भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

तृतीयः निष्यन्दः ३४७ सर्वमारोपयेत् = निमीलन-उन्मीलन-दशाओं को अभिन्न रूप में जानना चाहिए। ('पूर्वापर कोट्यवष्टंभ दाढर्यान्मध्यभूमिमपि चिद्रसाश्यानतावरूपतयैव पश्येत् इति' ) ॥ इस प्रकार करने से योगी किसी अन्य व्यतिरिक्त वस्तु से बाधित नहीं होगा क्योंकि वह सभी अपने को ही देखेगा । प्रत्यभिज्ञाकार ने (उ०स्तो० १३।१६) में कहा भी है—१ 'योऽविकल्पमिदमर्थमण्डलं पश्यतीशनिखिलं भवद्वपुः । स्वात्मपक्षपरिपूरिते जगत्यस्यनित्यसुखिनः कुतो भयम्? ॥' योगी को सदैव चेतना के आदि, (प्रारम्भ) मध्य एवं अन्त में, जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति में सदैव सावधान रहना चाहिए । या उसे पूर्ण प्रबोध का आश्रय ग्रहण करना चाहिए । उसे दिव्य दृष्टि (Divine vision) के साथ, स्पन्दतत्त्व के आधार के प्रति जाग्रत रहना चाहिए । यह कैसे संभव हों?—उसे निम्नांकित श्लोक की दृष्टि के साथ चिन्तन-मनन करते हुए जाग्रत रहना चाहिए— २ 'तस्माच्छब्दार्थ चिन्तासु न सावस्था न या शिवः ॥' (२।१४) योगी को इस समग्र ज्ञेय को स्रष्टा शङ्कर से अभिन्न देखते हुए केवल एक यथार्थ स्वरूप में स्थित समझना चाहिए या उसे इसे यथार्थस्वरूप से अभिन्न समझना चाहिए जो कि Involution एवं Evolution दोनों दशाओं में स्थित है । उसे 'मध्य' की दशा को भी चिदानन्द के भौतिकीकरण मूर्तिकरण (Materialiesation of the bliss of concious) के साथ अभिन्न समझना चाहिए । इससे दुःखों का नाश हो जाता है । क्योंकि अपने से परिपूरित जगत् में भला सदाह्लादित योगी को भय या दुःख कैसे हो सकता है? वह तो इस पदार्थान्वित विश्व को परमात्मा का शरीर मानता है । ३ समावेश की प्रक्रिया के विवेचन का परिणाम निकालते हुए ग्रन्थकार उस स्पन्द तत्त्व को यहाँ पर प्रस्तुत करता है जो कि अनेक पदार्थों में विभक्त है । 'स्पन्दतत्त्व' में प्रवेश उसी के लिए संभव हो जाता है जोकि पूर्णतया प्रबुद्ध (Enlightened) है और जो प्रवेश के उपायों पर अविरत ध्यान आकृष्ट किये रहता है । 'उपपादित उपायजातं (Varities of means) परिशीलनतः सततं स्पन्दतत्त्वसमाविष्टं सुप्रबुद्धस्य भवति ॥'४ आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं कि साधन को चाहिए कि वह अपनी शक्तियों का सङ्कोच किये बिना प्रबुद्ध, निर्विकल्प एवं सदा उद्युक्त रहे । ज्ञान के सम्मुख जो भी विषय उपस्थित हो, उसको देखकर संवित् की दीप्ति से ज्ञेय का लोप कर दे, उनको अविभाग में प्रतिष्ठित कर दे, तब उसे दूसरा कोई पीड़ा नहीं पहुँचा सकता । भोगमोक्षप्रदीपिका में कहा गया है—अविभाग-बोध की अग्नि से विभाग को विलुप्त करके वेद्य-पीयूष को पीकर एवं शीघ्र ही संतुत्त, नीरोग एवं एकाकी विचरण करने लगता है । यह क्रमार्थ का सार है और शक्तियों की परधारा भूमिका । उसी की अनुज्ञा से सच्छिष्यों के ज्ञान के लिए इसका वर्णन किया गया है क्योंकि यह परधारा भूमिका निर्विभाग है— १-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय ।