स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ स्पन्दकारिका बहुना = (भूयसा) = अत्यधिक मात्रा में । उक्तेन = उस कहे गये फल से, ('उस कहे गये से') ॥ किं = क्या? क्या प्रयोजन? अर्थात् उसका प्रतिपादन करने की इच्छा से हजारों ग्रन्थ भी निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि वह अनुभवगम्य तो है किन्तु वह वचनगोचरातीत है—वाणी से परे है । स्वयं तदवभोत्स्यते = उस फल के स्वसंवेद्य होने के कारण, किसी व्यतिरिक्त साधन की बिना अपेक्षा किये हुए वह स्वयं ही प्राप्त कर लेगा (प्रतिपत्स्यते) ॥ तात्पर्य यह है कि—यदि योगी समस्त भावों को स्वस्वभाव से अव्यतिरिक्त देखने की जिज्ञासा रखता है तो उसे चाहिए कि अपनी इस दिदृक्षा को, अपने अनुभव द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, —सम्पूर्तित करे ॥ वह जिन भावों को देखना चाहता है वे स्वस्वभाव से अभिन्न होकर स्थित हैं—'द्रष्टुमभीष्टाः भावाः स्वस्वभावाभेदेन व्यव- तिष्ठन्ते ।'—क्योंकि योगी की इस तात्विक दिदृक्षा की उत्कण्ठा के समय 'इदन्ता- प्रत्ययात्मक' भावभेद उन्मिषित होते ही नहीं । उस समय (जिस प्रकार कि दिदृक्षावस्था में क्षेत्रज्ञ के साथ भावों का अभेद रहता है) परमात्मस्वभाव के उन्मिषित होने पर समस्त जगद्भावों के साथ दिदृक्षु के साथ जगत् के समस्त भाव भी अभिन्न रूप में स्थित हो जाते हैं 'परमात्मस्वभावात् अखिलजगद्भावानामभेद एव ॥' माया शक्ति से आविर्भूत विकल्परूपी अंधकार के द्वारा सम्यक् ज्ञान से रहित तथा निर्विभाग चिन्मात्रस्वरूप आत्मतत्त्व को प्रमाता एवं प्रमेय के भेद से भिन्न-भिन्न रूप में देखने वाले साधक, दिदृक्षित प्रमेयों के जीवस्वभाव से अभिन्न होने पर भी, उनका अभिन्न रूप में परामर्श कर पाने में असमर्थ रहते हैं ।१ जब वे इस स्तर पर ही असमर्थ रहते हैं तो फिर भला जगद्भावों एवं परमात्मभावों के साथ अपनी अभेदता कैसे स्थापित कर पायेंगे? अतः योगियों को चाहिए कि वे भेद के अंधकार को सूर्य की भाँति नष्ट करते हुए जगद्भावों एवं परमात्मस्वभावों तथा स्वस्वभाव के साथ अखिलभुवन के भावाभासों के साथ अभेदता का परामर्श करते हुए अभेदभाव का साक्षात्कार करने का उदाहरण प्रस्तुत करें ॥ दिदृक्षा क्या है? 'दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा तदवस्थास्थ इव' ।२ आचार्य भट्टकल्लट कहते हैं कि— 'दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा, तदवस्थास्थ इव सर्वान् भावान् यदा व्याप्यावनिष्ठते तदा किं बहुना उक्तेन, स्वयमेव तत्त्वस्वभावम् अवभोत्स्यते ज्ञास्यति ॥'३ उनका कथन है कि—(१) जब योगी समस्त भावों में अपने सत्वस्वरूप (संवित् तत्त्व) की सार्वभौम व्यापकता का साक्षात्कार करने की सामर्थ्य रखकर उनमें अपने सत्स्वरूप के साथ प्रविष्ट होकर उनके स्वरूप को देखने की कामना (दिदृक्षा) करता है १-२. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । ३. स्पन्दसर्वस्व ।