भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 452

तृतीयः निष्यन्दः ३५१ एक उदाहरण लीजिए। एक स्वर्ण केयूर है। केयूर का आकार, उसकी गोलाई, उसका आयतन, उसका रंग, उसकी मोटाई आदि उसके स्वस्वरूप नहीं है क्योंकि वे परिवर्तित होते रहते हैं किन्तु उसका 'स्वर्णत्व' परिवर्तित नहीं होता। स्वर्णरूपत्व प्राप्त करने के पूर्व भी वह वैचारिक आकार में विद्यमान रहता है अतः स्वर्ण केयूर का अपना नित्य स्वस्वरूप चित्कलात्मक अहंविमर्शयुक्त स्पन्दतत्त्व ही उसका यथार्थ स्वस्वरूप है। स्वस्वरूप विश्लेषण की प्रक्रिया का अनुवर्ती साधक अन्त में इस सत्य का साक्षात्कार कर ही लेता है कि—समग्र विश्व स्वरूप स्पन्द मात्र है। साधक को अपनी प्रत्येक अनुभव दशा में स्वरूपोन्मीलन हेतु निरन्तर आत्म- विमर्श करते रहना चाहिए। अपने सद्धिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय विषय का स्वरूप- विश्लेषण करके उसके यथार्थ स्वरूप की पहचान करते रहना चाहिए। किसी भी पदार्थ का आकार-प्रकार, ऊँचाई-लम्बाई-चौड़ाई गोलाई, रंग, रूप, रूप-रंग आदि विशेषताएँ उस पदार्थ का वास्तविक स्वरूप नहीं है क्योंकि ये बाह्य लक्षण तो परिवर्तनशील, कल्पित एवं नश्वर हैं। इन सबका त्याग करके उस पदार्थ का जो सारतत्त्व शेष रह जाता है वह चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त शेष कुछ नहीं हैं। स्वरूप विश्लेषण की पद्धति द्वारा ही अपना एवं जगत् के स्वरूप का अनुसंधान करना चाहिए क्योंकि तभी स्वस्वरूप की पहचान संभव है। विश्व स्पन्द का ही मूर्त विग्रह है। 'ज्ञानमन्नम्' (शिवसूत्रः २-९) में इसी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। स्वरूपानुप्रवेश होने पर तो— 'मृत्युञ्च कालं च कलाकलापं विकारजातं प्रतिपत्तिसाम्यम् । ऐकात्म्यनानात्म्य वितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥' १ पशु कौन है? शाब्दी प्रभाव से पशुत्व प्राप्ति— शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कला विलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ ४५ ॥ शब्दसमूह से समुद्भूत शाब्दीशक्तियों के भोग का विषय बनकर एवं कलावर्ग के कारण विलुप्त वैभव वाला होकर (वही पति प्रमाता) 'पशुप्रमाता' कहलाने लगता है ॥ ४५ ॥

  • सरोजिनी * शब्दराशिसमुत्थस्य = कादिवर्गात्मक शब्द-समूह से समुद्भूता वर्णसमुदाय ही 'शब्दराशि' है। अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त मातृकायें ही शब्दों की जननी हैं क्योंकि समस्त शक्तियाँ वर्णात्मक हैं। शक्तिवर्ग = शक्तिचक्र। ब्राह्मी आदि शक्तियों का समूह। कला = ककारादिक वर्ण। विलुप्त विभवो = नष्ट वैभवों वाला। जिसके निखिल दिव्य ऐश्वर्य नष्ट हो चुके हों वह वैभव हीन जीव (पशु)। पशुः स्मृतः = पशु के रूप में स्मरण किया जाता है। पशु कहा जाता है। २ १. शिवसूत्र : भर्गशिखा। २. स्पन्दप्रदीपिका।
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