भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 451

३५० स्पन्दकारिका असंकुचित शक्तिः सर्वदा = सभी समय। ज्ञानेनालोच्य गोचरम् = ज्ञेय को परिच्छेद सहित आलोचित करके। एकत्रारोपयेत् = तत्त्वसद्भाव में (विद्यात्मक स्वरूप में) सभी को आरोपित करना चाहिए। ततोऽन्येन = वक्ष्यमाण कला समूह के द्वारा। पीड्यते = पीड़ित किया जाता है। प्रबुद्ध व्यक्ति अपने प्रातिभ ज्ञान के द्वारा सृष्टि के प्रत्येक भाववैचित्र्य, पदार्थों की विविधता, अनेकात्मकता एवं भिन्नताओं का इतना सूक्ष्म पर्यवेक्षण करता है कि उसे समस्त भाव-वैचित्र्यों में आत्मा का विकास मात्र ही परिलक्षित होता है और वे किसी भी दशा में अपनी अखण्ड स्वरूप भावना से कभी भेददृष्टि के गर्त में संवलित नही होते। प्रबुद्धः = जागरुक योगी। 'स्पन्दकारिकाविवृति' के अनुसार—'अनिमीलित- सम्यग्ज्ञानदृष्टिः जाग्रदेव'। जो योगी प्रत्येक प्रमेय को देखने के समय उसके प्राणभूत स्वस्वरूप स्पन्द तत्त्व प्रत्यभिज्ञान करने में समर्थ हो और अपने स्वातन्त्र्य की असीमता का अनुभव कर चुका हो वही है 'प्रबुद्ध' ॥ ज्ञेय विषय के साक्षात्कार की प्रक्रिया के चरण—इस प्रक्रिया के तीन चरण हैं— (१) आदि कोटि—किसी ज्ञेय विषय को इन्द्रियों द्वारा गृहीत किये जाने के पूर्व तद्विषयक उनकी जो ग्रहणेच्छा होती है वही है 'आदिकोटि'। (२) मध्य कोटि—बाह्येन्द्रियों के द्वारा स्थूल रूप में ग्रहण काल में माया शक्ति (स्वातन्त्र्य शक्ति) के द्वारा अहरूप से पृथग्भूत रूप में 'इदं' द्वारा वाच्य स्थूल पाँच भौतिक रूप। सांसारिक अवस्था का पंचविषयात्मक संसारभाव। (३) अन्त कोटि—इन्द्रियों के द्वारा गृहीत प्रमेयों के संवेदन के उपरान्त अवबोध में विश्रान्ति काल। 'आदि कोटि' एवं 'अन्त कोटि'—इन कोटियों के स्तर पर अहं विमर्श से युक्त जो प्रमाता का भाव है उसमें 'प्रमेय' के साथ 'प्रमाता' तद्रूपता की अवस्था में (तदात्मकता = तादात्म्य की स्थिति में) अवस्थित रहता है। 'पशु' (संसारी) ज्ञेय पदार्थों के आदि एवं अन्त कोटियों के रूपों की नहीं जान पाते प्रत्युत् वे ज्ञेय पदार्थों के मध्य कोटि वाले स्थूल रूप को यथार्थ स्वरूप मानने का भ्रम पाले रहता है। 'प्रबुद्ध' योगी ज्ञेय पदार्थों के साक्षात्कार की तीनों कोटियों पर ज्ञेय पदार्थों के अपने स्वनिहित एवं नित्यात्मक स्वस्वरूप का साक्षात्कार करता रहता है क्योंकि 'न सावस्था न यः शिवः ॥' स्वस्वरूपानुभूति के उपाय—प्रत्येक अनुभव में स्वरूप का साक्षात्कार होते रहना तथा सभी ज्ञेय पदार्थों में अपनी ही स्थिति की संवेदना होते रहना ही वास्तविक उपलब्धि है। प्रत्येक संवेदना, प्रत्येक ज्ञान, प्रत्येक अनुभव एवं प्रत्येक साक्षात्कार की अवस्था में अपने स्वस्वरूप में ही अवस्थित रहने की प्रक्रिया यह है—अपने तात्विक विमर्श के द्वारा प्रत्येक प्रमेय विषय का स्वरूप-विश्लेषण करके उसके तात्विक आत्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा।