भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

३४६ स्पन्दकारिका पाया जाता है अतः ऐसी क्षमतासम्पन्न योगी प्रथमाभास के क्षण में ही चित्तत्त्व की सार्वभौम व्यापकता का अनुभव करता है। प्रथमाभास में स्थित योगी का प्रत्येक भाव में स्वरूप साक्षात्कार करने की तीव्रोत्कण्ठा ही 'दिदृक्षा' है। यह योगी को शाक्त भूमिका पर आरूढ़ कर देती है। योगियों को भी नानात्मक, वैचित्र्यपूर्ण एवं भेदात्मक जगत् का बोध होता है किन्तु वे उसके समस्त भेदों, अनेकात्मकताओं एवं भिन्नताओं में भी एकात्मकता का सूत्र अर्थात् अखण्ड स्वरूप भाव का साक्षात्कार करते हैं। उनकी दृष्टि में 'भेदमात्र अभेद का, द्वैतमात्र अद्वैत का तथा अनेकात्मकता मात्र एकात्मकता का विकास मात्र है।' उत्पलदेवाचार्य ने भेद एवं अनेकात्मकता या द्वैत प्रथा को शङ्कराचार्य की भाँति मिथ्या तो नहीं कहा है किन्तु उसे सत्य का आभास माना है—सत्य का विस्तार माना है, परमेश्वर ही माया शक्ति के द्वारा स्वात्मरूप को भेदों में रूपान्तरित करके एक से अनेक हो जाता है— 'प्रकाशात्मनः परमेश्वरस्य मायाशक्त्या स्वात्मरूपं विश्वं भेदेनाभासयते ॥' (प्र०का० वृत्ति १।४९) चिदात्मा ही बाहर एवं भीतर सर्वत्र व्याप्त है अतः एक ही अनेक है और अनेक ही एक है—अनेकात्मकता में एकात्मकता निहित है— 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपदानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ (प्रत्यभिज्ञा का० वृत्ति) प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप की व्यापकता की अनुभूति करने विषयक योगोपदेश— प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोक्य गोचरम् । एकत्रारोपयेत् सर्वं ततोऽन्येन न पीडयते ॥ ४४ ॥ योगी को समस्त इन्द्रिय गम्य जगत् को अपनी ज्ञान-दृष्टि से देखकर सदैव पूर्ण प्रबोध के साथ स्थित रहना चाहिए तथा उसे (इस विधि से) निखिल प्रमेय वर्ग को एक ही तत्त्व में लय कर देना चाहिए। ऐसा करने से (साधक) किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा पीड़ित नहीं किया जा सकता ॥ ४४ ॥

  • सरोजिनी * सर्वदा = सदैव । जागृतावस्था-स्वप्नावस्था-सुषुप्ति अवस्था एवं संविदादि मध्यान्तपदों में । प्रबुद्धः = 'प्रकर्षेण बुद्धः' अत्यधिक 'जाग्रत होकर । उन्मीलित स्पन्दतत्त्वावष्टंभादिव्यदृष्टि । तिष्ठेत् = स्थित होना चाहिए । सुप्रबुद्धता को प्राप्त करना चाहिए । ज्ञानेन = ज्ञान के द्वारा । बहिर्मुख अवभास द्वारा सर्वं गोचरं = समस्त इन्द्रियगम्य जगत् को । नील सुखादि रूप विषय को एकत्र = एक जगह स्थित । स्रष्टा शङ्करात्मा स्वभाव में ।¹ १. स्पन्दनिर्णय