स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 440, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३३९ परप्रमातृता प्राप्त कर लेता है—'उन्मेषात्मनिस्वभावे देहप्रमातृतां च निमज्जयति, तदा- कारामपि परप्रमातृतां लभत इत्याह ॥'१ भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में कहते हैं— 'अतः अस्माद् उन्मेषाद् अनुशील्यमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः शब्दः, 'रूपम्' अंधकारे दर्शनम्, 'रसः' अमृतास्वादो मुखे, ऐन क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥' भाव यह कि सततानुशीलन किये जाने वाले उन्मेष के द्वारा योगी में अत्यल्पकाल में ही 'बिन्दु' (एक विशिष्ट विलक्षण तेज) 'नाद' (प्रणव या ओंकार नामक अनाहत शब्द), 'रूप' सघन तमिश्रा में भी पदार्थों को देख सकने का सामर्थ्य एवं 'रस' (मुख में अमृतवत मधुर अस्वाद)—एतत् प्रकार अनेक सिद्धियाँ आविर्भूत हो जाती हैं किन्तु ये सिद्धियाँ व्युत्सर्ग हैं क्योंकि ये क्षोभ में डाल देती हैं । विनायक गण साधकों को सिद्धियों के द्वारा अधःपतित भी करते हैं अतः योगसिद्धियों की वाञ्छा स्पृहणीय नहीं है— 'तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः । तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया ॥' (मा०वि०) (शिवसूत्रः २।१०) अपने स्थिर मन को स्पन्दात्मक स्वभाव में नियोजित न करके क्षणिक प्रलोभनों में फँसाना केवल अधःपतन का कारण बनता है क्योंकि सिद्धियाँ— 'प्रसह्य चंचलीत्येव योगिनामपि यन्मनः' (स्व०तं० ४।३११) किन्तु—'यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ (स्व०तं० ४।३१२) कारिकाकार का कथन है कि स्वल्प समय में ही 'बिन्दु', 'नाद', 'रूप' एवं 'रस' नाम्नी सिद्धियाँ व्यक्त हो जाती हैं किन्तु जिस योगी का देहाभिमान पूर्णतः गलित न हुआ हो उनके लिए ये क्षोभकारक हैं । आचार्य भट्टकल्लट कहते हैं—'अतः अस्माद उन्मेषाद् अनुशील्यमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः 'शब्दः', 'रूपम्' अंधकारे दर्शनम्, 'रसः' अमृतास्वादो मुखे, एते क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥ यौगिक सिद्धियाँ—सारांश—योगी उन्मेषानुशीलन के क्षण शीघ्र ही (साधना में स्वल्प कालातिक्रम के अनन्तर ही)— (क) बिन्दु अर्थात् विशेष प्रकार के तेज का साक्षात्कार करने लगता है = आँख (ख) नाद—प्रणव (ॐ) नामक अनाहत ध्वनि का श्रवण करने लगता है 'कान' (ग) रूप—प्रगाढान्धकार में भी पदार्थों को देखने की क्षमता प्राप्त कर लेता है— 'आँख' । १. स्पन्दनिर्णय