता' कहलाने लगता है ॥ ४५ ॥
- सरोजिनी * शब्दराशिसमुत्थस्य = कादिवर्गात्मक शब्द-समूह से समुद्भूता वर्णसमुदाय ही 'शब्दराशि' है। अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त मातृकायें ही शब्दों की जननी हैं क्योंकि समस्त शक्तियाँ वर्णात्मक हैं। शक्तिवर्ग = शक्तिचक्र। ब्राह्मी आदि शक्तियों का समूह। कला = ककारादिक वर्ण। विलुप्त विभवो = नष्ट वैभवों वाला। जिसके निखिल दिव्य ऐश्वर्य नष्ट हो चुके हों वह वैभव हीन जीव (पशु)। पशुः स्मृतः = पशु के रूप में स्मरण किया जाता है। पशु कहा जाता है। २ १. शिवसूत्र : भर्गशिखा। २. स्पन्दप्रदीपिका।
३५२ स्पन्दकारिका पशुपति 'पशु' कैसे बन जाता है? उत्तर—ब्राह्मी आदि देवियों के शक्ति समूह की (ककार आदि वर्णमाला रूप) कलाओं के वैखरी आदि अचेतन शब्दों को उपयोग द्वारा पशुपति 'पशु' बन जाता है । 'पशु' इन निम्नतम स्तर के निष्प्राण शब्दों का उपभोग करता सा प्रतीत तो होता है किन्तु कारिकाकार कहते हैं कि वह उनका भोग नहीं करता प्रत्युत् उनकी भोग्यसामग्री बन जाता है ('भोग्यताम् गतः सन् स पशुः स्मृतः') और इसीलिए वह 'पशु' की श्रेणी में आ जाता है१ क्योंकि—'भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ता- स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः । कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः'२ भोग्य बनने के कारण उसकी महाव्याप्ति एवं वैभव नष्ट हो जाता है जिसके कारण देवकोटि से पशुकोटि में आ जाता है—'कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवो हतमहाव्याप्तिः स्वभावात् प्रच्यावितोऽत एवास्य भोग्यतां गतः सन् पुरुषः पशुरुच्यते अज्ञत्वात् ॥'३ 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है कि—सभी भाव अपनी क्रोड में अपनी अंगचेष्टा के समान हैं । उनका स्वामी 'प्रमाता' 'संवित्' या 'शिव' के नाम से जाना जाता है । किन्तु जब वह उन्हीं का दास बन करके उनके बन्धन-पाश में फंस जाता है तब वह कर्म की कीचड़ से लथपथ होकर 'पशु' कहा जाने लगता है— 'स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः । मायातो भेदिषु क्लेशं कर्मादिक्लुषः पशुः ॥'४ भेदात्मक ग्रंथियों के विभेदन के पूर्व व्यक्ति कर्मात्मैक्य के सम्यक् ज्ञान से रहित होने के कारण (पशुपति होकर भी) 'पशु' ही कहा जाता है— 'भेदग्रन्थिविभेदे हि कर्मात्मैक्यं प्रपद्यते । सोऽविज्ञातः पशुः प्रोक्तो विज्ञातः पतिरेव सः ॥' अर्थात् ग्रंथिभेद के अनन्तर द्वैत नहीं रह जाता अतः इसे जानने वाला व्यक्ति तो 'पशुपति' कहा जाता है किन्तु इसे न जानने वाला पशु कहा जाता है । 'शैवपरिभाषा' में कहा गया है—'तत्र पशुर्नाम देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तो नित्यश्चि- दात्मकोऽनेको विभुरनादिमलावृतोऽस्वतन्त्रः कर्ता च ।' श्रीमत्पराख्य में कहा गया है— 'देहान्योऽनश्वरो व्यापी विभिन्नः समलोऽजडः । स्वकर्मफलभुक्कर्ता किञ्चिज्ज्ञः सेश्वरः पशुः ॥'५ ये पशु तीन प्रकार के हैं—(१) 'सकल' (२) 'प्रलयाकल' (३) 'विज्ञानाकल' 'पशवस्त्रिविधा ज्ञेयाः सकलः प्रलयाकलः । विज्ञानाकल इत्येषां शृणुध्वं लक्षणं क्रमात् ॥' 'सकलपशु' : मलोपरुद्धदृक्शक्तिस्तत्सृत्यैकलादिमान् । भोगाय कर्म सम्बन्धः सकलः परिपठ्यते ॥ १. स्पन्दप्रदीपिका । २. भर्तृहरि—'वैराग्यशतक' । ३. