स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३४१ कारण यह है कि सिद्धियाँ साधनमार्ग के विघ्न हैं—'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ।' (३।३७)१ स्पन्दशास्त्र के आचार्यों ने इन्हें हेय मानकर इनको कोई महत्त्व नहीं दिया क्योंकि ये सिद्धियाँ स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका की दिव्यानुभूतियों के मार्ग के प्रत्यूह हैं । 'मालिनी वार्तिक' में कहा गया है कि विनायक गण स्वरूपानुसन्धान के यात्रियों को सिद्धियों के विघ्नों की सहायता से आगे यात्रा करने से रोककर उनको पथभ्रष्ट कर देती हैं— 'वासना मात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तम नित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः । तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवांञ्छया ।।' (मालिनीविजय) । आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में सूत्र (२.४) की व्याख्या में कहते हैं कि—ये सिद्धियाँ केवल 'अख्याति' (अज्ञान या महामाया) के समतुल्य हैं और साधक इन्हें प्राप्त करने के बाद मित जगत् की मित उपलब्धि मात्र से ही संतोष करके परोपलब्धि की यात्रा बन्द कर देता है । ये सिद्धियाँ अशुद्ध विद्या तथा किंचिज्ज्ञातृत्वादि भ्रामक विकल्प एवं भ्रम के कारक होने के कारण हेय हैं— 'गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ।। २।४ ।। 'गर्भः अख्यातिर्महामाया' तत्र तदात्मके मितमन्त्रसिद्धिप्रपंच चे यश्चित्तस्य विकासः, तावन्मात्रे प्रपंचे संतोषः, असावेव अविशिष्टा, सर्व जनन साधारणी विद्या, किंचिज्ज्ञत्व- रूपा अशुद्धविद्या, सैव स्वप्नो, भेद निष्ठो विचित्रो विकल्पात्मा भ्रमः तदुक्तं पातञ्जले— 'ते समाधावुपसर्गों व्युत्थाने सिद्धयः ।। (३।३७)'२ महर्षि पतञ्जलि का मत—महर्षि पतञ्जलि का कथन है कि 'ऋतंभरा प्रज्ञा' से मण्डित साधकों को पथभ्रष्ट करने के लिए इन सिद्धियों की अधिष्ठात्री देवियाँ इन्हें प्रलोभनों के चक्रव्यूह में फँसाने के लिए सदैव तत्पर रहती है । 'स्वच्छन्दतन्त्र' में भी इसी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है— (क) प्रसह्य चंचलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । (स्व०तं० ४.३११) किन्तु— (ख) यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिर पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु (स्वं०तं० ४.३१२) सिद्धियों के अनेक प्रकार हैं तथा— (१) अणिमा (२) गरिम (३) लघिमा, (४) महिमा (५) प्राप्ति (६) प्राकाम्य (७) ईशित्व (८) वशित्व तथा—दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूरास्वाद परकायप्रवेश, परचित्तज्ञान, भूचरत्व आदि ।। महर्षि पतञ्जलि सिद्धियों को साधना मार्ग का 'उपसर्ग' मानते हैं— १. योगसूत्र । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (२.४) ।