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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

३४२ स्पन्दकारिका प्रत्येक भाव में स्पन्दात्मक स्वरूप की अनुभूति द्वारा प्रथमाभास— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ।। ४३ ।। जब योगी दिदृक्षा¹ (देखने की इच्छा) के द्वारा ही समस्त पदार्थों को व्याप्त करके दृढ़ रूप में स्थित रहता है तब अधिक कहने से क्या लाभ? (तब तो वह यह) स्वयं अनुभव करेगा ।। ४३ ।।

  • सरोजिनी * आभास के दो प्रकार होते हैं—(१) ‘निर्विकल्प’ (२) ‘सविकल्प’ अतः आभास के ‘सविकल्प आभास’ एवं ‘निर्विकल्प आभास’ के रूप में द्विभेदरूप हैं। प्रथमाभास के स्तर पर समस्त भाव सामान्य स्पन्द रूप या चिद्रूप रहते हैं। उनका संवेदन भी विशुद्ध अहं के रूप वाला होता है। सविकल्पक आभास—स्वरूप, देश, काल एवं आकार सभी दृष्टियों से भिन्न होने के कारण इदमात्मक (इदं रूप) तथा विकल्पात्मक होते हैं। आभासों की समष्टि ही तो प्रमेयात्मक जगत् है। जहाँ भावों में भिन्नता होगी (यथा संसार में) वहाँ सविकल्प आभास ही होगा। योगी प्रथमाभास में ही स्वरूप साक्षात्कार करते हैं। अवभोत्स्यते—अनुभव करेगा (अनुभविष्यति) ।। योगियों को जगत् में नानात्मकता दृष्टिगत नहीं होती प्रत्युत् सर्वत्र आत्मा का विकास ही—आत्म प्रसार ही दृष्टिगत होता है जिस पदार्थ को देखने की उत्कण्ठा जाग्रत हुई हो वह पदार्थ वस्तु की अनिश्चित या संदिग्ध दिदृक्षा के समय जो कि अपने को ‘पश्यन्ती वाक्’ के रूप में प्रस्तुत करता है, अपनी आन्तरिक एकता या अभिन्नता में अपने को व्यक्त करता है। उसी प्रकार जब योगी अन्दर लीन हो या उन्मेष की दशा में मग्न हो, शिव से क्षिति पर्यन्त समस्त पदार्थों को व्याप्त करके या अपने सङ्कल्प या निर्णय द्वारा समस्त विश्व को ध्यानावस्था के समय अपने से अभिन्न मानकर स्थित हो और सोचता हो कि ‘मैं सदाशिव की भाँति समस्त विश्व का प्रतिनिधित्व करता हूँ’— तब वह फल जो कि प्रमातृत्ता (Supreme experienceship) में प्रवेश के आनन्द से निर्मित हो और जो समस्त ‘प्रमेयों’ (Knowable) की एकता (Unification) से जागृत किया गया है—अपने द्वारा जान लिया जाएगा या अपनी चेतना द्वारा अनुभूत कर लिया जाएगा। इस विषय में अधिक कहना ही व्यर्थ है।² आचार्य उत्पलदेव आत्मसंवित् के साक्षात्कार के उपायों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि जब पुरुष दिदृक्षु होकर समस्त पदार्थों में व्याप्त होते हुए साधना में अग्रपद होता है तब स्वभाव का अवबोध प्राप्त कर लेता है। यहाँ इस उपदेश का आशय ज्ञातव्य है। १. प्रथमाभास (स्वरूपाभास या निर्विकल्पाभास) में अवस्थित योगी की प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप के साक्षात्कार करने की तीव्रोत्कण्ठा ही है ‘दिदृक्षा’। २. क्षेमराज: ‘स्पन्दनिर्णय’।