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा । ५. शिवाग्र योगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य—'शैवपरिभाषा' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३५३ 'प्रलयाकल पशु' : प्राग्वन्निरुद्धच्छक्तिः कर्मपाकात्कल्लोज्झितः । कर्मणैव्यत्कला योग्यो यस्स च प्रलयाकलः ॥ विज्ञानाकलपशु : मलोपरुद्धशक्तित्वाच्छून्यकल्पस्वदृक्क्रियः । तृतीयः पठ्यते तन्त्रे नाम्ना विज्ञानकेवलः ॥१ (ज्ञानरूपा कला येषामिति विज्ञानकलाः ॥) 'पाश' क्या है—तत्र पाशत्वं शिवानन्दाभिव्यक्तिविरोधित्वम् । 'पाश' के भेद— 'अयं च पाशः पंचविधः । आणवं तिरोधायकशक्तिर्बिन्दुर्माया कर्म चेति' । (१) आणव (२) तिरोधायक शक्ति (३) बिन्दु (४) माया (५) कर्म । इन्हीं पाशों से आवृत्त जीव 'पशु' कहलाता है । आत्मा की तीन अवस्थायें भी होती हैं—(१) केवलावस्था (२) सकलावस्था (३) शुद्धावस्था ॥ भावों की दृष्टि से देखें तो तीन भाव होते हैं—(१) 'पशुभाव' (२) 'वीरभाव' (३) 'दिव्यभाव' । पशु कौन-कौन?२ 'सर्वे च पशवः सन्ति तलवद्भूतले नराः । तेषां ज्ञानप्रकाशाय वीरभावः प्रकाशितः । वीरभावं सदा प्राप्य क्रमेण देवता भवेत् ॥' (१) जिन जीवों में अविद्या के आवरण के कारण परिपूर्ण अद्वैतज्ञान का किंचिन्मात्र भी प्रकाश नहीं होता, उनमें तमोगुणाधिक्य के कारण जो मानसिक अवस्था उत्पन्न होती है उसे पशुभाव कहते हैं । (२) इन पशुओं के द्विविध भेद हैं—(१) उत्तम (२) अधम । (क) संसार के मोह जाल में अधःपतित होकर बन्धनों से जकड़ा हुआ एवं जो अधम प्राणी होता है वह है—'अधम पशु' । (ख) जो सत्कर्मपरायण, भगवद्विश्वासी जीव है किन्तु द्वैतभावापन्न भी है—वह है 'उत्तम पशु' । द्वैतबुद्धि इन दोनों में समान रूप से विद्यमान रहती है ।३ भट्टकल्लट ने स्पन्दकारिकावृत्ति में इस कारिका की इस प्रकार व्याख्या की है— 'शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादि वर्गात्मकस्य ब्राह्मयादिशक्तिसमूहस्य भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः स्वस्वरूपात् प्रच्य- वितः पशुरुच्यते ॥' अर्थात् अकार से क्षकार पर्यन्त वर्णसमष्टि को शब्दराशि कहते हैं स्वतन्त्र पुरुष (स्वतन्त्र पति प्रमाता) उसी शब्दराशि से समुद्भूत और क वर्ग आदि वर्गों के रूप वाली ब्राह्मी आदि पशु शक्तियों के समूह के वश में रहता है । यह वशवर्तिनी अवस्था ही उसे पशु बनाती है । इन्हीं ब्राह्मी आदि शक्तियों के साथ सम्बद्ध कलाओं ने ही अर्थात् ककार १-२. 'शैवपरिभाषा' । ३. शाक्तदर्शनम् । स्पं० २३
३५४ स्पन्दकारिका आदि स्थूल अक्षर समूह ने पुरुष के वैभव को नष्ट किया है और उसको स्वभाव से च्युत कर दिया है । १ १. शक्ति चक्र : शब्द का प्रयोग शब्दान्तर के साथ अनेक बार प्रयुक्त हुआ है । यथा—(१) 'तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ (का० क्र० १) (२) शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कला विलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (स्पन्द का० ४५) आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसंदोह' में 'शक्ति चक्र' की व्याख्या करते हुए 'शक्ति' को इस प्रकार परिभाषित किया है—'प्रकाशस्यैव भगवतः प्रकाशमानं विश्वम् अस्य शक्तयः, तासां यत् चक्रं संयोजनादिवैचित्र्य-व्यवस्थितः समुदायः स एव विभवः स्फीतता तस्य प्रभवः प्रभवति अस्मात् इति ॥' अर्थात् प्रकाशस्वरूप शिव का जो प्रकाशमान विश्व है उसकी शक्तियाँ ही 'शक्ति चक्र' में शक्ति कही गई है । २ २. 