भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 454

तृतीयः निष्यन्दः ३५३ 'प्रलयाकल पशु' : प्राग्वन्निरुद्धच्छक्तिः कर्मपाकात्कल्लोज्झितः । कर्मणैव्यत्कला योग्यो यस्स च प्रलयाकलः ॥ विज्ञानाकलपशु : मलोपरुद्धशक्तित्वाच्छून्यकल्पस्वदृक्क्रियः । तृतीयः पठ्यते तन्त्रे नाम्ना विज्ञानकेवलः ॥१ (ज्ञानरूपा कला येषामिति विज्ञानकलाः ॥) 'पाश' क्या है—तत्र पाशत्वं शिवानन्दाभिव्यक्तिविरोधित्वम् । 'पाश' के भेद— 'अयं च पाशः पंचविधः । आणवं तिरोधायकशक्तिर्बिन्दुर्माया कर्म चेति' । (१) आणव (२) तिरोधायक शक्ति (३) बिन्दु (४) माया (५) कर्म । इन्हीं पाशों से आवृत्त जीव 'पशु' कहलाता है । आत्मा की तीन अवस्थायें भी होती हैं—(१) केवलावस्था (२) सकलावस्था (३) शुद्धावस्था ॥ भावों की दृष्टि से देखें तो तीन भाव होते हैं—(१) 'पशुभाव' (२) 'वीरभाव' (३) 'दिव्यभाव' । पशु कौन-कौन?२ 'सर्वे च पशवः सन्ति तलवद्भूतले नराः । तेषां ज्ञानप्रकाशाय वीरभावः प्रकाशितः । वीरभावं सदा प्राप्य क्रमेण देवता भवेत् ॥' (१) जिन जीवों में अविद्या के आवरण के कारण परिपूर्ण अद्वैतज्ञान का किंचिन्मात्र भी प्रकाश नहीं होता, उनमें तमोगुणाधिक्य के कारण जो मानसिक अवस्था उत्पन्न होती है उसे पशुभाव कहते हैं । (२) इन पशुओं के द्विविध भेद हैं—(१) उत्तम (२) अधम । (क) संसार के मोह जाल में अधःपतित होकर बन्धनों से जकड़ा हुआ एवं जो अधम प्राणी होता है वह है—'अधम पशु' । (ख) जो सत्कर्मपरायण, भगवद्विश्वासी जीव है किन्तु द्वैतभावापन्न भी है—वह है 'उत्तम पशु' । द्वैतबुद्धि इन दोनों में समान रूप से विद्यमान रहती है ।३ भट्टकल्लट ने स्पन्दकारिकावृत्ति में इस कारिका की इस प्रकार व्याख्या की है— 'शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादि वर्गात्मकस्य ब्राह्मयादिशक्तिसमूहस्य भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः स्वस्वरूपात् प्रच्य- वितः पशुरुच्यते ॥' अर्थात् अकार से क्षकार पर्यन्त वर्णसमष्टि को शब्दराशि कहते हैं स्वतन्त्र पुरुष (स्वतन्त्र पति प्रमाता) उसी शब्दराशि से समुद्भूत और क वर्ग आदि वर्गों के रूप वाली ब्राह्मी आदि पशु शक्तियों के समूह के वश में रहता है । यह वशवर्तिनी अवस्था ही उसे पशु बनाती है । इन्हीं ब्राह्मी आदि शक्तियों के साथ सम्बद्ध कलाओं ने ही अर्थात् ककार १-२. 'शैवपरिभाषा' । ३. शाक्तदर्शनम् । स्पं० २३

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक) · पृष्ठ 454, कुल 519 में से · BharatKosha