स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३४३ जैसे कोई कौतूहल की वस्तु देखने के लिए सावधान होकर विकासवृत्ति से सजग हो जाता है वैसे ही समस्त पदार्थों के दर्शन की उन्मुखता रूपी वृत्ति से उदयंत्रित होकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। वह स्वयं सर्वज्ञता आदि गुणास्पद अपने स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। यह स्थिति ही 'तत्वार्थचिन्तामणि' में 'रहस्यमुद्रा' कही गई है। 'भोगमोक्षप्रदीपिका' में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है—उन्मेष के बल से उद्यंत्रित होकर अपने स्वरूप में रहना चाहिए। वह योगी आनन्दभूमि में रहकर स्वयं आये हुए विषयों का उपभोग भी करता रहता है। यह आनन्दभूमि अत्यन्त उच्छृंखल एवं परम विकस्वर है किन्तु केवल उन लोगों के लिए जिनकी बुद्धि प्रबुद्ध है। सिद्ध पुरुष सदैव इसी में आनन्दरत रहते हैं। यह परा मुद्रा है। उद्यन्तृताबलेन तु विकासवृत्या स्वरूपगस्तिष्ठेत् । स्वयमुपसृतेन्द्रियार्थानशनन्नानन्दभूमिगो योगी ॥ एषोच्छृंखलरूपा विकस्वरतरा प्रबुद्धबुद्धीनाम् । सिद्धाः स्थिता सदाऽस्यां ह्यानन्दरताः परा च मुद्रैषा ॥ अन्य स्थलों पर भी कहा गया है— 'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विष्वक् । क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तंभभूतस्तिष्ठन्विश्वाधारएकोऽवभासि ॥' अर्थात् दर्शनादि समस्त शक्तियों को चित्त से उनके विषयों से एक साथ फेंककर 'उनके मध्य में स्वर्ण-स्तंभों के समान स्थिर हो जाओ। वस्तुतः तुम एक ही विश्वाधार हो ॥' इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि—वेश्या नारी के समान चंचल नेत्रादि शक्तियाँ जहाँ तहाँ स्वच्छन्द जाती रहती हैं। उन्हें केवल देखते रहो। इनका अनुगमन मत करो। वस्तुतः तुम सम्पूर्ण विश्व को धारण कर रहे हो और विश्व से पृथक् हो— 'स्वच्छन्दं वा यत्र तत्र व्रजन्तीर्वेशस्त्रीवच्चञ्चला या दृगाद्याः । शक्तीः पश्यन् केवलं नानुगच्छेद्विश्वं बिभ्रद्भासितस्य त्वमन्यः ॥' इस स्थिति में अवस्थान के लिए अगली कारिका (४४) कही गई हैं।१ यदा = जिस काल में। दिदृक्षयेव = साधक देखने की इच्छा से ही। सर्वार्थान् = अखिल प्रमेयों को। व्याप्य = (समस्त प्रमेयों को) व्याप्त करके अर्थात् स्वसंवित् प्रकाश से आच्छा- दित करके। उन्हें अन्तर्लीन करके। अवतिष्ठते = नानात्व के दर्शन की भ्रान्ति को दूर करके एक ही अद्वैततत्त्व में विश्राम करता है (विश्राम्यति) ॥ तदा = तब। उस दशा में (वह उस समय जिन फलों का वहाँ अनुभव करता है) १. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका'।