भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441

३४० स्पन्दकारिका (घ) रस—मुख में अकारण अमृततुल्य स्वादों की अनुभूति करने लगता है 'जीभ' किन्तु देहाभिमानी साधकों को ये सिद्धियाँ पतन के गर्त में ढकेल देती है—उनके क्षोभ का विषय बनती है। 'स्पन्दकारिकाविवृति' में इन सिद्धियों का सविस्तार विवेचन किया गया है जो निम्नानुसार है— (१) बिन्दु = पृथ्वी तत्त्व को धारण करने वाले योगियों को ध्यान की एकाग्रता की प्रखरता के कारण भ्रूमध्य के स्थान पर एक विशेष प्रकार का अत्यन्त प्रखर तेज प्रत्यक्षीकृत होता है। इसे ही 'बिन्दु' या 'बिन्दु-भेदन' (बिन्दु-भेद) कहते हैं। 'बिन्दु', भ्रूमध्यादौ प्रदेशे ध्यानाभ्यासप्रकर्षप्रवर्धनमानोत्तरप्रसादस्तेजोविशेषो, यो बिन्दुभेदाभ्यासाद् धरातत्त्वध्यायिनामभिव्यज्यते ॥१ (२) नाद—आकाशतत्त्वाभ्यासीसाधक एक स्वयंभू अनाहत ध्वनि सुनने लगते हैं। यह ध्वनि प्रखर वेग प्रवाहिता किसी सरिता की उत्तुंग तरंगों की भीषण ध्वनि के समतुल्य होती है और यही ध्वनि शनैः शनैः मधुमत्त भ्रमरों की मधुर झंकृति के समान श्रुतिगोचर होती है—'नादो'—वेगवन्नद्यौधनिर्घोषघनोपक्रमः क्रमसूक्ष्मीभावाभिव्यञ्जमान- मधुमत्तमधुकरध्वनितानुकारी स्वोच्चरितो ध्वनिविशेषो, य व्योमतत्त्वाभ्यासिन शृण्वन्ति।२ (३) रूप—अग्नितत्त्व (तेजस्तत्व) की धारणा करने वाले योगियों को प्रगाढान्ध- कार में भी अदृश्य वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं—'रूप'—सन्तमसाद्यावरणोऽपि सति तत्तददृश्यवस्त्वाकारदर्शने, यत् तेजस्तत्वन्यक्षनिक्षिप्तमतयो निरीक्षन्ते ॥'३ (४) रस—जलतत्त्व की धारणा करने वाले योगी अपने जिह्वा के अग्र भाग में या उसके समीपस्थ लम्बिका पर धारणाभ्यास करते हैं। इस धारणा की सिद्धि होने पर वस्तु को खाये बिना ही योगी को इन स्वादिष्ट पदार्थों के सुमधुर स्वादों की अनुभूति होने लगती है। 'रसो' रसवद्वस्तुनि विरहेऽपि अमृतास्वादो मुखे लोलग्रलम्बिकादिधारणा निरन्तर- भारतत्त्वध्यायिभिर्डपलभ्यते ॥'४ इसी प्रकार की सिद्धियाँ स्पर्शतन्मात्रा एवं गंध की भी हैं किन्तु इनका उल्लेख कारिका-व्याख्या में नहीं किया गया है; यथा 'तन्त्रालोक' में, 'मालिनीविजय', 'विज्ञानभैरव' आदि ग्रन्थों में एवं पतञ्जलि के योगसूत्रों में ऐसी सिद्धियों का सविस्तार वर्णन किया गया है। कारिकाकार ने इस कारिका में मात्र चार तत्त्वों एवं तीन इन्द्रियों से सम्बद्ध (पृथ्वीतत्त्व, आकाशतत्त्व, जलतत्त्व एवं अग्नितत्त्व तथा चक्षुरेन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय एवं रस-नेन्द्रिय से सम्बद्ध) मात्र सिद्धियों का ही उल्लेख किया है अन्य सिद्धियों का नहीं। १-४. स्पन्दकारिकाविवृति।

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक) · पृष्ठ 441, कुल 519 में से · BharatKosha