'शक्ति चक्र' का द्वितीय अर्थ—शक्तिचक्र = इन्द्रिय वर्ग । विभव = निज निज विषय—अर्थात् प्रवृत्ति आदि । ३. शक्ति चक्र का अन्य अर्थ—करणेश्वरी चक्र । करण शक्तिवर्ग । विभव = विचित्र सृष्टि संहारादिकारित्व । प्रभव—उसका प्रभव (क्रमार्थविभासनकारित्व कृतमक्रम- महाप्रकाशमय) । करण वर्ग की अपनी प्रवृत्त्यादि तथा करणेश्वरी चक्र का सृष्ट्यादिकारित्वं एवं उसकी यह व्यापार-प्रवृत्ति । ३ ४. शक्ति चक्र का अन्य अर्थ—मन्त्र वर्ग में मुद्रा समूह । विभव—उसका विभव । अर्थात् सिद्धि, साधन एवं समर्थत्व । प्रभव = प्रभवोत्पन्न—उत्पत्ति-विश्रान्ति स्थान ॥ यथा—श्लोक (२।१) (२।२) (तदाक्रम्य बलं मन्त्राः ॥ 'इत्यादि ... निरञ्जनाः' में व्यक्त विचार) । त्रिविध = पर । अपर । परापर: ३ प्रकार की सिद्धियाँ । ४ ५. शक्तिचक्रविभवेन = 'मन्त्रादिसामर्थ्यात्मना प्रभादीप्तिः यस्य साधकस्य चित्तस्य, तत वाति गच्छति प्राप्नोति अधितिष्ठति, गन्धयति च विनाशयति स्वात्मनि विश्रमयति यः तम् ।' = 'शक्तिचक्रविभवं' । ५ ६. शक्तिचक्रविभव—दीक्षानुग्रहध्येय (ध्यातव्य देवतात्मना तादात्म्यम्) समाप- त्यादिना सामर्थ्यसंपदा विभवो यस्य आचार्यस्य उदयः तस्य (प्रभवं) ॥ (दे० अयमेवोदयस्तस्य .... (२।६) । ६ ७. शक्तिचक्रविभवप्रभवं—'शक्तयो ब्राह्मयादिदेव्यो (कादिक्षात तत्तद्वाच-कात्मनः) ब्रह्मादि कारणमाला च, तासां सम्बंधि चक्रं स्वभावशून्यपशुः प्रमातुः अद्वय १. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' । २-६. स्पन्दसंदोह ।
तृतीय: निष्यन्द: ३५५ रूपोर्ध्वभूम्यतारोहणक्षमो भेदमयाधरसरणिसञ्चारचतुरश्च व्यूहः तस्य यो विभवः तथा कार्यकारित्वं तस्य प्रभवं । (दे० 'शब्दराशि... ३।१३) ।१ 'तन्मात्रोदय ... (३।१७) (३।१८) आदि ॥ इस प्रकार के शक्तिचक्र का जो 'विभव' है—अर्थात् 'स्वस्वभावपदापेक्षया अधराधर्भूत्यागेन ऊर्ध्वोर्ध्वारोहणक्षमता ।। (दे० स्वमार्गस्था ज्ञाता ... (३।१६))२ ८. 'शक्तिचक्रं'—खेचरी, गोचरी, दिक्करी, भूचरी आदि—बाह्य-आन्तरताभेद- भिन्ननानायोगिनीगण, तदुपलक्षितवीरव्रातश्च तस्य यो विभवः अतीतानागत ज्ञानाणिमादि- प्राप्ति स्वविषयाभोग समय पूर्णप्रथावाप्त्यानन्तक्षुद्रा सिद्धिलाभम् ऐश्वर्यं, 'प्रभवः' प्राति पूरयति यः स शक्तिचक्रविभवप्रः स च असौ अभो भवति तेन तेन रूपेण इति कृत्वा, तं ॥ (दे० यथेच्छा.... (३।१) कुतः सा .... (३।८) आदि ।३ शक्तिचक्र—'वामेश्वर्याधिष्ठितानि खेचरी-गोचरी-दिक्करी-भूचरी चक्राणि- आन्तराणि, बाह्यानि च ।' वामेश्वरी शक्ति से प्रसारित आन्तर शक्तियाँ—अपर, परापर, पर, अघोर-घोर- घोरतर, खेचरी-गोचरी-भूचरी-दिक्करी रूप चक्र एवं तथाविध वीरव्रत । शक्तिचक्र विभव—'आगमसंप्रदायप्रसिद्धनानादेवतापरमार्थस्य रागद्वेषविकल्पादि प्रत्ययग्रामस्य, तथा देहाश्रित तत्तद्देवता-परमार्थनानाधात्वादिगणस्य, यो विभवः, तत्तदुपनिषत्सिद्धः प्रभावविशेषः, मायामूढान् प्रतिबन्धहेतुत्वं च तस्य उभयस्यापि 'प्रभव' । (दे० गुणादि.... (१।२) 'सेयं क्रियात्मिका शक्ति .... (३।१६)) ।४ बन्धन एवं मोक्ष दोनों का साधन एक ही है—'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका (४८) । 