भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

३५२ स्पन्दकारिका पशुपति 'पशु' कैसे बन जाता है? उत्तर—ब्राह्मी आदि देवियों के शक्ति समूह की (ककार आदि वर्णमाला रूप) कलाओं के वैखरी आदि अचेतन शब्दों को उपयोग द्वारा पशुपति 'पशु' बन जाता है । 'पशु' इन निम्नतम स्तर के निष्प्राण शब्दों का उपभोग करता सा प्रतीत तो होता है किन्तु कारिकाकार कहते हैं कि वह उनका भोग नहीं करता प्रत्युत् उनकी भोग्यसामग्री बन जाता है ('भोग्यताम् गतः सन् स पशुः स्मृतः') और इसीलिए वह 'पशु' की श्रेणी में आ जाता है१ क्योंकि—'भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ता- स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः । कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः'२ भोग्य बनने के कारण उसकी महाव्याप्ति एवं वैभव नष्ट हो जाता है जिसके कारण देवकोटि से पशुकोटि में आ जाता है—'कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवो हतमहाव्याप्तिः स्वभावात् प्रच्यावितोऽत एवास्य भोग्यतां गतः सन् पुरुषः पशुरुच्यते अज्ञत्वात् ॥'३ 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है कि—सभी भाव अपनी क्रोड में अपनी अंगचेष्टा के समान हैं । उनका स्वामी 'प्रमाता' 'संवित्' या 'शिव' के नाम से जाना जाता है । किन्तु जब वह उन्हीं का दास बन करके उनके बन्धन-पाश में फंस जाता है तब वह कर्म की कीचड़ से लथपथ होकर 'पशु' कहा जाने लगता है— 'स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः । मायातो भेदिषु क्लेशं कर्मादिक्लुषः पशुः ॥'४ भेदात्मक ग्रंथियों के विभेदन के पूर्व व्यक्ति कर्मात्मैक्य के सम्यक् ज्ञान से रहित होने के कारण (पशुपति होकर भी) 'पशु' ही कहा जाता है— 'भेदग्रन्थिविभेदे हि कर्मात्मैक्यं प्रपद्यते । सोऽविज्ञातः पशुः प्रोक्तो विज्ञातः पतिरेव सः ॥' अर्थात् ग्रंथिभेद के अनन्तर द्वैत नहीं रह जाता अतः इसे जानने वाला व्यक्ति तो 'पशुपति' कहा जाता है किन्तु इसे न जानने वाला पशु कहा जाता है । 'शैवपरिभाषा' में कहा गया है—'तत्र पशुर्नाम देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तो नित्यश्चि- दात्मकोऽनेको विभुरनादिमलावृतोऽस्वतन्त्रः कर्ता च ।' श्रीमत्पराख्य में कहा गया है— 'देहान्योऽनश्वरो व्यापी विभिन्नः समलोऽजडः । स्वकर्मफलभुक्कर्ता किञ्चिज्ज्ञः सेश्वरः पशुः ॥'५ ये पशु तीन प्रकार के हैं—(१) 'सकल' (२) 'प्रलयाकल' (३) 'विज्ञानाकल' 'पशवस्त्रिविधा ज्ञेयाः सकलः प्रलयाकलः । विज्ञानाकल इत्येषां शृणुध्वं लक्षणं क्रमात् ॥' 'सकलपशु' : मलोपरुद्धदृक्शक्तिस्तत्सृत्यैकलादिमान् । भोगाय कर्म सम्बन्धः सकलः परिपठ्यते ॥ १. स्पन्दप्रदीपिका । २. भर्तृहरि—'वैराग्यशतक' । ३. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा । ५. शिवाग्र योगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य—'शैवपरिभाषा' ।