'येन येन निबध्यन्ते जन्तवो रौद्रकर्मणा । सोपायेन तु ते नैव मुच्यन्ते भवबन्धनात् ॥' —मुक्ति किसी नूतन वस्तु की उपलब्धि नहीं है प्रत्युत भूली हुई वस्तु को पुनः याद कर लेना एवं उसे जान लेना ही मुक्ति है एवं न जानना बन्धन का नरक मार्ग है— 'कुलसारमजानन्तो ह्यद्वये निपतन्ति ये । स्वचित्तोत्थविकल्पान्धा निरये निपतन्ति ते ॥' शक्तिचक्र = स्वतन्त्र एवं अद्वय निज महाप्रकाशानुप्रवेशकारी स्वमरीचि निचय । विभव = स्वामोदजृंभात्मक विभव ॥५ शक्तिचक्रविभव = परसंविद्देवतास्फार । विभव = माहात्म्य ।६ प्रभव = शक्ति चक्र के विभव (माहात्म्य) से उत्पन्न ॥ शक्तिचक्र = रश्मिपुञ्ज । विभव = अन्तर्मुख विकास । प्रभव = उदय या अभिव्यक्ति ॥७ १-५. स्पन्दसंदोह। ६-७. स्पन्दनिर्णय।
३५६ स्पन्दकारिका सारांश— 'शक्तिचक्र' शक्तियों का समूह । (शक्तियाँ = वामेश्वरी । खेचरी । दिक्चरी आदि) इन्द्रियों का समूह । मन्त्रों का चक्र । ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि शक्तियों का समुदाय (Wheel of powers) । रामकण्ठाचार्य की व्याख्या— पशु = 'पराधीनसर्ववृत्तित्वेन अनवभासितात्मा पशुः । स = वह प्रतिपादयितव्य आत्मा रूपी ईश्वर जो कि प्रत्यभिज्ञा के अभाव में 'पशु' बन जाता है । स्मृतः = संसाररूपी क्रीड़ा के अनादि होने से (जो 'पशुपति' अनादि काल से वर्तमान काल तक) 'पशु' के रूप में स्मरण किया जाता रहा है । कैसा होकर स्मरण किया जाता है? 'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य कलाविलुप्तविभवो भोग्यतां गतः सन्' । शक्ति = पारमेश्वरी शक्ति । वाक् के रूप में प्रसृत आदि शान्त वर्ण- समुदायात्मक शक्ति ।¹ अम्बा—ज्येष्ठा-रौद्री-वामा-आदि का शक्तिचक्र ।² 'शक्तिचक्र संधाने विश्वसंहारः । (शिवसूत्र ६) में भी 'शक्तिचक्र' शब्द का प्रयोग आया है । पशुत्व और पशु का स्वरूप— 'पशु' के निम्न लक्षण हैं— (१) शब्दराशि से समुत्थित (अकारादि सकारान्त शब्द-समूह से आविर्भूत) ब्राह्मी आदि शब्दाधिष्ठात्रियों (शाब्द शक्तियों) के वशीभूत और उनका क्रीत अनुचर । (२) अकारादिक्षकारान्त कला समूह के द्वारा 'स्वातन्त्र्यशक्ति' रूप वैभव से हीन—पति प्रमाता ही 'पशु' कहलाता है । शब्दराशि—अकारादि क्षकारान्त वर्ण समूह । ('मातृका') । शक्तिवर्ग—कादिवर्गात्मक ब्राह्मी आदि शक्तियों का समूह । ब्राह्मी आदि शक्तियों के साथ सम्बद्ध कलाओं ने (ककारादि क्षकारान्त 'शब्दराशि' ने) 'पति' के स्वातन्त्र्य शक्ति रूप वैभव को नष्ट कर दिया है और उसे उसके स्वस्वभाव से च्युत कर दिया है । भोग्यताम् = शक्ति वर्ग की अधिष्ठात्री देवियों का भोग बना हुआ होना । भोक्ता तो ब्राह्मी आदि (क आदि आठ वर्गों की अधिष्ठात्री देवियाँ) अधिष्ठात्री शक्तियाँ हैं और भोग्य हैं पशु । ये शक्तियाँ निम्नांकित हैं— विमर्शशक्ति के चार रूप = पीठेश्वरी ┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┐ माहेशी ब्राह्मी कौमारी वैष्णवी ऐन्द्री याम्या चामुण्डा योगेशी वर्ण समाम्नाय के अष्टवर्ग—(नव वर्ग)— ┌───┬───┬───┬───┬───┬───┬───┬───┐ अवर्ग कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग क्षवर्ग शब्दराशि = वर्ण समुदाय = वर्णमाला = 'मातृका' १. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (सूत्र ४) ।